हम ही सिखाते हैं
हम ही सिखाते हैं
भूमिका
समाज की संरचना केवल नियमों और परंपराओं से नहीं बनती, बल्कि उन अदृश्य शिक्षाओं से भी आकार लेती है, जिन्हें हम अनजाने में अगली पीढ़ियों को सौंपते जाते हैं। “हम ही सिखाते हैं…” जैसी पंक्ति से आरंभ होने वाली यह कविता उसी गहरी सच्चाई को उजागर करती है—एक ऐसी सच्चाई, जिसमें दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे सामूहिक सोच का है।
यह काव्य रचना हमारे भीतर झांकने को मजबूर करती है। हम अक्सर स्वयं को निर्दोष मान लेते हैं, परंतु कवि हमें यह एहसास कराते हैं कि जिन जंजीरों को हम तोड़ना चाहते हैं, उन्हीं को हम अनजाने में और मजबूत भी करते हैं। बेटियों, स्त्रियों या कमजोर माने जाने वाले वर्गों को जो सीमाएँ, डर, और चुप्पी हम सिखाते हैं, वही आगे चलकर एक परंपरा बन जाती है—एक ऐसी परंपरा, जो स्वतंत्रता को त्याग और सहनशीलता के नाम पर कैद कर देती है।
कवि गुरिंदर सिंह कलसी की यह रचना केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि एक सामाजिक दर्पण है। यह हमें कठोर प्रश्नों के सामने खड़ा करती है—क्या हम वास्तव में बदलाव चाहते हैं, या सिर्फ उसके भ्रम में जी रहे हैं? अनुवादक सुधीर कुमार ने इस भाव को सहज और प्रभावी भाषा में प्रस्तुत कर पाठकों तक इसकी संवेदना को पूरी गहराई से पहुँचाया है।
यह कविता एक पुकार है—सोच बदलने की, परंपराओं को परखने की, और उन अदृश्य शिक्षाओं को पहचानने की, जो इंसान को इंसान से ही दूर कर देती हैं। जब तक हम यह स्वीकार नहीं करते कि “हम ही सिखाते हैं…”, तब तक बदलाव की शुरुआत संभव नहीं।
यह भूमिका पाठक को केवल कविता पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे महसूस करने और उसके भीतर छिपे प्रश्नों से संवाद करने के लिए आमंत्रित करती है।
कविता
हम ही सिखाते हैं उसको
कि तुम हो कमज़ोर
कि ये तेरा घर नहीं
तेरा घर है कोई और
हम ही सिखाते हैं उसको
कि नमित होकर रहना
सब-कुछ सह जाना
बस चुपचाप ही रहना
हम ही सिखाते हैं उसको
कि नज़र कैसे झुकानी है
पीढ़ी-दर-पीढ़ी ज़ुल्म सहने की
आदत कैसे बनानी है
हम ही सिखाते हैं उसको
कि रोज़मर्रा ज़िंदगी में
मशीन कैसे बनना है
हर किसी को खुश रखना है
और आंसूओं को कैसे छिपाना है
हम ही सिखाते हैं उसको
कि गुलामी को कुर्बानी में
कैसे तब्दील करना है
भारी भरकम लफ़्ज़ों के नीचे
स्वयं को कैसे दफ़नाना है
सूचना स्रोत
रचनाकार
गुरिंदर सिंह कलसी
अनुवादक
सुधीर कुमार
पाठ्य उन्नयन और विस्तार






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