जज़्बात

'​अद्वैत का सूर्य: आदि शंकराचार्य'

जन्म जयंती के अवसर पर

​अद्वैत के उस मौन शिखर पर, जहाँ न द्वैत का नाम है, 

वहीँ खड़ा वह दिव्य ऋषि है, जिसका शिव विश्राम है। 

त्रिपृण्ड माथे पर विभासित, 

ज्ञान की अविरल धारा है, 

जिसके तर्क़ की अग्नि में, 

माया का तिमिर हारा है। 

​चतुर्दिक ज्ञान की मर्यादा

​चार दिशाएं, चार मठ, 

मानो चेतना के स्तंभ खड़े,

जहाँ वेद की ऋचाओं के, 

शाश्वत दीपक यहाँ जगे।

​बद्रीनाथ में ज्योतिर्मठ, 

ज्ञान की उच्च तुंगता है,

​पुरी का गोवर्धन मठ,

अन्न-रस की पूर्णता है।

​द्वारका की शारदापीठ,

मेधा की प्रखर तलवार है,

​श्रृंगेरी का धर्म-सिंहासन, 

भक्ति का आधार है।

​अद्वैत का दर्शन

​"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" का शंखनाद जिसने किया,

बुद्धि की सीमाओं से परे, 

बोध का अमृत दिया।

वह हाथ में लिए दण्ड,

वैराग्य की पहचान है,

किंतु भीतर उसके धड़कता, 

करुणा का ब्रह्मांड है।

​वह न ब्राह्मण, न शूद्र है,

न शरीर, न प्राण है,

वह तो स्वयं 'चिदानन्दरूप: शिवोऽहम्' का गान है।

आज २१ अप्रैल की इस पावन वेला पर,

कोटि नमन उस महागुरु को, 

जो स्वयं ज्ञान का सागर है।

​भारतीय सनातन संस्कृति के 

आदिगुरु शंकराचार्य ने मात्र ३२ वर्षों में वह कर दिखाया, 

जो युगों तक़ मानवता का मार्ग प्रशस्त करता रहेगा।

रचनाकार

डॉ दक्षा जोशी 'निर्झरा' 

स्थानीय संपादिका

उलझन सुलझन लेडीज विंग

अहमदाबाद (गुजरात) 

एक और प्रयास

आज आदी शंकराचार्य जी की जयंती पर कोटिश नमन वंदन।

प्रति वर्ष वैशाख माह की, शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को आदि शंकराचार्य जी की जयंती सभी मनाते हैं। आदि शंकराचार्य जी के माता पिता ने पुत्र प्राप्ति के लिए शंकर भगवान की बहुत आराधना और तपस्या की।

उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र सारे संसार में ख्याति प्राप्त करे। माता पिता की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने वरदान दिया। पर अल्पायु पुत्र होगा। 32 वर्ष की आयु मिली। उन्हें तत्वज्ञान का आशीर्वाद मिला।

उन्होने असंख्य स्रोतों की रचना की जो आज भी घर-घर में पढ़े जाते हैं। उन्होंने जीवन कैसे जिया जाए, इस पर बहुत सुंदर स्रोत लिखा, जिसका नाम चरपट पंजरी है।

भज गोविंदम भज गोविंदम भज गोविंदम भज मूढ़ मते।

जब हम छोटे थे तो दादाजी ने इसके चार-पांच श्लोक हमें सिखाए थे और उसका अर्थ तो कितना सुंदर है।

कहते हैं एक बार शंकराचार्य जी कहीं जा रहे थे तो एक विद्यार्थी जोर-शोर से रट रट कर अभ्यास कर रहा था। तब उन्हें ये चरपट पंजरी लिखने की प्रेरणा मिली।

जोर जोर से वाचन करने से रट्टू तोते के जैसे वाचन से ज्ञान नही मिलता। मोह माया से खुद को दूर रखकर, नश्वर जीवन से उद्धार कैसे हो ये सिखाने के लिए, 

उन्होंने इसकी रचना की,

भज गोविंदम, भज गोविंदम, भज गोविंदम भज मूढ़ मते।

प्राप्ते संहिते मरने नहीं नहीं, रक्षति डुकृकरणे। 

हे मोह माया में फसे हुए मानव, गोविंद का भजन कर,

मृत्यु जब नजदीक आने पर तोते जैसे रटने से कुछ नहीं होता। आत्ममंथन कर। अति सारगर्भित अर्थ है इस चरपट पंजरी का। कमल के पत्ते पर जल जैसे थरथराता है वैसा ही यह जीवन है। आदि व्याधि से जग जैसे तुरंत दूर हो जाता है, जब तक मानव धनोपार्जन करता है तभी तक वो परिवार को प्रिय लगता है, पर वृद्धावस्था में उसे कोई भी नही पूछता। 

जब तक पैसा गांठ में है, तब तक घर के लिए वो काम का है वो प्राणी। होती जब ये जर्जर काया, तब कोई सुनवाई नहीं करता। जीवन का सार समझाने के लिए इस रचना को अवश्य पढ़ना चाहिए यानि शरीर रूपी पिंजरे मे जीवात्मा रूपी तोता है जो कभी भी उड़ान भर कर चला जाएगा।

भज गोविंदम भज मूढ़ मते।

रचनाकार

प्रमिला त्रिवेदी

स्थानीय संपादिका

उलझन सुलझन लेडीज विंग

बैंगलोर

पाठ्य उन्नयन और प्रस्तुति






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