नि:शब्द कर देने वाली नज़ीर
नि:शब्द कर देने वाली नज़ीर
कुछ घटनाएँ शब्दों से नहीं, अपने असर से पहचानी जाती हैं। वे शोर नहीं करतीं, पर भीतर बहुत कुछ बदल देती हैं। ऐसा ही एक प्रसंग—इतना सहज, इतना सादा—कि सुनने वाला कुछ पल के लिए ठहर जाए, जैसे समय ने खुद को धीमा कर लिया हो।
एक सम्मानित परिवार अपने बेटे के साथ एक साधारण-से घर में पहुँचा। उद्देश्य वही पारंपरिक—लड़की देखना, समझना, और निर्णय लेना। बातचीत हुई, औपचारिकताएँ निभीं, और फिर लड़का-लड़की को कुछ समय अकेले बात करने का अवसर दिया गया।
कुछ ही देर में सहमति बन गई—दो दिलों ने, दो परिवारों ने एक-दूसरे को स्वीकार कर लिया।
और तभी, जैसे किसी ने परंपरा की जटिलता पर सरलता का दीप जला दिया हो—
लड़के के पिता ने शांत स्वर में कहा,
“पंडित बुलाओ, फेरे कराओ।”
कमरे में एक क्षण के लिए सन्नाटा उतर आया।
लड़की का परिवार अवाक्—क्या इतना सहज भी हो सकता है?
क्या बिना शोर, बिना दिखावे, बिना भीड़ के भी एक रिश्ता अपनी पूर्णता पा सकता है?
पर वह आग्रह नहीं, एक स्पष्ट निर्णय था—
जहाँ संबंध की सच्चाई, आडंबर से बड़ी थी।
पंडित आए, मंत्र गूँजे, और सात फेरे—
न ढोल-नगाड़े, न बारात, न दिखावे की चकाचौंध—
सिर्फ दो परिवार, कुछ साक्षी, और एक पवित्र बंधन।
उस दिन कोई शोर नहीं हुआ,
पर एक गूंज बहुत दूर तक चली गई—
समाज के भीतर, सोच के भीतर, और उन दिलों तक
जो रिश्तों को खर्चों में नहीं, भावों में मापते हैं।
यह सिर्फ एक शादी नहीं थी,
यह एक संदेश था—
कि बड़े होने का अर्थ वैभव नहीं, **विवेक** होता है।
कि रिश्ते दिखावे से नहीं, **निर्णय की सादगी** से मजबूत होते हैं।
और सच तो यह है—
ऐसी नज़ीरें बोलती नहीं,
बस नि:शब्द कर देती हैं…
सूचना स्रोत
श्री लालबहार जी
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति



Comments
Post a Comment