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Showing posts from August, 2026

क्या तुम सुनोगी?

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क्या तुम सुनोगी? क्या तुम सुनोगी, अगर मैं आज अपने मन की वह बात तुम्हारे सामने रख दूँ, जिसे कहते-कहते न जाने कितनी स्त्रियाँ अपने ही भीतर चुप हो जाती हैं? क्या तुम सुनोगी, अगर मैं कहूँ कि एक स्त्री के जीवन में दर्द केवल वही नहीं होता जो दिखाई देता है? कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं जिनका कोई निशान नहीं होता, कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जिनका कोई उत्तर नहीं मिलता, और कुछ भावनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें कहने से पहले ही मन डर जाता है— “लोग क्या समझेंगे?” क्या तुम सुनोगी, जब एक स्त्री अपनी बात कहने से पहले ही सौ बार सोचती है? कहीं मेरी बात का गलत अर्थ न निकले, कहीं मेरी भावना को मेरी कमजोरी न समझ लिया जाए, कहीं मेरी सच्चाई को किसी और कहानी का हिस्सा न बना दिया जाए... और फिर वह अपने शब्दों को अपने ही भीतर वापस रख लेती है। क्या तुम सुनोगी, जब वह मुस्कुराकर कहे— “मैं ठीक हूँ।” और तुम उसकी मुस्कान के पीछे छिपी थकान को पहचान सको? क्या तुम इतना समझ सकोगी कि हर “मैं ठीक हूँ” वास्तव में ठीक होने का प्रमाण नहीं होता? क्या तुम सुनोगी, जब कोई स्त्री अपना दर्द बाँटना चाहे, लेकिन उसे यह डर सताए कि कहीं उसकी कही हुई ...

आज है पत्र लेखन दिवस

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वो खत… जो कभी भी डिलीट नहीं होते पत्र लेखन दिवस पर लौटें उन भूली-बिसरी यादों की ओर कुछ खत पढ़े नहीं जाते… महसूस किए जाते हैं। एक समय था, जब डाकिए की आहट पूरे घर में उत्सुकता भर देती थी। लिफाफा हाथ में आते ही चेहरे खिल जाते थे। कोई खुशखबरी की उम्मीद करता, कोई अपनों की कुशलक्षेम जानने को बेचैन रहता और कोई पोस्टकार्ड देखते ही उसमें छिपी खबर का अंदाजा लगाने लगता था। वो भी क्या दौर था, जब ' तुम्हारा खत मिला'  केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि दूर बैठे किसी अपने के दिल तक पहुँच जाने का एहसास होता था। आज संदेश एक क्लिक में पहुँचते हैं और अगले ही पल डिलीट भी हो जाते हैं। लेकिन हाथ से लिखे वे खत, जिन्हें लिखने में घंटों लगते थे और पढ़ते समय आँखें नम हो जाती थीं, आज भी किसी पुरानी दराज में सुरक्षित मिल जाते हैं। क्योंकि कुछ रिश्ते कागज पर लिखे जरूर जाते हैं, मगर मिटते कभी नहीं। जब डाकिया खुशियाँ और खबरें लेकर आता था “खत लिख दे… खत लिख दे…” “डाकिया डाक लाया…” “चिट्ठी आई है…” ये गीत केवल गीत नहीं हैं। ये उस दौर की यादें हैं, जिसे हमारी पीढ़ी ने जिया है। हाथ में पेन, सामने सफेद कागज और मन में ढेर स...

