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Showing posts from April, 2026

कर्म एवं भाग्य - सुलोचना धनावत

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कर्म एवं भाग्य भूमिका मानव जीवन सदैव से एक गूढ़ प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता रहा है—क्या हमारे जीवन की दिशा भाग्य तय करता है या कर्म ? यह प्रश्न केवल दार्शनिक चिंतन का विषय नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के दैनिक अनुभवों में भी गहराई से उपस्थित है। समान परिस्थितियों में जन्म लेने वाले लोग भी जब भिन्न-भिन्न जीवन पथ पर अग्रसर होते हैं, तब यह जिज्ञासा और प्रबल हो उठती है कि आखिर उनके जीवन का निर्धारण किसने किया—पूर्वनियोजित भाग्य ने या उनके स्वयं के कर्मों ने? भारतीय संस्कृति में कर्म को सर्वोच्च स्थान दिया गया है, जहाँ यह माना गया है कि भाग्य भी कर्मों का ही परिणाम होता है। मनुष्य को अपने वर्तमान को सजाने और भविष्य को गढ़ने की स्वतंत्रता उसके कर्मों के माध्यम से प्राप्त होती है। प्रस्तुत कथा इसी शाश्वत सत्य को सरल, किन्तु प्रभावशाली रूप में उद्घाटित करती है कि जीवन की दिशा केवल परिस्थितियों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों के प्रति हमारे कर्म और दृष्टिकोण से निर्धारित होती है। यह कथा हमें आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है—क्या हम अपने जीवन को केवल भाग्य के भरोसे छोड़ देते हैं, या कर्म के माध्यम...

देवेंद्र आचार्य की कलम

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प्रथम कविता…' एक ' भूमिका जब जीवन अनेक दिशाओं में बिखरता प्रतीत होता है, तब कुछ स्वर ऐसे भी होते हैं जो हमें पुनः एक  की ओर लौटने का मार्ग दिखाते हैं। देवेंद्र आचार्य (अहमदाबाद) की यह संक्षिप्त किंतु अत्यंत गहन रचना उसी एकत्व की साधना का काव्यात्मक प्रतिरूप है। यहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभूति के माध्यम बन जाते हैं—जहाँ विविधता के बीच छिपी एकता का बोध सहज रूप से प्रकट होता है। कवि ने जीवन, प्रेम, भाषा, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना को अलग-अलग खंडों में नहीं, बल्कि एक ही मूल तत्व के विविध आयामों के रूप में देखा है। एक की पुनरावृत्ति यहाँ किसी सीमित आग्रह का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अद्वैत दृष्टि का उद्घोष है जो समस्त सृष्टि में एक ही सत्ता का अनुभव करती है। यह रचना हमें स्मरण कराती है कि बाह्य भिन्नताओं के पार एक ऐसी आंतरिक समरसता है, जहाँ प्रेम ही परम धन है, चित्त ही शक्ति है और आत्मा ही परमात्मा का विस्तार है। इस कविता का सौंदर्य इसकी सरलता में निहित है—यह पाठक को उपदेश नहीं देती, बल्कि उसे आत्मचिंतन के एक शांत, गहरे प्रवाह में प्रवाहित कर देती है। प्रत्येक पंक्ति जैसे...

चींटी चढ़ी पहाड़

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चींटी चढ़ी पहाड़ भूमिका जीवन की राहें अक्सर सीधी और सरल नहीं होतीं। कभी वे ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों जैसी लगती हैं, तो कभी मन स्वयं ही अपने भीतर उलझकर राह भूल जाता है। ऐसे ही किसी क्षण में जब मन दिशाहीन हो जाता है, तब प्रकृति का एक छोटा-सा दृश्य भी हमें बड़ी सीख दे जाता है। प्रस्तुत कविता “चींटी चढ़ी पहाड़” इसी गहन जीवन-सत्य को अत्यंत सरल और प्रभावी रूप में उजागर करती है। रचनाकार धर्मेन्द्र खटाना “धम्मू” ने एक साधारण-सी दिखने वाली चींटी के संघर्ष को जीवन के विराट दर्शन से जोड़ दिया है। चींटी का बार-बार गिरना, फिर उठना, और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना—यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि मानव जीवन की जिजीविषा का प्रतीक बन जाता है। जब मन निराशा में डूब जाता है, तब यही छोटी-सी चींटी हमें धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास का महत्व समझाती है। कविता की विशेषता इसकी सहजता और भावनात्मक गहराई है। यह न केवल प्रेरणा देती है, बल्कि पाठक के भीतर आत्ममंथन की एक प्रक्रिया भी प्रारंभ करती है—कि जब एक नन्हा जीव अपने लक्ष्य से नहीं डिगता, तो मनुष्य क्यों ठहर जाता है? क्यों वह ‘किन्तु-परन्तु’ में उलझकर अपने ही पथ से भटक जात...

