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Showing posts from June, 2026

मेरी डायरी से

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  मेरी डायरी से भूमिका प्रकृति केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने का अनंत लोक है। जब मन शांत होता है, तब वह रंगों में भी ईश्वर की उपस्थिति को अनुभव करने लगता है। आकाश की लालिमा, इंद्रधनुष की मुस्कान, फूलों की विविधता, पर्वतों का वैभव और ऋतुओं का परिवर्तन—ये सभी उस अदृश्य सृजनकर्ता के मौन हस्ताक्षर हैं, जो बिना बोले अपनी महानता का परिचय देता रहता है। प्रस्तुत काव्य रचना में कवयित्री प्रमिला त्रिवेदी ने उसी अदृश्य "रंगरेज" अर्थात् परम सृष्टिकर्ता के प्रति विस्मय, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का भाव व्यक्त किया है। यह कविता केवल प्रकृति के रंगों का वर्णन नहीं करती, बल्कि मनुष्य को उसकी सीमाओं का बोध कराते हुए उस अनंत सत्ता के प्रति नतमस्तक होने की प्रेरणा देती है। काव्य रचना अदृश्य 'रंगरेज'! बता दे इतने रंग कहाँ से लाया? नभ से क्षितिज तक मंत्रमुग्ध करने वाला संसार बसाया। एक अकेले इंद्रधनुष में सात रंग के तार पिरोये। धरती के कण-कण में अनगिन छवियों वाले रंग समोये। रंगों के इस महासिंधु का अथ तो है, पर अंत नहीं है। जल-थल के इस रोम-रोम में कह दो कहाँ 'वसन्त' नहीं है?...

दृष्टि बदले तो सृष्टि संवर जाए

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दृष्टि बदले तो सृष्टि संवर जाए भूमिका कहा जाता है—“दृष्टि बदलते ही सृष्टि बदल जाती है।” यह केवल एक सुंदर वाक्य नहीं, बल्कि जीवन का गहरा सत्य है। हम जिस नजर से दुनिया को देखते हैं, वही नजर हमारे अनुभवों, रिश्तों और समाज की दिशा तय करती है। यदि हमारी दृष्टि नकारात्मक है, तो हर ओर हमें समस्या ही दिखाई देगी; और यदि दृष्टि सकारात्मक है, तो कठिनाइयों में भी अवसर और समाधान नजर आएंगे। आज समाज जिस मोड़ पर खड़ा है, वहाँ सबसे अधिक आवश्यकता दृष्टि परिवर्तन की ही है। क्योंकि बाहरी बदलाव से पहले भीतर का बदलाव जरूरी होता है। वर्तमान स्थिति: समस्या कहाँ है? आज हम देख रहे हैं कि सामाजिक ढांचा तेजी से बदल रहा है। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवारों में बदल गए, और अब व्यक्ति अकेले रहने की प्रवृत्ति भी सामान्य होती जा रही है। रिश्तों में संवाद की जगह मौन ने ले ली है। लोग एक-दूसरे को समझने के बजाय दूरी बना लेना आसान समझते हैं। विडंबना यह है कि जो लोग अपने ही घरों में सामंजस्य नहीं बना पा रहे, वे दूसरों को जीवन के पाठ पढ़ाने लगे हैं। विवाह जैसे पवित्र संबंध भी प्रयोगशाला बन गए हैं—लिव-इन, विवाहेत्तर संबंध, और...

प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं...

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प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं... भूमिका क्या कभी ऐसा हुआ है कि कोई आवाज़ सुनाई न दे, फिर भी उसका असर भीतर देर तक बना रहे? क्या कभी किसी अपने की कही हुई एक छोटी-सी बात वर्षों बाद भी मन में वैसे ही गूँज उठी हो? आखिर ऐसा क्या है इस “गूँज” में, जो केवल ध्वनि का लौटना भर नहीं, बल्कि स्मृतियों, संवेदनाओं और रिश्तों का जीवंत स्पंदन बन जाती है? मनुष्य का जीवन केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उन अनकहे एहसासों से भी संचालित होता है, जो समय-समय पर भीतर प्रतिध्वनित होते रहते हैं। कभी माँ की पुकार, कभी बच्चे की किलकारी, कभी किसी प्रिय का स्मरण—ये सब जीवन की ऐसी गूँज हैं जो हमें भीतर से जीवित रखती हैं। वरिष्ठ लेखिका विजया डालमिया जी का यह विचारोत्तेजक लेख “प्यार से बड़ी कोई गूँज नहीं...” इसी आत्मिक प्रतिध्वनि को समझने और महसूस करने का एक सुंदर प्रयास है। आलेख एक गूँज कानों में उतरती है, और एक गूँज कानों से उतरकर सीधे हृदय तक पहुँच जाती है। कानों में उतरने वाली गूँज अक्सर अपनों की ही होती है—वे अपने, जो हमारे दिल के बेहद करीब होते हैं। “गूँज”—यह शब्द अपने आप में अत्यंत विशिष्ट है। सामंजस्यपूर्ण लय के साथ किस...

