मेरी डायरी की दुनिया

मेरी डायरी की दुनिया

भूमिका 

कभी-कभी शब्द केवल शब्द नहीं होते, वे एक स्त्री के मौन का स्वर होते हैं—उसके सपनों की आहट, उसकी प्रतीक्षा की धड़कन और उसके आत्मसम्मान की पुकार। “मेरी डायरी की दुनिया” ऐसी ही एक संवेदनशील रचना है, जिसमें एक स्त्री के मन के दो महत्वपूर्ण पक्ष एक साथ उभरते हैं—उसका आत्मबोध और उसका भावनात्मक संसार।

इस कविता में स्त्री केवल प्रेम की आकांक्षा नहीं करती, वह सम्मान, समानता और स्वतंत्रता की भी अपेक्षा रखती है। वह चाहती है कि उसे उसकी योग्यता से पहचाना जाए, न कि केवल उसकी बाहरी सुंदरता से। यह स्वर आज की जागरूक स्त्री का है, जो अपने अधिकारों को जानती है और उन्हें पाने की दृढ़ इच्छाशक्ति भी रखती है।

वहीं, रचना का दूसरा आयाम प्रतीक्षा और प्रेम की उस कोमल वेदना को अभिव्यक्त करता है, जहाँ एक सच्चे संबंध की सच्चाई, भरोसा और समय की कीमत सामने आती है। एक झूठ, एक अधूरा वादा—कैसे किसी के मन को पूरी रात उदासी में डुबो सकता है, यह भाव अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत हुआ है।

प्रमिला त्रिवेदी की यह रचना केवल एक स्त्री की कहानी नहीं, बल्कि हर उस दिल की अभिव्यक्ति है जो प्रेम में सच्चाई और जीवन में सम्मान चाहता है। यह कविता पाठक को भीतर तक छूकर एक प्रश्न भी छोड़ जाती है—क्या हम सच में उन भावनाओं की कद्र करते हैं, जिनकी प्रतीक्षा कोई चुपचाप करता है?

यह रचना न केवल पढ़ी जाने के लिए है, बल्कि महसूस किए जाने के लिए है—एक डायरी के पन्नों से निकलकर जीवन के सच्चे आईने में झांकने के लिए।

मेरी डायरी की दुनिया   

एक स्त्री चाहती है एक अच्छा जीवन, 

जहाँ प्यार और सम्मान मिले। 

उसे मिले एक गर्म हथेली और प्रेमिल स्पर्श, 

एक जीवन जहाँ वह सम्मानित हो।  

उसे मिले बराबर का हक़, 

उसकी योग्यता को उसकी सुंदरता से तौला जाए। 

उसे मिले एक सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन, 

जहाँ वह अपने सपनों को पूरा कर सके।  

उसे मिले एक भविष्य, 

जहाँ वह स्वतंत्र हो, 

एक मजबूत स्त्री, 

जिसके दिल में खुशी हो। 

जहाँ उसकी आवाज़ सुनी जाए, 

और! उसके अधिकार सम्मानित हों, 

एक दुनिया जहाँ प्यार और दया हमेशा सुरक्षित हों। 

अब जब भी मिलना, झूठ न बोलना, 

क्योंकि एक झूठ तुम्हारा, 

सारी रात इंतज़ार करवाता है, 

जब भी बोलते हो, आने को, कभी आते नहीं, 

कर जाते हमेशा मेरा मन उदास, 

इंतज़ार कभी करते नहीं न, 

इसलिए तुम्हें पता नहीं इसका दर्द  

कभी मेरा भी इंतज़ार किया करो, 

मुझे पता है करते होंगे पल पल मेरा भी इंतज़ार, 

तुम फ़लक से और मैं जमीं से, 

कैसा है न यह इंतज़ार...... ❤️ 

रचयिता

 
श्रीमती प्रमिला त्रिवेदी 
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
बैंगलोर
पाठ्य 






प्रमिला त्रिवेदी

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