सुंदरता चेहरे में नहीं, व्यक्तित्व में होती है
सुंदरता चेहरे में नहीं, व्यक्तित्व में होती है मनुष्य के जन्म के साथ ही प्रकृति उसे बहुत कुछ दे देती है—एक शरीर, एक चेहरा, आँखें, मुस्कान, आवाज, बुद्धि और अनेक ऐसी क्षमताएँ, जिनका उसे स्वयं भी आरंभ में पता नहीं होता। कोई रूप-रंग से आकर्षक दिखाई देता है, किसी की आँखें मन को ठहरा देती हैं, किसी की मुस्कान सहज ही सामने वाले के चेहरे पर मुस्कान ले आती है। यह सब प्रकृति की देन है और इसके लिए मनुष्य के भीतर जितनी कृतज्ञता हो, कम है। लेकिन क्या मनुष्य की सुंदरता केवल उसके शरीर की संरचना तक सीमित है। शायद नहीं। क्योंकि जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब किसी व्यक्ति का चेहरा हमारी स्मृति में नहीं रहता, लेकिन उसका व्यवहार लंबे समय तक हमारे भीतर बना रहता है। किसी की कही हुई बात भूल जाती है, लेकिन उसके कहने का ढंग याद रहता है। किसी की उपलब्धियाँ समय के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन उसके द्वारा दिया गया अपनापन मन में अपनी जगह बनाए रखता है। यहीं से सुंदरता का एक दूसरा और अधिक गहरा अर्थ सामने आता है—व्यक्ति जैसा दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह दूसरों को कैसा अनुभव कराता है...