कागज़ पर खिलते रिश्ते

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कागज़ पर खिलते रिश्ते भूमिका समय के बदलते प्रवाह ने हमारे जीवन की गति तो तेज कर दी है, पर कहीं न कहीं भावनाओं की गहराई को भी छू लिया है। एक दौर था जब शब्द सिर्फ अक्षर नहीं होते थे, बल्कि धड़कनों की आवाज़ होते थे। चिट्ठियों के माध्यम से रिश्ते सिर्फ निभाए नहीं जाते थे, बल्कि जीए जाते थे। प्रतीक्षा में भी एक मिठास होती थी, और हर लिखे हुए शब्द में एक सच्चाई झलकती थी। आज की त्वरित दुनिया में, जहाँ संवाद एक क्लिक में सिमट गया है, वहीं उन पुराने दिनों की आत्मीयता, धैर्य और अपनापन कहीं खो सा गया है। प्रमिला त्रिवेदी की ये पंक्तियाँ हमें उसी बीते हुए सुनहरे समय की याद दिलाती हैं, जहाँ रिश्ते कागज़ पर सच में खिलते थे और दिलों के बीच की दूरियाँ शब्दों से मिट जाया करती थीं। कविता कागज़ पर खिलते रिश्ते कल रिश्ते कागज पर खिलते थे। आज पत्र व्यवहार बंद हो गए हैं। हम अच्छे से रिश्तों को सम्भाल लेते थे, दिनोंदिन इंतजार करके भी। लेखन से  अहसास कराना अच्छा लगता था। हर शब्द में भाव को समझाना अच्छा लगता था। प्रणाम लिख आदर जतलाते थे, प्रेम को ढाई अक्षरों से सजाते थे। दर्द वेदना व्यक्त करने में हिचकते थे...

खुशी

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खुशी.... जब से मुझे वह मिला मेरी खुशी की, मदहोशी की कोई सीमा नहीं। हर पल एक ही बात ....आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके ....सुबह की शुरुआत उसी एक आवाज के गुनगुनाहट से। शाम और रात उसी की आवाज से जो एक लोरी की तरह मुझे सुलाते चली जाती है। आँखें इतनी नशीली कि मैं उन में डूब जाती हूँ। हरकतें इतनी चुलबुली और मस्ती भरी कि पल- पल अपने बचपन में पहुँच जाती हूँ। प्रेम की कोई भाषा नहीं होती और शायद इसीलिए हमारे बीच कोई संवाद नहीं होते। किंतु हमारा मौन एक दूसरे को एक दूजे की तरफ खींचता रहता है। कितनी ही बातें हम आपस में करते रहते हैं। उसके साथ सुर में सुर  मिलाकर बेसुरा होकर गाना भी मजा देता है। चाय की गरमी हो या लस्सी  की ठंडक उसके बिना मौज नहीं।अचार का चरपरापन हो या खीर की मिठास बिना उसके स्वाद नहीं।मेरे अकेलेपन को अपने प्यार से उसने दूर किया। आते-जाते हर वक्त मुझे संभालना। मेरा उदास चेहरा देखकर मुझे हँसाने की कोशिश करना... यह सब प्यार नहीं तो और क्या है?  बस मेरे लिखने से उसे बेहद एतराज है क्योंकि उसका समय बँट जाता है। एक वही तो है जिसे हक है मेरी कलम को रोक देने का। मेरी सोच क...

