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Showing posts from September, 2026

गणपति आगमन से विसर्जन तक

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गणपति के आगमन के मायने उत्सव से आगे सीमा पांडे 'सीमा' गणपति बप्पा के आने की तैयारी शुरू होते ही वातावरण में जैसे एक अलग ही उत्साह भर जाता है। घरों की सफाई होने लगती है। बच्चे अपनी पसंद की सजावट को लेकर उत्साहित रहते हैं। कहीं पंडाल बन रहा होता है तो कहीं आरती की तैयारी। बाजारों में भी रौनक बढ़ जाती है। चारों ओर सुनाई देता है—गणपति बप्पा मोरया। लेकिन क्या गणपति उत्सव केवल दस दिनों की पूजा और उत्सव है? शायद नहीं। थोड़ा ठहरकर देखें तो बप्पा का आगमन हमें बहुत कुछ याद दिलाता है। खासकर आज के उस समय में, जब हमारी जिंदगी बहुत व्यस्त हो गई है और हम पास रहते हुए भी एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं। बप्पा बहाना हैं, मिलने का... कभी पड़ोसी से मिलने के लिए किसी अवसर की जरूरत नहीं होती थी। सुख-दुख अपने आप साझा हो जाते थे। आज समय कम है। बातचीत के लिए भी समय निकालना पड़ता है।ऐसे में गणेशोत्सव एक सुंदर बहाना बनकर आता है।पंडाल की सजावट में कोई फूल लगाता है, कोई रोशनी करता है। कोई प्रसाद की व्यवस्था देखता है तो कोई आरती की। बच्चे भी पीछे नहीं रहते। उन्हें भी अपना छोटा-सा काम चाहिए। इस पूरे माहौल म...

अपना-अपना चाँद

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अपना-अपना चाँद एक चाँद, अनेक भावनाएँ और रिश्तों की अनगिनत रोशनियाँ विजया डालमिया की रचना • संपादित एवं विस्तारित संस्करण चाँद ने कुछ कहा, रात ने कुछ सुना... और हर दिल ने अपना अर्थ खोज लिया चाँद को देखने का अनुभव सभी के लिए एक जैसा नहीं होता। किसी के लिए वह प्रेम की निशानी है, किसी के लिए प्रतीक्षा का साथी, किसी के लिए बचपन की कहानी और किसी के लिए उन अपनों की याद, जो दूर होकर भी मन के आकाश में हमेशा चमकते रहते हैं। चाँद एक है, लेकिन उससे जुड़ी भावनाएँ अनगिनत हैं। यही तो उसकी खूबसूरती है—वह आकाश में रहते हुए भी हर व्यक्ति के जीवन में अपनी अलग जगह बना लेता है। शरद पूर्णिमा की उजली रात हो या करवाचौथ का पारंपरिक पर्व, चाँद भारतीय जीवन और संस्कृति में अपनी विशिष्ट उपस्थिति रखता है। शरद पूर्णिमा चाँदनी, लोकविश्वास और उत्सव की याद दिलाती है, जबकि करवाचौथ अनेक दंपतियों के लिए प्रेम, प्रतीक्षा और पारिवारिक परंपरा से जुड़ा अवसर है। इन पर्वों का भावनात्मक महत्व लोगों की मान्यताओं और व्यक्तिगत अनुभवों के अनुसार अलग-अलग हो सकता है। कभी चाँदनी में बैठकर चाँद को निहारा जाता है, कभी उसके माध्यम से किसी...

