प्रेम का प्रतीक है पारिजात।
प्रेम का प्रतीक है पारिजात।
भूमिका
प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषाएँ अक्सर शब्दों में नहीं, अनुभूतियों में जन्म लेती हैं। जैसे रात की निस्तब्धता में चुपचाप खिलने वाला पारिजात—जो बिना शोर किए अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, और बिना किसी अपेक्षा के अपनी सुगंध बिखेर देता है। प्रेम भी कुछ ऐसा ही होता है—निस्वार्थ, मौन, और पूरी तरह समर्पित।
प्रमिला त्रिवेदी के ये शब्द उसी पारिजात की तरह हैं, जो रात के अंधेरे में उजास भर देते हैं। इनमें प्रेम की वह कोमलता है, जो किसी के लिए खिलने की चाह रखती है, और वह गहराई भी, जो अपने अस्तित्व को किसी और के जीवन में समर्पित कर देती है। यह रचना केवल भावों का संकलन नहीं, बल्कि उस एहसास का साक्षात रूप है, जिसमें प्रेम अपने होने का प्रमाण नहीं देता—बल्कि अपनी महक से उसे महसूस करा देता है।
इन पंक्तियों में प्रेम कोई दावा नहीं करता, वह बस धीरे-धीरे हृदय में उतरता है—जैसे पारिजात की भीनी खुशबू, जो रात भर वातावरण को महकाती है और सुबह चुपचाप झर जाती है, पर अपने पीछे एक मधुर स्मृति छोड़ जाती है। यही प्रेम की सच्ची पहचान है—खिलना, महकना और समर्पित होकर भी किसी के जीवन को सुंदर बना जाना।
कविता
प्रेम, पारिजात
जैसे जैसे रात बढ़ती जाती है
पारिजात और खिलने लगते है
मीठी मीठी भीनी भीनी खुश्बू से
वातावरण महक उठता है,
और इसी को तो प्रेम कहते है,
किसी के लिए खिलना
फिर उसके लिए ही वातावरण
महका देना और झर जाना
प्रेम में समर्पित होकर,
पर उसे ये यकीन दिलाना
पड़ता है ,की तुम्हारे सिवा
किसी और का साथ नही
चाहिए, एक तुम ही हो
जिसको हम अपनी महक से
सुगंधित कर देते है,
और क्या ये प्रेम नही है,
की किसी की ज़िंदगी मे
खुश्बू बिखेर कर ,
खिलकर उसके आंगन में
झर जाना,ये प्रेम नही तो क्या है।
और उसे ये अहसास दिलाना
की कोई है ,जो सच्चे मन से चाहता है उसे।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
बैंगलोर
प्रस्तुति







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