नहीं चाह

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नहीं चाह भूमिका   त्याग में ही सच्ची प्राप्ति मनुष्य का जीवन प्रायः इच्छाओं, उपलब्धियों, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों की दौड़ में व्यतीत होता है। वह ऊँचे पद, सम्मान, वैभव और प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा में स्वयं को निरंतर व्यस्त रखता है। किंतु कुछ संवेदनशील आत्माएँ ऐसी भी होती हैं जो इस बाहरी चमक-दमक से परे जीवन के वास्तविक सौंदर्य को खोजती हैं। वे समझती हैं कि प्रकृति की निस्वार्थता, सरलता और मौन ही वह सत्य है जो मन को स्थायी शांति प्रदान करता है। प्रस्तुत काव्य रचना "नहीं चाह" ऐसी ही एक आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति है। यह कविता संसार की क्षणभंगुर महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर प्रकृति के साथ एकाकार होने की कामना व्यक्त करती है। इसमें लेखिका ने यह संदेश दिया है कि सच्चा सुख किसी पद, प्रतिष्ठा या अधिकार में नहीं, बल्कि उस सहजता और समर्पण में है जहाँ मनुष्य स्वयं को प्रकृति के विशाल परिवार का एक विनम्र अंश मान लेता है। काव्य रचना "नहीं चाह" नहीं चाह मनु कुल में जन्म लूँ। नहीं चाह किसी संभ्रांत कुल से नाता जोड़ूँ। नहीं चाह किसी उच्च ओहदे पर पहुँचूँ। नहीं चाह दुनिया में अपना परचम...

डॉ. रश्मि शर्मा से विशेष संवाद

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डॉ. रश्मि शर्मा से विशेष संवाद विज्ञान, साहित्य, शोध और समाजसेवा का बहुआयामी व्यक्तित्व भूमिका   डॉ. रश्मि शर्मा का व्यक्तित्व विज्ञान और साहित्य के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है। प्राणिशास्त्र की प्रोफेसर के रूप में उन्होंने न केवल शिक्षण और शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है, बल्कि साहित्य सृजन के माध्यम से समाज को विचार और संवेदना की नई दिशा भी प्रदान की है। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोधार्थियों ने उच्च शिक्षा की उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। पचास से अधिक पुस्तकों और अनेक शोध पत्रों की लेखिका डॉ. शर्मा विज्ञान, अध्यात्म, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, वास्तु और समाजसेवा जैसे विविध क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय हैं। प्रस्तुत है उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों को स्पर्श करता एक विस्तृत साक्षात्कार— बातचीत प्रश्न १. सर्वप्रथम अपने बचपन और पारिवारिक परिवेश के बारे में बताइए। उत्तर : " मेरा बचपन अत्यंत धार्मिक और संस्कारमय वातावरण में बीता। मैं उत्तर प्रदेश के खुर्जा (जनपद बुलंदशहर) के कौशिक गौड़ ब्राह्मण परिवार से संबंध रखती हूँ। मेरे माता-पिता ने हमें सदैव नैतिक मूल्यों, ...

विचार वीथी

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विचार वीथी इस का शाब्दिक अर्थ विचारों का मार्ग  या विचारों का  गलियारा  है। यह दो शब्दों से मिलकर बना है: विचार (सोच, चिंतन या मंतव्य) और वीथी (मार्ग, पंक्ति या गलियारा)। भूमिका मानव जीवन में रिश्ते सबसे अनमोल धरोहर होते हैं। इन्हें बनाने में वर्षों लग जाते हैं, लेकिन कभी-कभी एक क्षणिक आवेश, एक कटु शब्द या पल भर का क्रोध उन संबंधों में ऐसी दरार डाल देता है जिसे भरने में लंबा समय लग जाता है। क्या हमने कभी सोचा है कि जिस क्रोध को हम कुछ क्षणों के लिए उचित मान लेते हैं, वही आगे चलकर पश्चाताप का कारण क्यों बन जाता है? जब मन शांत होता है और विवेक जागता है, तब तक बहुत कुछ हाथ से निकल चुका होता है। प्रस्तुत मुक्तक इसी जीवन-सत्य को सरल शब्दों में अभिव्यक्त करता है। यह पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है कि क्या क्षणिक क्रोध वास्तव में हमारे प्रिय संबंधों से अधिक मूल्यवान है? आइए, इस विचारोत्तेजक रचना के माध्यम से जीवन के इस महत्वपूर्ण संदेश को समझने का प्रयास करें। मुक्तक पल भर का क्रोध ।। हरिओम ।। पल भर का क्रोध प्यारे, रिश्तों को बिगाड़ देता है, होश जब आता है तो वक्त निक...

प्रेम बंधन

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  प्रेम बंधन भूमिका क्या प्रेम वास्तव में बंधन है, या वह एक ऐसी अनुभूति है जो मनुष्य को उसकी सीमाओं से मुक्त कर देती है? अक्सर लोग प्रेम को अधिकार, अपेक्षाओं और संबंधों की परिधि में बाँधकर देखते हैं, जबकि सच्चा प्रेम इन सबसे कहीं ऊपर होता है। वह न तो किसी को कैद करता है और न ही स्वतंत्रता का हनन करता है; बल्कि वह दो हृदयों के बीच विश्वास, सम्मान और आत्मीयता का ऐसा सेतु निर्मित करता है जो समय, दूरी और परिस्थितियों की हर कसौटी पर खरा उतरता है। वरिष्ठ साहित्यकार प्रमिला त्रिवेदी जी की यह भावपूर्ण कविता प्रेम के इसी दिव्य स्वरूप को उद्घाटित करती है। कविता की प्रत्येक पंक्ति पाठक को यह सोचने पर विवश करती है कि प्रेम का वास्तविक अर्थ क्या है और वह जीवन को किस प्रकार मधुर, सार्थक तथा आलोकित बनाता है। आइए, इस सुंदर काव्य रचना के माध्यम से प्रेम की पवित्र अनुभूति का स्पर्श करें। काव्य रचना ।। प्रेम बंधन ।। प्रेम कोई बंधन नहीं, मन से मन का मधुर मिलन है, जहाँ न कोई शर्त होती, बस अपनापन ही जीवन है। प्रेम में अधिकार नहीं, विश्वास की सुगंध बसी होती है, दो आत्माओं के बीच सदा, स्नेह की दीपशिखा जल...