साधारण घटनाओं में छिपी असाधारण अनुभूतियाँ

 साधारण घटनाओं में छिपी असाधारण अनुभूतियाँ

भूमिका

समाज का प्रत्येक संवेदनशील और बुद्धिमान नागरिक यह समझता है कि जीवन केवल बड़ी उपलब्धियों या ऐतिहासिक घटनाओं से नहीं बनता, बल्कि उन छोटे-छोटे क्षणों से निर्मित होता है, जिन्हें हम अक्सर साधारण समझकर अनदेखा कर देते हैं। परिवार के साथ बिताए गए पल, रिश्तों की गर्माहट, घर के आँगन में गूँजती आवाज़ें—ये सब मिलकर हमारे अस्तित्व की जड़ों को सींचते हैं।

जब ये क्षण स्मृतियों में बदलते हैं, तब उनकी महत्ता और भी गहरी हो जाती है। एक साधारण-सी घटना—जैसे किसी प्रियजन का बिछुड़ जाना—जीवन के अर्थ, रिश्तों की गहराई और समय की नश्वरता को इस तरह उजागर कर देती है कि वह अनुभव असाधारण बन जाता है। प्रस्तुत रचना भी ऐसी ही एक संवेदनात्मक यात्रा है, जिसमें ‘होने’ से ‘न होने’ तक का सफर केवल दूरी नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई को मापता है।

ताँगे से टैक्सी तक का सफर

ताँगे से टैक्सी तक का सफर,
होने से नहीं होने तक का सफर।

बादलों के पार एक जहाँ और भी है,
यादों के दरमियान—जो नहीं है, वह भी है।

31 दिसंबर, 2022…
“नानी नहीं रही…”

यह संदेश देखते ही हाथ-पाँव सुन्न हो गए। आँखों में आँसू आए—और वहीं जम गए। होंठ फड़फड़ाए, पर खामोश हो गए।

हालाँकि जानती थी… समझ भी रही थी… फिर भी दिल को समझाना अक्सर कठिन होता है—और यहीं हम हार जाते हैं। उस रोज़ भी यही हुआ।

मैं मम्मी से अक्सर कहती थी—
“मम्मी, जब नानी नहीं रहेंगी, तो मैं वहाँ नहीं जाऊँगी…”

मम्मी मुस्कराकर कहतीं—
“ऐसा थोड़ी होता है…”

मैं जिद करती—
“बिना नानी के नानी का घर कैसा? नानी से ही तो नानी का घर है…”

मम्मी चुप हो जातीं।
पर… मम्मी ही पहले चली गईं।

जब तक नानी थीं, लगता था—
मेरी मम्मी की मम्मी तो है,
जो हमें मम्मी से भी ज़्यादा प्यार करती है।

पर अब… कोई नहीं।


आज मैं नानी की बिखरी यादों से मिलने जा रही हूँ।

प्लेन में बैठते ही आँखें बंद कर लीं—ताकि यादों को कैद कर सकूँ।
पर यादें कैद कहाँ होती हैं…
वे तो आँखें बंद करते ही आँसुओं बनकर बह निकलीं।

“अरे, बिजली के कर रही तू?”

बिजली…
नानी का दिया हुआ नाम।
प्यार भी आता तो इसी नाम से बुलातीं,
गुस्सा भी आता तो इसी नाम से।

जब मैं कहती—
“मेरा मूड नहीं है…”

तो तुरंत जवाब आता—
“आग लगे थारा मूंड न!”

हमें लगता—नानी गुस्सा कर रही हैं,
पर सच में… वो हमें समझा रही होती थीं।

अचार के लिए कटी कैरियों को लेकर छत पर भाग जाना…
“ताला भीतर कमरा”—जहाँ नानी अपनी चीज़ें छुपाकर रखती थीं…
आज के समय में ऐसे नाम कहाँ सुनाई देते हैं?

