चींटी चढ़ी पहाड़
चींटी चढ़ी पहाड़
भूमिका
जीवन की राहें अक्सर सीधी और सरल नहीं होतीं। कभी वे ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों जैसी लगती हैं, तो कभी मन स्वयं ही अपने भीतर उलझकर राह भूल जाता है। ऐसे ही किसी क्षण में जब मन दिशाहीन हो जाता है, तब प्रकृति का एक छोटा-सा दृश्य भी हमें बड़ी सीख दे जाता है। प्रस्तुत कविता “चींटी चढ़ी पहाड़” इसी गहन जीवन-सत्य को अत्यंत सरल और प्रभावी रूप में उजागर करती है।
रचनाकार धर्मेन्द्र खटाना “धम्मू” ने एक साधारण-सी दिखने वाली चींटी के संघर्ष को जीवन के विराट दर्शन से जोड़ दिया है। चींटी का बार-बार गिरना, फिर उठना, और अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहना—यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि मानव जीवन की जिजीविषा का प्रतीक बन जाता है। जब मन निराशा में डूब जाता है, तब यही छोटी-सी चींटी हमें धैर्य, साहस और निरंतर प्रयास का महत्व समझाती है।
कविता की विशेषता इसकी सहजता और भावनात्मक गहराई है। यह न केवल प्रेरणा देती है, बल्कि पाठक के भीतर आत्ममंथन की एक प्रक्रिया भी प्रारंभ करती है—कि जब एक नन्हा जीव अपने लक्ष्य से नहीं डिगता, तो मनुष्य क्यों ठहर जाता है? क्यों वह ‘किन्तु-परन्तु’ में उलझकर अपने ही पथ से भटक जाता है?
यह रचना केवल शब्दों का संयोजन नहीं, बल्कि जीवन को नए दृष्टिकोण से देखने का आमंत्रण है। यह हमें सिखाती है कि संकल्प, श्रम और विश्वास के साथ कोई भी पहाड़ पार किया जा सकता है।
अंततः, यह कविता हर उस व्यक्ति के लिए एक दीपक है, जो कभी न कभी अपने जीवन-पथ पर ठहर गया हो—उसे यह याद दिलाने के लिए कि चलना ही जीवन है, और निरंतर चलना ही सफलता की कुंजी।
कविता
चींटी चढ़ी पहाड़
बिना राह के राहगीर था!
फक्कड़ बाबा और फ़क़ीर था!!
था असमंजस मे मेरा मन!
भूल गया था सारे यतन!!
ढो रहा था मैं जीवन को!
ढाढस नहीं था मेरे मन को!!
खाली मन, खाली हाथ!
सूझ रही थी ना कोई बात!!
देखा मैंने इक दिन चींटी को!
दाना लेकर गिर गिर जाती!!
चींटी छोटी भार बड़ा था!
लेकिन उसका संघर्ष कड़ा था!!
सम्मुख उसके पहाड़ खड़ा था!
नहीं छोड़ा उसने धीरज को!!
पार किया उसने --------!
उस विकट पथ को!!
मन मेरा मुझसे यूँ बोला!
तू हैं क्यूँ इतना भोला!!
चींटी छोटी तू इतना बड़ा!
क्यूँ तू यूँ ही स्थिर खड़ा!!
ले सपना कुछ पाने का!
बना रास्ता वहाँ जाने का!!
भेद लक्ष्य, खुद चलके न आने का!
बना योजना उसको पाने का!!
कांटे पत्थर दूर भगा!
चट्टानों मे भी फूल खिला!!
सत्य ईमान कि राह बना!
मन मे करुणा की पेंग बढ़ा!!
छोड़ किन्तु - परन्तु, अगर - मगर!
दौड़ सरपट लक्ष्य डगर!!
सीख जीने का प्रवाह!
ले संकल्प अंतिम चाह!!
🙏🌹🌹❤️❤️🙏
रचनाकार
धर्मेन्द्र खटाना "धम्मू "
दमदमा - मातृभूमि
गढ़ी कालका - कर्मभूमि

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