जज्बातों की दीर्घा

२. लब जो ना कह सके....  

    (रोमांटिक)

प्रिय...! सबसे प्रिय ....आज फिर न जाने क्यों दिल ने चाहा, तुम्हें ख्यालों में लाकर तुमसे कुछ बातें की जाएँ। पता है ना ख्यालों में कोई बंदिश नहीं होती। हम जो चाहें कह सकते हैं, कर सकते हैं। पर हकीकत में जब हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं, कह नहीं पाते तो जो बेचैनी होती है, वह शब्द भला कैसे बता पायेंगे? शब्द तो एक एहसास है। सच्चाई और अनुभूति की स्याही में डूबकर जब कलम कुछ लिखती है तो वो शब्द एहसासों की कोरी पड़ी दुनिया को सुंदर रंग से रंग देते हैं। उस दुनिया में जहाँ कोई और होता ही नहीं। बस सिर्फ हम होते हैं। अकेले में भी तब हम अकेले कहाँ रह पाते हैं। जब किसी का हर वक्त दिल और दिमाग दोनों पर कब्जा हो जाता है। सुबह-शाम उनके नाम होने लगती है जिन्हें हम जानते भी नहीं। यह कैसा बदलाव है जो पुरानी चीजों को बहाकर अपने लिए जगह बना लेता है-पानी की तरह। फिर यही बात-बात में आँखों से पानी बनकर बहने लगता है। मजबूत होते हुए भी हम कमजोर पड़ने लगते हैं। अपने आप से लड़ते हुए कितने परबस हो जाते हैं हम और किसी से कुछ कह तक नहीं पाते। जिस से शिकायत है, उसी से उसकी बात नहीं कह पाते, जबकि चाहते बहुत हैं कि कह दें ...हाँ .. हमें भी तुमसे मोहब्बत है। हमें भी वही चाहत की चाहत है। हम भी नहीं रह सकते तुम्हारे बिना... पर नहीं कह पाते क्यूँ.... ये नहीं जानते। पर इतना जरूर जानते हैं कि हमारे कहे बिना वह समझते हैं कि हम क्या कहना चाहते हैं और क्यों नहीं कह पा रहे। दिल की बेबसी बड़ी खामोशी से आँखों से आँसू बनकर टपक जाती है। आज इतना ही।अब यह क्षणिक स्नेह लेखनी विश्राम की इजाजत चाहती है।

रचनाकार

विजया डालमिया संपादक मेरी निहारिका

प्रस्तुति



१. मैं ना भूलूँगी (भावोत्कर्ष)

चिट्ठी ना कोई संदेश इस दिल को लगा के ठेस कहाँ तुम चले गए।

एक आह भरी होगी हमने ना सुनी होगी जाते-जाते तुमने आवाज तो दी होगी।

किसी गली से गुजरते हुए कभी-कभी पुरानी यादों से मुठभेड़ हो ही जाती है। लम्बा अरसा बीत जाने के बाद कुछ बदला-बदला सा जरूर नजर आता है। लेकिन फिर भी यादें एक के बाद एक सिरा पकड़ते हुए चली आती हैं। हमारा अपने ही मन पर कोई अधिकार नहीं होता। कुछ भी कैद कर सकता है। खुशी का अहसास या पीड़ा का जज्बा। कुछ घटनाएँ हमारे मन पर अमिट छाप छोड़ जाती हैं। सांसों के रहते हम उन्हें अपने से अलग नहीं कर पाते। गुजरे वक्त के पहलू में कुछ जज्बात होते हैं। गुजरे दिनों के साथ बीते एहसास होते हैं। आज मैं यहाँ जिस घटना का जिक्र करने जा रही हूं वह कोई सुखद अनुभूति नहीं बल्कि विधाता द्वारा किया गया एक ऐसा मजाक है जो स्वप्न बनकर मुझे आया और सच भी हो गया।