अनाज फटकती हुई नानी…
बिलोना करती हुई नानी…
सब्जियाँ सुधारती हुई नानी…
आने-जाने वालों से बतियाती हुई नानी…

नानाजी की छेड़छाड़ का जवाब झूठ-मूठ के गुस्से से देती हुई नानी…
चूल्हे पर बड़ी-बड़ी गोल रोटियाँ बनाती हुई नानी…
मंदिर में हाँफते हुए भी आरती गाती हुई नानी…

भजन सुनाने की जिद…
गीता का पाठ कराने का आग्रह…
तुलसी वाली खालिस दूध की चाय…

दोपहर के सन्नाटे में भी जागती हुई नानी—
और हमें सिखाती हुई—
“सोते हुए भी जागना, और जागते हुए भी सोना…”

“अपने हाथ में खुद से मेहंदी लगा…”
कहते-कहते उन्होंने मुझे इतना दक्ष बना दिया
कि मुझे पुरस्कार भी मिला—
और जज बनने का अवसर भी।

ऐसी थी नानी—
ना किसी को दम लेने देती,
ना खुद दम लेती।

पल में गुस्सा, पल में प्यार—
और दोनों ही सच्चे।

ना बातों में बनावट,
ना रिश्तों में मिलावट।


आज उनकी यादें मुझे चारों ओर से घेर रही हैं।

मैं वहाँ जा रही हूँ—
जहाँ अब वो नहीं हैं।

पर उनकी आत्मा तो जैसे अब भी उसी गोल बाज़ार में बसती है…
जहाँ हमारी सारी यादें साँस लेती हैं।

मैं सोचती हूँ—
घर तो नानाजी ने बनाया था,
फिर भी हम हमेशा “नानी का घर” ही क्यों कहते हैं?


ताँगे में बैठकर नानी के घर जाना—
अपने आप में एक उत्सव होता था।

सारे रास्ते ताँगे की आवाज़ सुनना…
और जीभ से वही आवाज़ निकालने की कोशिश करना…

हम अक्सर गर्मियों में जाते थे।
शाम के सात बजे तक उजाला रहता था।

ऊपर बालकनी से ताँगे की आवाज़ सुनकर
नानी झाँकती हुई दिखाई देतीं…

सीढ़ियों से दौड़ते हुए आते बच्चे…
नीचे “गद्दी” पर बैठे मुनीमजी और मामाजी…
हर चेहरा—खिला हुआ।

ऊपर पहुँचते ही—
सीढ़ियों के पास खिड़की में खड़ी नानी…
झूठ-मूठ का गुस्सा…
और फिर—अपने से लिपटा लेना।


आज…

जब टैक्सी में बैठी हूँ,
तो सब कुछ धुंधला है।

नज़रें रास्तों को ढूँढ़ रही हैं,
और रास्ते—मुझे पहचानने की कोशिश कर रहे हैं।

एक अजीब-सी कशमकश में—
मैंने ताँगे से टैक्सी तक का सफर
भीगी आँखों से तय किया।


और फिर…

मैं पहुँच गई—
वहाँ, जहाँ नानी अब
जिंदगी से मुक्त होकर
एक तस्वीर में मुस्कुरा रही हैं।

सबको आशीर्वाद देती हुईं…
शायद एक शिकायत के साथ—

“अब क्यों आए?”

पहले आते—
तो गले लगा लेती…

उनकी आँखों में एक अनकहा दर्द…
और मेरे दिल में—
एक कभी न खत्म होने वाला पछतावा।


तभी मामी जी की आवाज़ आई—
“ऐसा कभी मत सोचना कि नानी नहीं रहीं,
तो नानी का घर भी नहीं रहा…”

और मैं—
उनके गले लगकर
फूट-फूटकर रो पड़ी…।


रचनाकार

 

विजया डालमिया 
राष्ट्रीय संयोजिका 
उलझन सुलझन (महिला लेखिका विंग)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 







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