लोक पर्व

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छत्तीसगढ़ का लोक-पर्व 'खमरछठ' हल षष्ठी वात्सल्य, प्रकृति-संरक्षण और वैज्ञानिक पोषण परंपरा का अनुपम संगम कांसा के बेल अउ, पसहर के चाउर, चमकत हे बिंदिया, पाँव में माहुर, हरछठ तिहार के इही पहिचान, छठी मैय्या के किरपा के करथन बखान  छत्तीसगढ़ की पावन धरा अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति, परंपराओं और पर्वों के लिए जानी जाती है। इन्हीं पर्वों में से एक अत्यंत पावन व्रत है — 'खमरछठ', जिसे भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को पूरे प्रदेश में अपार श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। देश के अन्य भागों में इसे'हल षष्ठी', '' या 'हरछठ' कहा जाता है। यह व्रत माताएँ अपनी सन्तान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, रक्षा और सुख-समृद्धि की कामना के लिए पूरी तरह निर्जला रहकर रखती हैं। यह धार्मिक अनुष्ठान के साथ  छत्तीसगढ़ की कृषि-संस्कृति, जैव-विविधता और पोषण विज्ञान का अद्भुत समागम है। पूजा विधि और लोक परंपरा.. . खमरछठ की पूजा का स्वरूप छत्तीसगढ़ी जनजीवन की सादगी औरप्रकृति-प्रेम को दर्शाता है। इस दिन सुबह से ही माताएँ निर्जला व्रत धारण करती हैं। घर के आँगन या मोहल्ले के सार्वजनिक...

तू ही बनना बस मेरा भाई..

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तू ही बनना बस मेरा भाई.. भूमिका इस कविता में राखी का धागा केवल भाई-बहन के स्नेह का प्रतीक नहीं, बल्कि उस विराट रिश्ते का भी प्रतीक बन जाता है जिसमें रक्त का संबंध पीछे छूट जाता है और राष्ट्र सर्वोपरि हो जाता है। सीमा पर खड़ा सैनिक जब हर भारतीय बहन की रक्षा का संकल्प निभाता है, तब उसकी कलाई पर बंधा रक्षासूत्र एक बहन की राखी से बढ़कर पूरे देश की भावनाओं का भार सँभालता है। लेकिन जब वही भाई तिरंगे में लिपटकर घर लौटता है, तो राखी का उत्सव करुणा में बदल जाता है। आइए, इसी प्रेम, त्याग और देशभक्ति से भीगी इस मार्मिक रचना को पढ़ें। काव्य रचना तू ही बनना बस मेरा भाई देश की सीमा पर खड़ा है भाई, बहन सजा रही उसकी कलाई। तिलक लगाकर करे आरती, खुश हो रही माँ भारती। सहोदर नहीं तो क्या हुआ, देश का है वो अगोदर भाई। अपने इसी कर्तव्य को निभाने, डटा है सीमा पर बन के सिपाही। रक्षा बंधन पर भेजे बहना, प्यार-दुलार और ढेरों आशीष। दुश्मन की गोली से करेंगे रक्षा, बहना के भेजे ये रक्षासूत्र। सारे भारत की बहनें हैं उसकी, सबकी रक्षा का भार है उस पर। हँसते-हँसते बहन के लिए, भाई ने अपनी जान गँवाई। डोली में बिठा कर करूँग...

एक संस्मरण-पहली राखी की वह प्यारी-सी याद

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एक संस्मरण  पहली राखी की वह प्यारी-सी याद कुछ यादें ऐसी होती हैं, जो समय के साथ पुरानी नहीं होतीं, बल्कि हर बार याद करने पर मन को उसी मासूमियत से भर देती हैं। मेरे बच्चों की पहली राखी की याद भी ऐसी ही है। मेरी बेटी तब केवल तीन साल की थी और बेटा अभी एक वर्ष का ही हुआ था। रक्षाबंधन आने वाला था। मैंने बेटी से कहा—“बेटा, राखी आ रही है। तुम्हें अपने छोटे भाई को राखी बाँधनी है।” बस, फिर क्या था! वह खुशी से फूली नहीं समाई। राखी वाले दिन वह जल्दी-जल्दी तैयार हुई और हाथ में राखी लेकर अपने छोटे भाई के पास पहुँच गई। लेकिन छोटा भाई भी अपनी ही धुन में था। वह न तो टीका लगवाने को तैयार था और न ही राखी बँधवाने को। जितना उसे मनाया जाए, उतना ही वह मचलता जाए। घर के सभी लोग उसे प्यार से समझाने और मनाने लगे, लेकिन वह अपनी नन्ही-सी जिद पर अड़ा रहा। आखिरकार जब खेलते-खेलते उसे नींद आने लगी और उसकी आँखें बोझिल होने लगीं, तब किसी तरह उसे सँभालकर मेरी बेटी ने उसके नन्हे हाथ में राखी बाँधी और टीका लगाया। लेकिन इस पूरे प्रसंग में जो बात मेरे हृदय को सबसे अधिक छू गई, वह मेरी बेटी की मासूम जिद थी। उसने खाना खाने...