                        चित्र गूगल से संकलित सांकेतिक चित्र है।
बात सन 1978 की है। फरवरी में मैं अपनी एसएससी बोर्ड एग्जाम देकर अपने आप को काफी हल्का महसूस कर रही थी। रात में बेफिक्र होकर गहरी नींद में सोती थी। तभी एक रात मुझे सपना आया। सपने में मैंने देखा कि हम लोग दमोह धारा में जोकि मध्य प्रदेश में है वहाँ महाविष्णु यज्ञ हो रहा है। उसमें दर्शन के लिए हम जा रहे हैं। चूंकि मेरा मेरे ननिहाल पक्ष से बचपन से ही विशेष लगाव रहा है। तो वे सारे मुझे नजर आए और साथ ही दिखी मेरी मौसी। हाँ, वही मौसी जो मुझे दिलो जान से चाहती थी। वह मुझ से दो साल बड़ी थीं। हम दोनों का लगाव दो जिस्म एक जान वाली कहावत को चरितार्थ करता था। तो मैंने देखा पूर्णाहुति के दिन हम सब कुंड में स्नान कर रहे हैं व अचानक मौसी डूब गई। बस इतने में ही मेरी आँखें खुल गईं। भरी ठंड में मैं पसीने से तरबतर थी। फिर सारी रात मुझे नींद नहीं आई। पर मैंने अपने इस सपने को सपना समझकर ही भुला दिया। मैंने किसी से भी इसका जिक्र नहीं किया।

दो दिन के बाद नानी जी के यहाँ से हमें बुलाने के लिए कॉल आया। उन्होंने कहा दमोह धारा में महाविष्णु यज्ञ हो रहा है तो हम सब चलेंगे। मुझे अपना सपना याद आ गया और मैं अज्ञात भय से काँप उठी। हम बिलासपुर पहुँचे। वहाँ से मेटाडोर कर दमोह धारा के लिए रवाना हुए। सारे रास्ते गाना बजाना हंसी मजाक यही सब चलता रहा। मौसी बहुत जिंदादिल थी। जहाँ भी रहतीं वही समा बाँध देतीं। इसी मस्ती के साथ हम दमोह धारा पहुँच गए। वहाँ पन। दो दिन हमारे अच्छे से बीते। जिस दिन पूर्णाहुति थी हम सब स्नान करने कुंड में उतरे। मैं उस वक्त अपने सपने की बात लगभग भूल ही चुकी थी। मौसी ने मेरा हाथ पकड़ा और कहा आ जा। फिर हमने अपनी मामी जी को आवाज देकर बुलाया। वह बहुत डर रही थी। मौसी ने उनसे कहा क्या भाभी आप इतना डर रहे हो। मौत से क्या डरना? उसकी बात मानकर मामी जी ने मेरा हाथ पकड़ा। हम तीनों पानी में उतर गए और एक डुबकी अच्छे से ले ली। किन्तु दूसरी डुबकी लेते ही पानी का प्रवाह तेज हो गया और हम बहने लगे। फिर क्या हुआ कुछ नहीं पता। जब होश आया तो पता चला कि मौसी अभी तक नहीं मिली है। अपना सपना याद आ गया। मैं संज्ञा शून्य सी हो गयी। तीन घंटे बाद मौसी की डेड बॉडी मिली। मैं सकते की हालत में उसे देखे जा रही थी। उसके गले से लटकती हुई चेन, उसके लटकते हुए हाथ। कुछ समझ नहीं आ रहा था। पहली बार लगा जैसे पैरों के नीचे जमीन नहीं। 

                   चित्र गूगल से संकलित सांकेतिक चित्र है

आज इस बात को बीते कितने साल हो चुके हैं। उम्र की सलवटें चेहरे पर आ जाती हैं पर स्मृतियों में चेहरे वैसे ही दिखते हैं जो बिछड़ते वक़्त थे। हर चीज की ऋतु आती है। पर जाने वालों की नहीं। व्याकुल मन बावरा हो जाता है।

कुछ याद करके आँखों से आँसू निकल पड़े।

आखिर! मुद्दत के बाद गुजरे जो उस गली से हम।

रचनाकार


विजया डालमिया 

(संपादक मेरी निहारिका) और

राष्ट्रीय संयोजक

उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका विंग)

हैदराबाद

प्रस्तुति

सहयोग



 

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