हमारे पूर्वज और पितृपक्ष

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  हमारे पूर्वज और पितृपक्ष हम जिस जीवन को आज जी रहे हैं, उसके पीछे केवल हमारा अपना परिश्रम नहीं, बल्कि हमारे पूर्वजों के संस्कार, संघर्ष और आशीर्वाद भी जुड़े हुए हैं। उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ सहा, सीखा और संजोया, वही विरासत बनकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम तक पहुँचा है। भारतीय संस्कृति में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की एक सुंदर परंपरा है—पितृपक्ष। यह केवल तर्पण और श्राद्ध की परंपरा नहीं, बल्कि उन दिवंगत आत्मीयजनों को प्रेम और सम्मान से स्मरण करने का अवसर है, जिनकी वजह से हमारा परिवार और हमारी परंपराएँ आज भी जीवित हैं। पितृपक्ष हमें याद दिलाता है कि जीवन की जड़ें बहुत गहरी होती हैं। हम एक वृक्ष की तरह हैं और हमारे पूर्वज उस वृक्ष की जड़ें हैं। जड़ें दिखाई नहीं देतीं, फिर भी वही वृक्ष को मजबूती देती हैं। उसी तरह हमारे पूर्वज भले ही आज हमारे बीच प्रत्यक्ष रूप से न हों, लेकिन उनके संस्कार, उनकी सीख और उनकी स्मृतियाँ हमारे जीवन में कहीं न कहीं मौजूद रहती हैं। बचपन में दादा-दादी और नाना-नानी से सुनी कहानियाँ, उनके बताए दोहे और कहावतें, उनकी छोटी-छोटी सीख और परिवार को साथ रखने की उ...

उम्र की ढलान

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  उम्र की ढलान… यह शब्द सुनते ही न जाने क्यों मन में एक ठहराव-सा आ जाता है। लगता है जैसे जीवन की शाम दस्तक दे रही हो, जैसे पीछे छूटे रास्तों पर लौटकर देखने का समय आ गया हो। लेकिन क्या ढलती उम्र का अर्थ केवल बीतते समय को गिनना है? नहीं… जीवन की हर उम्र अपने साथ एक अलग उजास लेकर आती है। बचपन की चमक आँखों में होती है, जवानी का उजाला सपनों में और उम्र की ढलान का प्रकाश अनुभवों में। समय चेहरे पर कुछ रेखाएँ ज़रूर खींच देता है, बालों में चाँदी ज़रूर भर देता है, लेकिन यदि मन में उम्मीद, प्रेम और सीखने की चाह जीवित हो तो जीवन कभी बूढ़ा नहीं होता। 🌿 एक छोटी-सी कहानी शारदा जी की उम्र सत्तर वर्ष पार कर चुकी थी। बच्चे अपने-अपने परिवारों में व्यस्त थे। पति को गुज़रे भी कई वर्ष हो चुके थे। घर शांत रहता और दिन कभी-कभी बहुत लंबे लगते। एक सुबह उन्होंने घर के कोने में रखे पुराने गमलों को देखा। मिट्टी सूख चुकी थी। उन्होंने सोचा—  “जब इन पौधों को फिर से जीवन दिया जा सकता है, तो अपने जीवन में रंग क्यों नहीं भरे जा सकते?” उन्होंने पौधों में पानी देना शुरू किया। धीरे-धीरे नए पौधे लगाए। फिर उन्होंने ...

विसर्जन — एक दिन मन का भी

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गणपति विसर्जन  विसर्जन — एक दिन मन का भी  हर वर्ष की तरह इस बार भी घर में उत्सव का वातावरण था। पूजा के बाद जब विसर्जन का समय आया, तो घर के सभी लोग भावुक हो उठे। प्रतिमा को विदा करते हुए मन में यही भावना थी कि अगले वर्ष फिर प्रभु का आगमन होगा। उसी समय मेरी दृष्टि घर के एक कोने में बैठी एक परिचित महिला पर पड़ी। वह चुप थीं। चेहरे पर उदासी थी। मैंने पास जाकर पूछा, “क्या हुआ?” उन्होंने धीमे से कहा, “कुछ नहीं… बस मन में बहुत कुछ जमा हो गया है।” बातों-बातों में उन्होंने बताया कि उन्हें अपनी एक रिश्तेदार से पुरानी नाराज़गी थी। वर्षों पहले हुई एक छोटी-सी बात धीरे-धीरे मन में इतनी बड़ी हो गई कि अब सामने आने पर भी दोनों एक-दूसरे से ठीक से बात नहीं कर पाती थीं। ऊपर से सब सामान्य था, लेकिन भीतर कहीं ईर्ष्या, शिकायत और द्वेष जमा था। मैंने मुस्कुराकर कहा, “आज जब हम भगवान का विसर्जन कर रहे हैं, तो क्यों न अपने मन में जमा इन भावों का भी विसर्जन कर दें?” वह कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “लेकिन इतने वर्षों की नाराज़गी इतनी आसानी से कैसे जाएगी?” मैंने कहा, “शायद एक दिन में पूरी तरह न जाए, लेकिन शु...

