संस्मरण

संस्मरण

🌼भूमिका🌼

माँ केवल एक संबंध नहीं, बल्कि जीवन की सबसे गहरी अनुभूति होती है। उनका स्नेह, उनका स्पर्श और उनका साथ हमारे अस्तित्व की जड़ों में समाया रहता है। जब माँ इस संसार से विदा लेती है, तब जीवन चलता तो रहता है, पर भीतर एक ऐसी रिक्तता जन्म ले लेती है जिसे कोई भर नहीं सकता। यह संस्मरण उसी अटूट प्रेम, स्मृतियों और विरह की मार्मिक अभिव्यक्ति है—जहाँ माँ आज भी सितारों की तरह टिमटिमाती हुई हर पल अपने होने का एहसास कराती हैं।

🌺संस्मरण🌺

नम आँखों से माँ, तुम्हें नमन है… 😢

19 अप्रैल

पाँच साल पहले इसी दिन मम्मी हमें छोड़कर चली गईं। मम्मी, जो हमें चाँद-तारों को दिखाकर कहानियाँ सुनाया करती थीं, आज खुद एक कहानी बन गई थीं। उसी दिन पहली बार मेरे मुँह से निकला—“मम्मी तारा बन गयीं…” और तब से सचमुच उनका आशीर्वाद एक सितारे की तरह हर पल टिमटिमाता महसूस होता है।

उनके कंपकंपाते हाथ सिर पर फेरना, वह स्नेहिल स्पर्श आज भी बहुत याद आता है। मम्मी के जाने के बाद वैसा स्पर्श कहीं नहीं मिला… कभी नहीं मिला।

साल 2021 में फ्रैक्चर के कारण मुझे दो महीने मम्मी के पास रुकना पड़ा। समय लंबा था, लेकिन माएँ अपने बच्चों को तकलीफ महसूस कहाँ होने देती हैं। बिस्तर पर लेटे-लेटे हम दोनों खूब बातें करते, भजन गाते और समय जैसे ठहर-सा जाता।

जिस दिन मैं वहाँ से लौट रही थी, गाड़ी में बैठने से पहले मैंने मम्मी को देखा—वे उदास-सी खड़ी थीं। उसी क्षण दिल के भीतर से एक आवाज आई—शायद मैं मम्मी को आख़िरी बार देख रही हूँ… अगली बार आने पर शायद वे न मिलें। यह पूर्वाभास क्यों और कैसे हुआ, मैं आज तक नहीं समझ पाई… पर दो महीने बाद ही मम्मी सचमुच चली गईं।

वह दृश्य आज भी आँखों के सामने ताज़ा है।
जीवन यूँ ही चलता रहता है—हम जीते हैं, हँसते हैं, सब कुछ सामान्य दिखाई देता है… पर एक सच्चाई हमेशा भीतर चुभती रहती है—सब कुछ है, बस माँ नहीं है।

सब कुछ गतिमान रहता है, पर कभी-कभी आँखें बगावत कर बैठती हैं और सब कुछ धुंधला-सा हो जाता है। शायद इसीलिए जब आसमान रोता है, तो तारे नज़र नहीं आते…

लव यू मम्मी…
मिस यू मम्मी… 💔

संस्मरण रचयिता

 
श्रीमती विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन महिला लेखिका इकाई
हैदराबाद 
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 








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