विसर्जन — एक दिन मन का भी

गणपति विसर्जन 

विसर्जन — एक दिन मन का भी 

हर वर्ष की तरह इस बार भी घर में उत्सव का वातावरण था। पूजा के बाद जब विसर्जन का समय आया, तो घर के सभी लोग भावुक हो उठे। प्रतिमा को विदा करते हुए मन में यही भावना थी कि अगले वर्ष फिर प्रभु का आगमन होगा।

उसी समय मेरी दृष्टि घर के एक कोने में बैठी एक परिचित महिला पर पड़ी। वह चुप थीं। चेहरे पर उदासी थी।

मैंने पास जाकर पूछा, “क्या हुआ?”

उन्होंने धीमे से कहा, “कुछ नहीं… बस मन में बहुत कुछ जमा हो गया है।”

बातों-बातों में उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी एक रिश्तेदार से पुरानी नाराज़गी थी। वर्षों पहले हुई एक छोटी-सी बात धीरे-धीरे मन में इतनी बड़ी हो गई कि अब सामने आने पर भी दोनों एक-दूसरे से ठीक से बात नहीं कर पाती थीं। ऊपर से सब सामान्य था, लेकिन भीतर कहीं ईर्ष्या, शिकायत और द्वेष जमा था।

मैंने मुस्कुराकर कहा, “आज जब हम भगवान का विसर्जन कर रहे हैं, तो क्यों न अपने मन में जमा इन भावों का भी विसर्जन कर दें?”

वह कुछ देर चुप रहीं।

फिर बोलीं, “लेकिन इतने वर्षों की नाराज़गी इतनी आसानी से कैसे जाएगी?”

मैंने कहा, “शायद एक दिन में पूरी तरह न जाए, लेकिन शुरुआत तो आज हो सकती है।”

उन्होंने बहुत देर बाद पहली बार अपने चेहरे पर हल्की मुस्कान लाई।

उस दिन उन्होंने अपनी उस रिश्तेदार को फोन किया। कोई लंबी शिकायत नहीं की, कोई पुराना हिसाब नहीं खोला। बस इतना कहा—

“जो हुआ, उसे पीछे छोड़ते हैं। रिश्ते को फिर से एक मौका देते हैं।”

फोन रखने के बाद उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन इस बार उन आँसुओं में बोझ कम और सुकून अधिक था।

उस दिन मुझे लगा—विसर्जन केवल प्रतिमा का नहीं होता। कुछ विसर्जन मन के भीतर भी होते हैं।

हम जीवन में न जाने कितनी छोटी-छोटी बातों को पकड़कर बैठ जाते हैं। किसी की सफलता देखकर ईर्ष्या, किसी के व्यवहार से उपजा द्वेष, किसी की बात का वर्षों पुराना मलाल और कभी-कभी बिना कारण किसी के प्रति बनी दुर्भावना—ये सब हमारे मन में जगह बना लेते हैं।

हम बाहर से मुस्कुराते रहते हैं, लेकिन भीतर कहीं मन भारी होता जाता है।

क्यों न कभी अपने मन की भी सफाई करें?

किसी की खुशी से ईर्ष्या हो तो उसे शुभकामना देकर देखें।

 किसी से द्वेष हो तो क्षमा की ओर एक कदम बढ़ाकर देखें।

 किसी के प्रति दुर्भावना हो तो उसके लिए एक अच्छी भावना मन में लाकर देखें।

 और जो बातें बदल नहीं सकतीं, उन्हें स्वीकार करके आगे बढ़ना सीखें।

विसर्जन का सबसे सुंदर अर्थ शायद यही है—

 जो मन को भारी करता है, उसे प्रेमपूर्वक विदा कर देना।

आइए, इस बार प्रतिमा के साथ-साथ अपने भीतर के भी कुछ भाव विसर्जित करें—

ईर्ष्या, द्वेष, दुर्भावना, अहंकार, कटुता और नकारात्मक विचार।

और जब ये भाव विदा हों, तो उनके स्थान पर रहने दें—

प्रेम, क्षमा, संतोष, करुणा और सद्भाव।

क्योंकि बाहर का विसर्जन कुछ समय का होता है,

लेकिन मन का विसर्जन जीवन बदल सकता है।

रचनाकार

प्रस्तुति









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