संत वाणी से उपजे विचार – 3

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  ।। हरिओम ।। संत वाणी से उपजे विचार 3  यह संसार एक कर्मभूमि है। हम सभी यहाँ अपने-अपने कर्म निभाने के लिए आए हैं। इसे ऐसे समझें—जैसे ईश्वर ने इस जगत रूपी रंगमंच की रचना की है और हम सब उसमें कलाकार हैं। हर व्यक्ति को अलग-अलग भूमिका दी गई है, और हम सब अपने-अपने हिस्से का अभिनय कर रहे हैं। जैसे एक फिल्म में अनेक कलाकार होते हैं—हर कोई अपना किरदार निभाता है, लेकिन भीतर से वह जानता है कि उसका असली रूप क्या है। वह अभिनय करता है, पर खुद को नहीं भूलता। पर जीवन में अक्सर इसके विपरीत हो जाता है। यह गृहस्थ जीवन भी एक तरह का मंच है, एक चलती हुई कथा की तरह। हम अपने रिश्तों, जिम्मेदारियों और भूमिकाओं को निभाते-निभाते उनमें इतना उलझ जाते हैं कि अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल जाते हैं। हम अभिनय को ही सत्य मान बैठते हैं और अपनी आत्मा की पहचान से दूर हो जाते हैं। संतों की वाणी हमें यही याद दिलाती है कि हम केवल यह शरीर या भूमिका नहीं हैं, बल्कि उससे कहीं अधिक हैं। इसलिए उनके ज्ञान को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। तभी जीवन वास्तव में सुंदर और सार्थक ...

पहल

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पहल जनमानस के नाम एक आवश्यक संदेश केवल अंक नहीं, प्रतिभा का सम्मान! प्रिय अभिभावको, शिक्षको और समाज के सजग नागरिको, क्या हमने कभी ठहरकर सोचा है कि हम अपने बच्चों को किस दिशा में ले जा रहे हैं? हर नए शैक्षणिक सत्र के साथ दीवारों और अखबारों में ‘हाई स्कोरर्स’ के चेहरों की भरमार दिखाई देती है। यह दृश्य अनजाने में हमारे बच्चों के मन में अंकों की एक ऐसी अंधी दौड़ (Rat Race) पैदा कर देता है, जहाँ उनका आत्मविश्वास केवल प्रतिशत के तराजू पर तौला जाने लगता है। पर क्या वास्तव में शिक्षा का अर्थ केवल अंक हैं? क्या एक बच्चे की पहचान उसके रिपोर्ट कार्ड के कुछ अंकों तक सीमित हो सकती है? इन्हीं सवालों ने हमें सोचने पर मजबूर किया। राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय, रेवत (जालौर) ने एक छोटा-सा, लेकिन सार्थक प्रयास किया है—एक ऐसी पहल, जिसमें केवल बोर्ड टॉपर ही नहीं, बल्कि हर उस बच्चे को मंच दिया गया है, जो किसी भी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान रखता है। हमने अपने विद्यालय के पोस्टर में सुंदर लेखन, काव्य पाठ, नृत्य एवं गायन, खेलकूद, क्राफ्ट, सिलाई, मेहंदी और कृषि जैसे विविध क्षेत्रों में उत्कृष्टता दिखाने वाले बच...

हम ही सिखाते हैं

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हम ही सिखाते हैं  भूमिका समाज की संरचना केवल नियमों और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि उन अदृश्य शिक्षाओं से भी आकार लेती है, जिन्हें हम अनजाने में अगली पीढ़ियों को सौंपते जाते हैं। “हम ही सिखाते हैं…” जैसी पंक्ति से आरंभ होने वाली यह कविता उसी गहरी सच्चाई को उजागर करती है—एक ऐसी सच्चाई, जिसमें दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सामूहिक सोच का है। यह काव्य रचना हमारे भीतर झांकने को मजबूर करती है। हम अक्सर स्वयं को निर्दोष मान लेते हैं, परंतु कवि हमें यह एहसास कराते हैं कि जिन जंजीरों को हम तोड़ना चाहते हैं, उन्हीं को हम अनजाने में और मजबूत भी करते हैं। बेटियों, स्त्रियों या कमजोर माने जाने वाले वर्गों को जो सीमाएँ, डर, और चुप्पी हम सिखाते हैं, वही आगे चलकर एक परंपरा बन जाती है—एक ऐसी परंपरा, जो स्वतंत्रता को त्याग और सहनशीलता के नाम पर कैद कर देती है। कवि गुरिंदर सिंह कलसी की यह रचना केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक दर्पण है। यह हमें कठोर प्रश्नों के सामने खड़ा करती है—क्या हम वास्तव में बदलाव चाहते हैं, या सिर्फ उसके भ्रम में जी रहे हैं? अनुवादक सुधीर कुमार ने इस भाव...

