खुशी
खुशी....
जब से मुझे वह मिला मेरी खुशी की, मदहोशी की कोई सीमा नहीं। हर पल एक ही बात ....आए हो मेरी जिंदगी में तुम बहार बनके ....सुबह की शुरुआत उसी एक आवाज के गुनगुनाहट से। शाम और रात उसी की आवाज से जो एक लोरी की तरह मुझे सुलाते चली जाती है। आँखें इतनी नशीली कि मैं उन में डूब जाती हूँ। हरकतें इतनी चुलबुली और मस्ती भरी कि पल- पल अपने बचपन में पहुँच जाती हूँ। प्रेम की कोई भाषा नहीं होती और शायद इसीलिए हमारे बीच कोई संवाद नहीं होते। किंतु हमारा मौन एक दूसरे को एक दूजे की तरफ खींचता रहता है। कितनी ही बातें हम आपस में करते रहते हैं। उसके साथ सुर में सुर मिलाकर बेसुरा होकर गाना भी मजा देता है। चाय की गरमी हो या लस्सी की ठंडक उसके बिना मौज नहीं।अचार का चरपरापन हो या खीर की मिठास बिना उसके स्वाद नहीं।मेरे अकेलेपन को अपने प्यार से उसने दूर किया। आते-जाते हर वक्त मुझे संभालना। मेरा उदास चेहरा देखकर मुझे हँसाने की कोशिश करना... यह सब प्यार नहीं तो और क्या है? बस मेरे लिखने से उसे बेहद एतराज है क्योंकि उसका समय बँट जाता है। एक वही तो है जिसे हक है मेरी कलम को रोक देने का। मेरी सोच को पल में बदल देने का। बावजूद उसके उसकी आहट मेरे दिल में खुशी जगा देती है। उसके बिना एक पल मन नहीं लगता। जब वह नहीं होता तो हर जगह एक सन्नाटा... और सूनापन नजर आता है। हाँ! एक बात तो मैं बताना ही भूल गई कि अपनी हर बात मनवाने के लिए रोना उसका फेवरेट काम है। उसके लिए क्या - क्या कहूं ...वह मेरा दीवाना है और मैं उसकी दीवानी। हमारी दीवानगी सबके बीच चर्चाएं खास हो गईं क्योंकि मेरी जान अब उसमें बसती है। मेरी सांसों को अपने प्यार के अहसास से धड़का कर नए रिश्तों से पहचान कराने वाला मेरा नया बॉयफ्रेंड है... मेरा मोहन... मेरा मानविक मेरा पोता..... मेरा श्याम सुंदर जिसके बिना अब मैं नहीं रह सकती....
रचनाकार
विजया डालमिया
संपादक मेरी निहारिका और
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका इकाई)
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति





Comments
Post a Comment