संत वाणी से उपजे विचार
।। हरिओम ।।
संत वाणी से उपजे विचार
मनुष्य का मन बड़ा चंचल होता है। वह कभी बीते हुए पलों में उलझा रहता है, तो कभी आने वाले समय की चिंता, कल्पनाओं और योजनाओं में भटकता रहता है। इसी भटकाव में वह वर्तमान को भूल जाता है—जबकि सच्चा जीवन तो इसी क्षण में बह रहा होता है।
वर्तमान एक बहती हुई धारा की तरह हमारे पास से गुजरता रहता है, पर मन की उलझनों के कारण हम उसे देख ही नहीं पाते। जो आज हमारे सामने है, वही सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन हम उसे पहचान नहीं पाते और जीवन के असली अनुभव से चूक जाते हैं।
इसीलिए संतों ने कहा है कि मन की तृष्णाओं को शांत करना आवश्यक है। जब मन की इच्छाएँ कम होती हैं, तब भीतर जागरूकता बढ़ती है। और जब जागरूकता आती है, तब हम जीवन को केवल जीते नहीं, बल्कि उसे समझने भी लगते हैं।
सच्चा जीवन वही है, जहाँ हम पूरी तरह वर्तमान में उपस्थित हों। तभी हम जान पाते हैं कि जीवन वास्तव में क्या है।
शांति का मंत्र
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे
यह मंत्र केवल शब्द नहीं, बल्कि मन को स्थिर करने और वर्तमान में लौटने का एक माध्यम है। यह हमें भीतर की शांति से जोड़ता है।
सार रूप में
अनावश्यक इच्छाओं को छोड़ें, मन को वर्तमान में टिकाएँ—तभी जीवन का वास्तविक स्वरूप समझ में आएगा।
सृजक
सुलोचना धनावत
पाठ्य उन्नयन और विस्तार





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