पीर की परतों में लिपटी ज़िंदगी

पीर की परतों में लिपटी ज़िंदगी

भूमिका

ज़िंदगी… एक ऐसी किताब, जिसे हम पढ़ते कम और जीते ज़्यादा हैं।

पर हर किसी की किताब एक जैसी नहीं होती—कहीं शब्द चमकते हैं, कहीं स्याही फैल जाती है, और कहीं पन्ने बिना पढ़े ही मुड़ जाते हैं।

प्रमिला त्रिवेदी की इन दोनों कविताओं में ज़िंदगी केवल घटनाओं का क्रम नहीं, बल्कि एक गहरी अनुभूति बनकर उभरती है—एक ऐसी अनुभूति जिसमें स्मृतियों की मिठास भी है और समय की चुभन भी।

पहली कविता में वह ज़िंदगी को एक किताब की तरह देखती हैं, जहाँ हर पन्ना बीते हुए लम्हों की गवाही देता है—कुछ सुनहरे, कुछ अधूरे। यहाँ पीड़ा धीमी है, पर स्थायी है; जैसे मुस्कान के पीछे छुपा हुआ कोई अनकहा सवाल।

वहीं दूसरी कविता में वही पीर स्वर बदल लेती है—वह अब एक शिकायत बनकर उभरती है। यहाँ ज़िंदगी का शोर है, विसंगतियों का बोझ है, और समाज की सच्चाइयों का तीखा अहसास है। यह केवल व्यक्तिगत वेदना नहीं, बल्कि सामूहिक यथार्थ की कराह है—जहाँ सपनों की कमी है, संघर्ष की अधिकता है, और उम्मीद कहीं भीड़ में खोती हुई प्रतीत होती है।

इन दोनों रचनाओं को साथ पढ़ने पर ऐसा लगता है मानो एक ही आत्मा के दो स्वर हों—एक जो चुपचाप सहता है और यादों में ढल जाता है, और दूसरा जो भीतर की घुटन को शब्दों में उकेरकर दुनिया से सवाल करता है।

यही द्वंद्व, यही संवेदना, और यही गहरी मानवीय पीर—प्रमिला त्रिवेदी की कविताओं को सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि जीवन का साक्षात प्रतिबिंब बना देती है।

ज़िंदगी

ज़िन्दगी की किताब के पन्ने पलटते चले गये....

कुछ सुनहरे क़िस्से तो कुछ

अधूरे ख़्वाब छपते चले गये

हम स्तब्ध खड़े देखते रहे 

दिन और रात रोज़ ढलते रहे 

हर पन्ने पर गुज़रती उम्र के

नामांक जुड़ते चले गए 

ज़िंदगी की किताब के पन्ने पलटते चले गए ...

कभी कुछ हसरतों के ‘छंद ‘बनते चले गए 

तो कभी बुनियादी रिश्ते‘ दोहे’ बनकर 

उभरते गए 

तस्वीर  पर जो दबी दबी मुस्कान  है,

कभी उलझी कभी सुलझी सी 

कभी रोती कभी हँसती सी 

कभी ना ख़त्म होने वाली

कहानियाँ दोहराते चले गए 

ज़िंदगी की किताब के पन्ने पलटते चले गए ....


जिंदगी से शिकायत


हर तरफ शोर  ही शोर  है,

जिंदगी भी कितनी महा बोर है,


काफी  दिनों से एक  शोर  का ही ठोर है,

जब से आए  धरा पर  बहुत  शोर है,


हर दिन की शुरुआत नए सपनों से,

मंज़िल वही,पर साइड में कोई और है।


झूठी दुनिया झूठा सारा  किस्सा है,

पर  ये तो एक बेमिसाल  दौर हैं।


कहीं छोटी बीमारी तो कहीं महामारी 

कहीं कुर्सी की खातिर मारामारी।।


कहीं नींद  है तो ख्वाब नहीं 

कहीं सपनों को आब नहीं।


कहीं दहेज जुटाते झुके कांधे,

कहीं आधा पेट खाकर हो जाते आधे।

रचयिता

 

प्रमिला त्रिवेदी 
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 






प्रमिला त्रिवेदी

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