सुंदरता चेहरे में नहीं, व्यक्तित्व में होती है
सुंदरता चेहरे में नहीं, व्यक्तित्व में होती है
मनुष्य के जन्म के साथ ही प्रकृति उसे बहुत कुछ दे देती है—एक शरीर, एक चेहरा, आँखें, मुस्कान, आवाज, बुद्धि और अनेक ऐसी क्षमताएँ, जिनका उसे स्वयं भी आरंभ में पता नहीं होता। कोई रूप-रंग से आकर्षक दिखाई देता है, किसी की आँखें मन को ठहरा देती हैं, किसी की मुस्कान सहज ही सामने वाले के चेहरे पर मुस्कान ले आती है। यह सब प्रकृति की देन है और इसके लिए मनुष्य के भीतर जितनी कृतज्ञता हो, कम है।
लेकिन क्या मनुष्य की सुंदरता केवल उसके शरीर की संरचना तक सीमित है।
शायद नहीं।
क्योंकि जीवन में ऐसे अनेक अवसर आते हैं, जब किसी व्यक्ति का चेहरा हमारी स्मृति में नहीं रहता, लेकिन उसका व्यवहार लंबे समय तक हमारे भीतर बना रहता है। किसी की कही हुई बात भूल जाती है, लेकिन उसके कहने का ढंग याद रहता है। किसी की उपलब्धियाँ समय के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन उसके द्वारा दिया गया अपनापन मन में अपनी जगह बनाए रखता है।
यहीं से सुंदरता का एक दूसरा और अधिक गहरा अर्थ सामने आता है—व्यक्ति जैसा दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह दूसरों को कैसा अनुभव कराता है।
मोहन को देखें।
उसके व्यक्तित्व की सबसे सहज विशेषता उसकी नैसर्गिक मुस्कान है। वह मुस्कान किसी विशेष प्रयास का परिणाम नहीं लगती; जैसे प्रसन्नता उसके भीतर सहज रूप से उपस्थित हो और मुस्कान के माध्यम से बाहर आ जाती हो। उसे देखकर सामने वाला अनायास आकर्षित होता है। इस आकर्षण का कारण केवल उसका बालसुलभ चेहरा नहीं, बल्कि उस चेहरे से झलकती सहजता और प्रसन्नता है।
मोहन यहाँ किसी तुलना का विषय नहीं, बल्कि एक विचार का माध्यम है।
उसकी मुस्कान हमें यह सोचने का अवसर देती है कि यदि प्रकृति ने किसी को विशेष शारीरिक आकर्षण दिया है तो उसके लिए कृतज्ञ होना चाहिए, लेकिन यदि किसी की शारीरिक संरचना वैसी नहीं है जैसी समाज सामान्यतः आकर्षक मानता है, तो क्या उसके पास आकर्षण का कोई दूसरा मार्ग नहीं?
बिल्कुल है।
प्रकृति शरीर देती है, लेकिन व्यक्तित्व को मनुष्य स्वयं गढ़ता है।
हम अपनी जन्मजात शारीरिक संरचना को बहुत हद तक बदल नहीं सकते, लेकिन अपने व्यवहार को बदल सकते हैं। हम अपने चेहरे की बनावट निर्धारित नहीं करते, लेकिन चेहरे पर आने वाली मुस्कान को तो सँवार सकते हैं। हम अपनी आवाज का मूल स्वर नहीं चुनते, लेकिन अपने शब्दों की मिठास अवश्य चुन सकते हैं। हम अपनी परिस्थितियाँ हमेशा निर्धारित नहीं कर सकते, लेकिन उन परिस्थितियों के प्रति अपनी प्रतिक्रिया अवश्य निर्धारित कर सकते हैं।
और शायद यही मनुष्य होने की सबसे बड़ी स्वतंत्रता है।
किसी के पास रूप है तो वह रूप विनम्रता से सुंदर बन सकता है। किसी के पास बुद्धि है तो वह बुद्धि दूसरों के काम आ सकती है। किसी के पास धन है तो वह किसी आवश्यकता के समय सहारा बन सकता है। किसी के पास नेतृत्व की क्षमता है तो वह दूसरों को आगे बढ़ाने का माध्यम बन सकता है। और किसी के पास केवल एक सच्ची, सहज मुस्कान है तो वह भी किसी के उदास दिन को बेहतर बनाने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो गुणों की सुंदरता शरीर की सुंदरता से कहीं अधिक स्थायी होती है।
