देवेंद्र आचार्य की कलम
प्रथम कविता…' एक '
भूमिका
जब जीवन अनेक दिशाओं में बिखरता प्रतीत होता है, तब कुछ स्वर ऐसे भी होते हैं जो हमें पुनः एक की ओर लौटने का मार्ग दिखाते हैं। देवेंद्र आचार्य (अहमदाबाद) की यह संक्षिप्त किंतु अत्यंत गहन रचना उसी एकत्व की साधना का काव्यात्मक प्रतिरूप है। यहाँ शब्द केवल अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि अनुभूति के माध्यम बन जाते हैं—जहाँ विविधता के बीच छिपी एकता का बोध सहज रूप से प्रकट होता है।
कवि ने जीवन, प्रेम, भाषा, दर्शन और आध्यात्मिक चेतना को अलग-अलग खंडों में नहीं, बल्कि एक ही मूल तत्व के विविध आयामों के रूप में देखा है। एक की पुनरावृत्ति यहाँ किसी सीमित आग्रह का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अद्वैत दृष्टि का उद्घोष है जो समस्त सृष्टि में एक ही सत्ता का अनुभव करती है। यह रचना हमें स्मरण कराती है कि बाह्य भिन्नताओं के पार एक ऐसी आंतरिक समरसता है, जहाँ प्रेम ही परम धन है, चित्त ही शक्ति है और आत्मा ही परमात्मा का विस्तार है।
इस कविता का सौंदर्य इसकी सरलता में निहित है—यह पाठक को उपदेश नहीं देती, बल्कि उसे आत्मचिंतन के एक शांत, गहरे प्रवाह में प्रवाहित कर देती है। प्रत्येक पंक्ति जैसे एक ध्यान-बिंदु है, जो हमें अपने भीतर झाँकने और उस एक सत्य को पहचानने का निमंत्रण देती है।
अंततः, यह रचना केवल पढ़ी जाने वाली कविता नहीं, बल्कि जी जाने वाली अनुभूति है—जहाँ हर शब्द हमें स्वयं से जोड़ता है और समग्र अस्तित्व के साथ एकात्म होने का संकेत देता है।
भाव
एक
एक कला — जीवन जीने की कला
एक रंग — प्रेम का रंग, परम धन प्रेम
एक भाषा — दिल की भाषा, राष्ट्रभाषा
एक दर्शन — सर्वत्र ईश्वर का दर्शन सदा
एक ॐकार — सदा सत्य नाम
एक जो स्वर — उसी से ईश्वर की प्राप्ति
एक जो शक्ति — चित्त की शक्ति, परमेश्वरी
एक ही नाद — पूर्ण ब्रह्म नाद
एक ही आत्मा — वही परमात्मा
एक ही आकाश — अनंत दर्शन
एक ही सनातन — शाश्वत परम अद्वैत
द्वितीय कविता... ' मेरा होना '
भूमिका
मनुष्य का अस्तित्व केवल होने तक सीमित नहीं होता, वह किसलिए होने के प्रश्न से अपनी सार्थकता प्राप्त करता है। देवेंद्र आचार्य (अहमदाबाद) की यह संवेदनशील रचना उसी सार्थकता की खोज का एक उज्ज्वल काव्य-प्रयास है। यहाँ ‘मेरा होना’ कोई व्यक्तिगत घोषणा नहीं, बल्कि एक व्यापक मानवीय दायित्व का विनम्र स्वीकार है—जहाँ स्वयं का अस्तित्व दूसरों के जीवन में प्रकाश, आशा और करुणा भरने से जुड़ जाता है।
कवि ने अपने होने को पृथ्वी की सुंदरता, अंधकार में दीप, आँसुओं में मुस्कान और भटके हुए कदमों को दिशा देने जैसे बिंबों के माध्यम से परिभाषित किया है। यह दृष्टि हमें बताती है कि सच्चा जीवन वही है जो अपने लिए नहीं, बल्कि जगत के लिए जिया जाए। यहाँ हर पंक्ति सेवा, संवेदना और समर्पण की एक नई परिभाषा गढ़ती है—जहाँ मनुष्य प्रकृति के तत्वों में ढलकर कभी बादल बनता है, कभी दीपस्तंभ, तो कभी एक मधुर प्रार्थना का स्वर।
इस कविता का भावलोक अत्यंत कोमल और प्रेरणादायी है। यह पाठक को उपदेश नहीं देती, बल्कि भीतर एक ऐसी आकांक्षा जगा देती है कि वह भी अपने अस्तित्व को कुछ अर्थपूर्ण बना सके। यह रचना हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन प्रभु का दिया हुआ एक पवित्र उपहार है, जिसे प्रेम, भक्ति और समर्पण के साथ पुनः उसी के चरणों में अर्पित करना ही उसकी सर्वोच्च उपलब्धि है।
अंततः, मेरा होना एक आत्मसंवाद है—जो व्यक्ति को स्वयं से ऊपर उठाकर मानवता के व्यापक आकाश से जोड़ देता है और यह विश्वास जगाता है कि छोटे-छोटे सत्कर्मों से ही जीवन की सच्ची महत्ता निर्मित होती है।
भाव
मेरा होना
मेरा होना तभी सार्थक है, यदि मैं इस पृथ्वी को सुंदर बना सकूँ।
यदि मैं अंधेरे जगत में एक प्रेम का दीप जला सकूँ,
राह की प्रतीक्षा में खड़े लोगों को उनके मुकाम तक पहुँचा सकूँ।
किसी की आँखों के आँसुओं को मुस्कान के फूलों में बदल सकूँ।
इस तपती धरती पर एक बादल बनकर बरस सकूँ।
तूफानी सागर के बीच बहती नाव के लिए दीपस्तंभ बन सकूँ।
तेरे गीत को संगीत देकर प्रार्थना के स्वर जगा सकूँ।
प्रभु द्वारा दिए जीवन-रूपी कमल को प्रेम, भक्ति और समर्पण से उनके चरणों में अर्पित कर सकूँ।
रचनाकार
देवेंद्र आचार्य, अहमदाबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति
मुख्य सहयोगी
जज़्बात ब्लॉगर पर निर्मित एक ऐसा ब्लॉग है जो नवाचारी प्रकृति की मानव संपदाओं के प्रयासों को सार्थक दिशा देने के लिए प्रयासरत है।






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