क्या तुम सुनोगी?
क्या तुम सुनोगी? क्या तुम सुनोगी, अगर मैं आज अपने मन की वह बात तुम्हारे सामने रख दूँ, जिसे कहते-कहते न जाने कितनी स्त्रियाँ अपने ही भीतर चुप हो जाती हैं? क्या तुम सुनोगी, अगर मैं कहूँ कि एक स्त्री के जीवन में दर्द केवल वही नहीं होता जो दिखाई देता है? कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई निशान नहीं होता, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं मिलता, और कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें कहने से पहले ही मन डर जाता है— “लोग क्या समझेंगे?” क्या तुम सुनोगी, जब एक स्त्री अपनी बात कहने से पहले ही सौ बार सोचती है? कहीं मेरी बात का गलत अर्थ न निकले, कहीं मेरी भावना को मेरी कमजोरी न समझ लिया जाए, कहीं मेरी सच्चाई को किसी और कहानी का हिस्सा न बना दिया जाए... और फिर वह अपने शब्दों को अपने ही भीतर वापस रख लेती है। क्या तुम सुनोगी, जब वह मुस्कुराकर कहे— “मैं ठीक हूँ।” और तुम उसकी मुस्कान के पीछे छिपी थकान को पहचान सको? क्या तुम इतना समझ सकोगी कि हर “मैं ठीक हूँ” वास्तव में ठीक होने का प्रमाण नहीं होता? क्या तुम सुनोगी, जब कोई स्त्री अपना दर्द बाँटना चाहे, लेकिन उसे यह डर सताए कि कहीं उसकी कही हुई ...