आपने मुझे थामा, अब मेरी बारी है

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  आपने मुझे थामा, अब मेरी बारी है सरोज प्रसाद राय का आत्मकथ्य | रिश्तों की समझ, जिम्मेदारी और अपनत्व का सार उलझन सुलझन • महिला लेखिका प्रकोष्ठ की पहल • आत्मचिंतन एवं पारिवारिक जीवन भूमिका : रिश्तों को जीने से मिली सीख का सार जीवन की यात्रा में हम बहुत कुछ सीखते हैं। कुछ सीखें पुस्तकों से मिलती हैं, कुछ अनुभवों से और कुछ उन रिश्तों से, जो हमें बिना किसी शर्त के थामे रहते हैं। समय बीतने के साथ समझ आता है कि जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल उपलब्धियों, सुविधाओं या संपत्ति में नहीं, बल्कि उन संबंधों में छिपी होती है, जहाँ अपनापन शब्दों से आगे बढ़कर व्यवहार बन जाता है। मैंने भी जीवन के विभिन्न पड़ावों पर रिश्तों को जाना, समझा और जिया है। माँ-पापा की उँगली पकड़कर चलने से लेकर अपने बच्चों का हाथ थामने तक की इस यात्रा ने मुझे एक बात गहराई से सिखाई है—जिस प्रेम और सहारे से हमारा जीवन सँवरता है, उसे आगे बढ़ाना भी हमारी जिम्मेदारी है। माता-पिता ने मुझे जीवन दिया, भाई-बहनों ने बचपन की साझी स्मृतियाँ दीं, विवाह ने परिवार का विस्तार किया, जीवनसाथी ने साथ निभाने का अर्थ समझाया और बच्चों ने प्रेम को ...

काश! लौट आए वो पल

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काश! लौट आए वो पल बरामदे में बैठी आरोही बारिश को देख रही थी। आसमान से गिरती बूँदें जैसे आज फिर उसे बरसों पीछे ले जा रही थीं। टेबल पर चाय का प्याला रखा था और सामने गरम पकौड़ों की प्लेट। सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसे पसंद था… फिर भी कुछ बहुत जरूरी चीज़ नहीं थी। माँ नहीं थी। आरोही ने धीरे से एक पकौड़ा उठाया। स्वाद अच्छा था, लेकिन उसे माँ के हाथों की वह बात कहाँ? उसे याद आया—बचपन में जैसे ही बारिश शुरू होती, वह खिड़की से चिल्लाती— “माँ! बारिश आ गई!” माँ रसोई से हँसते हुए कहतीं,  “अच्छा, अब मेरी बिटिया को पकौड़े चाहिए।” और फिर चाय-पकौड़ों का दौर शुरू हो जाता। आरोही पढ़ने बैठती तो माँ बार-बार उसके पास आकर पूछतीं, “थक तो नहीं गई?” “नहीं माँ।” “झूठ मत बोल। चल, पहले कुछ खा ले।” माँ उसकी आँखों को पढ़ लेती थीं। उसे क्या चाहिए, क्या अच्छा नहीं लग रहा, किस बात की चिंता है—उसे बताने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। समय बीतता गया। आरोही बड़ी हुई, पढ़ाई पूरी की और अपने सपने को पूरा करने के लिए दूसरे शहर चली गई। एक दिन उसने डॉक्टर की सफेद कोट पहनकर माँ के सामने खड़े होकर कहा— “देखो माँ, अब मैं डॉक्टर बन गई...

