संत वाणी से उपजे विचार – 3

 ।। हरिओम ।।

संत वाणी से उपजे विचार 3 

यह संसार एक कर्मभूमि है। हम सभी यहाँ अपने-अपने कर्म निभाने के लिए आए हैं। इसे ऐसे समझें—जैसे ईश्वर ने इस जगत रूपी रंगमंच की रचना की है और हम सब उसमें कलाकार हैं। हर व्यक्ति को अलग-अलग भूमिका दी गई है, और हम सब अपने-अपने हिस्से का अभिनय कर रहे हैं।

जैसे एक फिल्म में अनेक कलाकार होते हैं—हर कोई अपना किरदार निभाता है, लेकिन भीतर से वह जानता है कि उसका असली रूप क्या है। वह अभिनय करता है, पर खुद को नहीं भूलता।

पर जीवन में अक्सर इसके विपरीत हो जाता है। यह गृहस्थ जीवन भी एक तरह का मंच है, एक चलती हुई कथा की तरह। हम अपने रिश्तों, जिम्मेदारियों और भूमिकाओं को निभाते-निभाते उनमें इतना उलझ जाते हैं कि अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल जाते हैं। हम अभिनय को ही सत्य मान बैठते हैं और अपनी आत्मा की पहचान से दूर हो जाते हैं।

संतों की वाणी हमें यही याद दिलाती है कि हम केवल यह शरीर या भूमिका नहीं हैं, बल्कि उससे कहीं अधिक हैं। इसलिए उनके ज्ञान को केवल सुनना ही नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतारना ही हमारा उद्देश्य होना चाहिए। तभी जीवन वास्तव में सुंदर और सार्थक बनता है।

शांति का मंत्र

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे

सार रूप में
अपने कर्म निभाइए, लेकिन अपने असली स्वरूप को मत भूलिए। जीवन के इस मंच पर अभिनय करते हुए भी अपने भीतर की आत्मा से जुड़े रहना ही सच्ची साधना है।

सूचना स्रोत 

सुलोचना धनावत

नागपुर

पाठ्य उन्नयन और विस्तार





प्रस्तुति



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