अपनों से दूरी और अपेक्षाओं का द्वंद्व

अपनों से दूरी और अपेक्षाओं का द्वंद्व

समाज के बदलते स्वरूप में कई बार ऐसे प्रश्न सामने आते हैं, जो सीधे हमारे अंतर्मन को छूते हैं और हमें अपनी ही सोच पर पुनर्विचार करने को विवश कर देते हैं। श्रीमती विजया डालमिया का यह कथन— “हम अपनों की उपेक्षा करेंगे तो बाहर वालों से कैसे अपेक्षा करेंगे?”—आज के समय का एक अत्यंत प्रासंगिक और जनहितकारी प्रश्न बनकर उभरता है।

यह केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक व्यवहार की एक सटीक पड़ताल है। वर्तमान समय में, जब व्यक्ति अपने पेशे, महत्वाकांक्षाओं और सामाजिक पहचान के पीछे भाग रहा है, तब सबसे पहले जो पीछे छूट जाता है, वह है—“अपनापन”।

बदलते समय का एक दृश्य

मान लीजिए एक युवा, जो महानगर में नौकरी करता है। वह अपने सहकर्मियों के साथ समय बिताता है, उनके साथ अपने सुख-दुख साझा करता है, लेकिन जब बात अपने माता-पिता या पुराने मित्रों की आती है, तो वह “समय नहीं है” कहकर टाल देता है। धीरे-धीरे, जब उसे किसी भावनात्मक सहारे की आवश्यकता होती है, तो वही सहकर्मी सीमित दायरे में रह जाते हैं। तब उसे एहसास होता है कि जिन अपनों को उसने अनदेखा किया, वही वास्तव में उसके सबसे बड़े सहायक हो सकते थे।

परिवार में उपेक्षा का प्रभाव

एक और उदाहरण परिवार के भीतर का है। अक्सर देखा जाता है कि घर के बुजुर्ग, जिनके पास जीवन का अनुभव और स्नेह का भंडार होता है, वे उपेक्षा के शिकार हो जाते हैं। उनकी बातों को “पुरानी सोच” कहकर दरकिनार कर दिया जाता है। लेकिन जब जीवन में कोई कठिन परिस्थिति आती है, तो वही अनुभव और मार्गदर्शन सबसे अधिक मूल्यवान सिद्ध होता है।

यह स्थिति केवल एक घर की नहीं, बल्कि समाज के अनेक घरों की वास्तविकता बनती जा रही है।

सामाजिक संबंधों की विडंबना

आज का व्यक्ति बाहरी दुनिया में अपनी छवि को लेकर अधिक सजग है। वह अपने व्यवहार, भाषा और समय को उन लोगों के लिए अधिक समर्पित करता है, जिनसे उसे किसी प्रकार का लाभ या पहचान मिल सकती है। इसके विपरीत, अपने लोग—जिनसे उसे बिना शर्त प्रेम मिलता है—उनके प्रति उसका व्यवहार सहज, लेकिन कई बार उपेक्षापूर्ण हो जाता है।

यह विडंबना ही श्रीमती डालमिया के प्रश्न को और भी गहराई देती है। यदि हम अपने ही संबंधों में संवेदनशीलता नहीं रखेंगे, तो बाहरी संबंधों से संवेदनशीलता की अपेक्षा करना एक प्रकार का विरोधाभास है।

पूर्वाग्रहों का पुनर्मूल्यांकन

समाज में एक सामान्य धारणा बन गई है कि “अपने तो हमेशा साथ रहेंगे।” यही सोच सबसे बड़ा भ्रम है। संबंध, चाहे अपने हों या बाहरी, सभी को समय, सम्मान और संवेदना की आवश्यकता होती है।

* अपने भी उपेक्षा से आहत होते हैं।

* संबंधों की मजबूती निरंतर संवाद पर निर्भर करती है।

* बाहरी संबंध परिस्थितियों के अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन अपने संबंध स्थायित्व की संभावना रखते हैं—यदि उन्हें सहेजा जाए।

समाधान की दिशा

इस समस्या का समाधान किसी बड़े परिवर्तन में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलावों में छिपा है—

* अपने परिवार और मित्रों के लिए नियमित समय निकालना,

* उनकी बातों को ध्यान से सुनना और महत्व देना,

* और सबसे महत्वपूर्ण, अपेक्षा करने से पहले अपने कर्तव्यों को समझना।

यदि हम इन छोटे कदमों को अपनाते हैं, तो न केवल हमारे व्यक्तिगत संबंध मजबूत होंगे, बल्कि समाज में भी एक सकारात्मक वातावरण का निर्माण होगा।

निष्कर्ष

श्रीमती विजया डालमिया का यह कथन हमें एक सरल, लेकिन गहरे सत्य से परिचित कराता है—अपनापन कोई स्थायी वस्तु नहीं, बल्कि एक सतत प्रक्रिया है, जिसे हमें अपने व्यवहार से जीवित रखना होता है।

यदि हम अपने ही लोगों के प्रति उदासीन रहेंगे, तो बाहरी दुनिया से अपनत्व की अपेक्षा करना केवल एक अधूरी इच्छा बनकर रह जाएगी। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने संबंधों को प्राथमिकता दें, उन्हें सहेजें, और यह समझें कि सच्चा सहारा वहीं मिलता है, जहाँ सच्चा अपनापन होता है।

आइडिया 💡 

श्रीमती विजया डालमिया
राष्ट्रीय संयोजिका
उलझन सुलझन महिला लेखिका विंग
हैदराबाद
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






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