व्यस्तता का भ्रम और आंतरिक संतुलन

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व्यस्तता का भ्रम और आंतरिक संतुलन भूमिका आज का मनुष्य समय की कमी से कम और समय को सही ढंग से जीने की चुनौती से अधिक जूझ रहा है। सुबह से रात तक जिम्मेदारियों, सूचनाओं, संदेशों और अपेक्षाओं के बीच जीवन इतना व्यस्त दिखाई देता है कि रुकना भी अपराध जैसा महसूस होने लगा है। हम अपनी व्यस्तता को अपनी उपयोगिता और उपलब्धियों का प्रमाण मानने लगे हैं। लेकिन क्या निरंतर सक्रिय रहना ही सार्थक जीवन का प्रमाण है? क्या हर क्षण किसी न किसी काम में लगे रहना हमें वास्तव में संतुष्ट करता है? कई बार बाहरी गतिविधियों की अधिकता के पीछे भीतर की अस्थिरता छिपी होती है। शरीर काम करता रहता है, लेकिन मन थककर स्वयं से दूर होता जाता है। ऐसे में आवश्यकता काम छोड़ने की नहीं, बल्कि काम और जीवन के बीच संतुलन स्थापित करने की होती है। प्रस्तुत आलेख इसी महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार करता है कि व्यस्तता और सार्थकता के बीच अंतर को समझकर हम अपने भीतर शांति, संतोष और संतुलन कैसे बनाए रख सकते हैं। आलेख आज का जीवन पहले की तुलना में कहीं अधिक तेज़ हो गया है। सुबह आँख खुलते ही कार्यों की लंबी सूची सामने होती है। घर-परिवार, नौकरी, रिश्ते...

सुकून हमारे आस-पास ही है!

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सुकून हमारे आस-पास ही है!  भूमिका हमारी तेज होती दिनचर्या ने जीवन में सुविधाएँ तो बहुत बढ़ा दी हैं, लेकिन ठहरने के अवसर कम कर दिए हैं। जिम्मेदारियों के बीच मन जब थकने लगता है तो हमें लगता है कि सुकून शायद किसी दूर स्थान पर मिलेगा—किसी यात्रा में, किसी शांत शहर में या रोजमर्रा की दुनिया से कुछ समय दूर जाकर। किंतु क्या सचमुच शांति इतनी दूर है? शायद नहीं। कई बार वह हमारे आसपास ही होती है; आवश्यकता केवल इतनी है कि हम भागती हुई दिनचर्या के बीच कुछ क्षण ठहरें और उसे महसूस करें। आलेख कभी-कभी दिनभर की जिम्मेदारियाँ निभाते-निभाते ऐसा लगता है जैसे बाहर की भागदौड़ के साथ मन के भीतर भी कोई लंबी यात्रा चल रही हो। घर वही रहता है, लोग वही रहते हैं, काम भी वही रहते हैं, लेकिन भीतर कहीं एक अनकही थकान धीरे-धीरे अपना स्थान बना लेती है। ऐसे क्षणों में मन चाहता है कि सब कुछ कुछ देर के लिए छोड़ दिया जाए और किसी दूर स्थान की ओर निकल पड़ा जाए। किसी ऐसे स्थान पर, जहाँ सुबह अलार्म की आवाज से नहीं, पक्षियों की चहचहाहट से हो; जहाँ हवा केवल मौसम का एहसास न कराए, बल्कि किसी अपने के स्नेहिल स्पर्श जैसी लगे; जहाँ...