तिरंगे की आन और वीरों का अभिमान

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तिरंगे की आन और वीरों का अभिमान भूमिका तिरंगा केवल तीन रंगों से बना राष्ट्रीय ध्वज नहीं, बल्कि भारत की अस्मिता, स्वाभिमान, शौर्य और संकल्प का जीवंत प्रतीक है। जब यही तिरंगा किसी वीर सैनिक के हाथों में लहराता है, तब उसके रंगों में राष्ट्र के प्रति समर्पण, त्याग और कर्तव्य की अनगिनत गाथाएँ दिखाई देने लगती हैं। आखिर वह कौन-सी शक्ति है, जो विषम मौसम, दुर्गम सीमाओं और मृत्यु के साक्षात् सामने खड़े होने के बावजूद भारतीय सैनिक के कदमों को रोक नहीं पाती? कौन-सा संकल्प है, जो उसे अपने सुख-चैन से ऊपर मातृभूमि की रक्षा को स्थान देने की प्रेरणा देता है? भारतीय सेना की कर्मठता और पुरुषार्थ इसी अदम्य संकल्प का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हिमालय की बर्फीली चोटियों से लेकर समुद्र की सीमाओं तक, देश के प्रहरी अपने कर्तव्य-पथ पर निरंतर सजग रहते हैं। उनके लिए राष्ट्रधर्म केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य है। वे जानते हैं कि उनके जागते रहने से ही देशवासी अपने घरों में निश्चिंत होकर सो पाते हैं। डाॅ. छाया शर्मा जी की वीर रस से ओतप्रोत यह कविता इसी सैनिक चेतना, राष्ट्रप्रेम और अदम्य पुरुषार्थ को शब...

खूब कूटिए अदरक

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खूब कूटिए अदरक आखिर क्या-क्या कूटना है? भूमिका अदरक तो हम रोज़ कूटते हैं—चाय को स्वाद, खुशबू और गर्माहट देने के लिए। लेकिन क्या कभी सोचा है कि हमारे भीतर भी कुछ ऐसा जमा होता रहता है, जिसे कूटे बिना मन हल्का नहीं होता? अधूरी इच्छाएँ, सुबह की झकझक से आया गुस्सा, किसी की दगाबाजी का दर्द, रिश्तों की खटास, अपनी ही परिस्थितियों से शिकायत और कभी-कभी ईश्वर से भी अनकही नाराज़गी... तो क्यों न आज अदरक के साथ-साथ इन्हें भी कूट लिया जाए? फर्क बस इतना हो कि अदरक कूटकर चाय बने और मन की भड़ास कूटकर जीवन में मिठास, संबंधों में गहराई और भीतर एक नया उत्साह पैदा हो। यही इस शब्द-संकलन की खूबसूरती है—यह हमें दुखों से भागने की नहीं, उन्हें पहचानकर, स्वीकारकर और फिर उनसे आगे निकल जाने की राह दिखाता है। मुक्त भाव खूब कूटिए अदरक के साथ काली मिर्च, लौंग-इलाइची और दालचीनी... बनाइए मस्त-मस्त चाय और खुश कीजिए मेहमानों को पिलाकर। पर... पर... पर... खूब कूटिए साथ में अपनी उन अधूरी ख्वाहिशों को, जो हो न सकीं पूरी... और दृढ़विश्वास के साथ बढ़ जाइए आगे, उन्हें पूरा करने के लिए। खूब कूटिए अपना वो गुस्सा, जो सुबह हुई झकझक ...