रेगिस्तान भी हरे हो जाते हैं, जब ‘अपने’ साथ ‘अपने’ खड़े हो जाते हैं।”

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"रेगिस्तान भी हरे हो जाते हैं, जब ‘अपने’ साथ ‘अपने’ खड़े हो जाते हैं।” यह पंक्तियाँ हमें एक बहुत गहरी और सच्ची बात समझाती हैं—जीवन में साथ और अपनापन सबसे बड़ी ताकत है। यहाँ ‘रेगिस्तान’ का अर्थ केवल रेत का मैदान नहीं है, बल्कि हमारे जीवन के वे कठिन समय हैं, जब हम अकेलापन, दुःख, असफलता या निराशा महसूस करते हैं। ऐसे समय में सब कुछ सूना और बंजर सा लगता है, जैसे जीवन में कोई उम्मीद ही नहीं बची हो। लेकिन जब हमारे ‘अपने’—यानी वे लोग जो सच्चे दिल से हमारा साथ देते हैं—हमारे साथ खड़े होते हैं, तो वही कठिन समय भी आसान लगने लगता है। ‘अपने’ केवल परिवार के सदस्य ही नहीं होते, बल्कि वे दोस्त, सहयोगी या कोई भी व्यक्ति हो सकते हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के हमारे सुख-दुःख में साथ निभाते हैं। जब हमें यह महसूस होता है कि हम अकेले नहीं हैं, तो हमारे अंदर एक नई ऊर्जा और हिम्मत पैदा होती है। हमारी सोच सकारात्मक हो जाती है, और हम मुश्किलों का सामना पहले से ज्यादा आत्मविश्वास के साथ करने लगते हैं। यही कारण है कि जो परिस्थितियाँ पहले ‘रेगिस्तान’ जैसी लगती थीं, वही धीरे-धीरे ‘हरी-भरी’ यानी खुशियों और सफलता ...

संत वाणी से उपजे विचार

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  ।। हरिओम ।। संत वाणी से उपजे विचार  मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है। वह कभी बीते हुए पलों में उलझा रहता है, तो कभी आने वाले समय की चिंता, कल्पनाओं और योजनाओं में भटकता रहता है। इसी भटकाव में वह वर्तमान को भूल जाता है—जबकि सच्चा जीवन तो इसी क्षण में बह रहा होता है। वर्तमान एक बहती हुई धारा की तरह हमारे पास से गुजरता रहता है, पर मन की उलझनों के कारण हम उसे देख ही नहीं पाते। जो आज हमारे सामने है, वही सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते और जीवन के असली अनुभव से चूक जाते हैं। इसीलिए संतों ने कहा है कि मन की तृष्णाओं को शांत करना आवश्यक है। जब मन की इच्छाएँ कम होती हैं, तब भीतर जागरूकता बढ़ती है। और जब जागरूकता आती है, तब हम जीवन को केवल जीते नहीं, बल्कि उसे समझने भी लगते हैं। सच्चा जीवन वही है, जहाँ हम पूरी तरह वर्तमान में उपस्थित हों। तभी हम जान पाते हैं कि जीवन वास्तव में क्या है। शांति का मंत्र हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे यह मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि मन को स्थिर करने और वर्तमान में लौटने का एक माध्यम है। यह हमें भीतर ...

प्रेम का प्रतीक है पारिजात।

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प्रेम का प्रतीक है पारिजात। भूमिका   प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषाएँ अक्सर शब्दों में नहीं, अनुभूतियों में जन्म लेती हैं। जैसे रात की निस्तब्धता में चुपचाप खिलने वाला पारिजात—जो बिना शोर किए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, और बिना किसी अपेक्षा के अपनी सुगंध बिखेर देता है। प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता है—निस्वार्थ, मौन, और पूरी तरह समर्पित। प्रमिला त्रिवेदी के ये शब्द उसी पारिजात की तरह हैं, जो रात के अंधेरे में उजास भर देते हैं। इनमें प्रेम की वह कोमलता है, जो किसी के लिए खिलने की चाह रखती है, और वह गहराई भी, जो अपने अस्तित्व को किसी और के जीवन में समर्पित कर देती है। यह रचना केवल भावों का संकलन नहीं, बल्कि उस एहसास का साक्षात रूप है, जिसमें प्रेम अपने होने का प्रमाण नहीं देता—बल्कि अपनी महक से उसे महसूस करा देता है। इन पंक्तियों में प्रेम कोई दावा नहीं करता, वह बस धीरे-धीरे हृदय में उतरता है—जैसे पारिजात की भीनी खुशबू, जो रात भर वातावरण को महकाती है और सुबह चुपचाप झर जाती है, पर अपने पीछे एक मधुर स्मृति छोड़ जाती है। यही प्रेम की सच्ची पहचान है—खिलना, महकना और समर्पित होकर भी किसी के जीवन ...