शरीर समय के साथ बदलता है। चेहरे की चमक बदलती है। बालों का रंग बदलता है। चाल बदलती है। लेकिन विनम्रता, करुणा, संवेदनशीलता, सत्यनिष्ठा, धैर्य, सहयोग और दूसरों के प्रति सम्मान जैसे गुण उम्र के साथ कम होने के बजाय और परिपक्व हो सकते हैं।
फिर भी हमारी विडंबना यह है कि हम अपने बच्चों को सुंदर दिखने की चिंता तो सिखाते हैं, लेकिन सुंदर बनने की दिशा में उतना नहीं सोचते। हम उन्हें प्रतियोगिता में आगे निकलने की प्रेरणा देते हैं, लेकिन यह कम बताते हैं कि किसी को पीछे छोड़कर आगे निकलने से अधिक महत्वपूर्ण किसी को साथ लेकर आगे बढ़ना है।
हम उन्हें सफल होने की शिक्षा देते हैं, लेकिन यह शिक्षा अधूरी है यदि उसमें संवेदनशील होने का संस्कार शामिल न हो।
मोहन की सहज मुस्कान इसी अधूरेपन की ओर हमारा ध्यान खींचती है।
क्यों न हम अपने बच्चों से यह भी कहें कि सुंदर दिखना अच्छी बात है, लेकिन सुंदर व्यवहार करना उससे बड़ी बात है। अच्छे कपड़े पहनना अच्छी बात है, लेकिन किसी के मन को सम्मान देना उससे बड़ी बात है। ऊँची उपलब्धि प्राप्त करना अच्छी बात है, लेकिन अपनी उपलब्धि के बावजूद विनम्र बने रहना उससे बड़ी बात है।
और यह शिक्षा केवल बच्चों के लिए नहीं है। हम सभी के लिए है।
प्रभु ने हमें जो शरीर दिया है, उसके लिए कृतज्ञ होना हमारी पहली जिम्मेदारी है। उसके बाद प्रश्न आता है—हम इस शरीर, इस बुद्धि और इस जीवन का उपयोग किस प्रकार कर रहे हैं?
क्या हमारी उपस्थिति से किसी को राहत मिलती है?
क्या हमारी बात किसी का मन हल्का करती है?
क्या हमारी मुस्कान किसी को आश्वस्त करती है?
क्या हमारा व्यवहार किसी को सम्मान का अनुभव कराता है?
क्या हमारे होने से किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी-सी सकारात्मकता जुड़ती है?
यदि इन प्रश्नों के उत्तर धीरे-धीरे ‘हाँ’ की ओर बढ़ रहे हैं, तो निश्चय ही हम अपने जीवन को केवल जी नहीं रहे, बल्कि उसे सार्थक भी बना रहे हैं।
इसलिए अपने रूप को लेकर अहंकार और अपनी कमियों को लेकर हीनभावना—दोनों से बचने की आवश्यकता है। दोनों ही मनुष्य को बाहरी आवरण में बाँध देते हैं। इसके स्थान पर अपने भीतर के गुणों को पहचानना और उन्हें निरंतर विकसित करना अधिक सार्थक मार्ग है।
जिसे प्रभु ने जैसा बनाया, उसके लिए कृतज्ञ रहें; और स्वयं को जैसा बनाया जा सकता है, उसके लिए निरंतर प्रयासरत रहें।
मोहन की मुस्कान हमें यही छोटी-सी, लेकिन गहरी बात समझाती है कि आकर्षण केवल चेहरे से नहीं आता। कभी-कभी एक सहज मुस्कान, एक स्नेहपूर्ण दृष्टि, एक विनम्र शब्द और एक संवेदनशील हृदय किसी भी बाहरी सुंदरता से अधिक प्रभावशाली हो सकते हैं।
अंततः मनुष्य की पहचान उसके चेहरे की बनावट से नहीं, उसके चरित्र की बनावट से होती है।
शरीर प्रभु की कृति है;
व्यक्तित्व हमारे संस्कारों की अभिव्यक्ति है;
और दोनों के प्रति कृतज्ञ होकर उन्हें सार्थक बनाना ही शायद जीवन की वास्तविक सुंदरता है।
सूत्रधार











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