आज का विमर्श बिंदु

आज का विमर्श बिंदु

जीवन पाँच तत्वों का सार है – रोग, भोग, प्रयोग, योग और ढोंग।

जीवन को समझना कठिन नहीं है, बस देखने का नजरिया बदलना होता है। यदि इन पाँच शब्दों का सही अर्थ पकड़ लिया जाए, तो जीवन का पूरा दर्शन सरल हो जाता है।

रोग – मन की उपज

कहा जाता है कि “रोग शरीर में नहीं, पहले मन में जन्म लेता है।”

एक छोटी सी कहानी इसे स्पष्ट करती है—

एक अपराधी को सज़ा-ए-मौत दी गई। वैज्ञानिकों ने प्रयोग के लिए अनुमति ली और यह प्रचार किया कि उसे कोबरा के डसने से मारा जाएगा।

निर्धारित समय पर उसे कुर्सी पर बैठाकर आँखों पर पट्टी बांध दी गई। उसे कोबरा दिखाया गया, पर असल में उसे सर्प ने नहीं काटा—केवल सुई से हल्का सा चुभन दी गई।

लेकिन उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई… और आश्चर्य यह कि उसके शरीर में जहर जैसे लक्षण भी पाए गए!

निष्कर्ष स्पष्ट था—

मन जिस बात को सच मान ले, शरीर उसी दिशा में प्रतिक्रिया देने लगता है।

इसलिए, रोग कई बार केवल भय और नकारात्मक सोच का परिणाम होता है।

जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित रहता है, वह आधा स्वस्थ वैसे ही हो जाता है।

भोग – संतुलन का विज्ञान

जीवन भोग और त्याग के बीच झूलता है।

भोग का अर्थ केवल विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकताओं की पूर्ति भी है।

जब भोग संतुलित होता है, तो जीवन सहज रहता है।

लेकिन जब भोग बढ़ जाता है या अनियंत्रित हो जाता है, तो वही सुख दुःख में बदल जाता है।

प्रकृति ने हमें पाँच तत्व दिए हैं—भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर।

यही “भगवान” का वास्तविक स्वरूप है।

इनके साथ संतुलन बनाए रखना ही सच्चा भोग है।

प्रयोग – सृजन की शक्ति

मनुष्य को अन्य जीवों से अलग बनाता है उसका प्रयोगशील होना।

नई खोज, नया विचार, कुछ अलग करने की चाह—यही प्रयोग है।

प्रयोग जीवन में ठहराव को तोड़ता है और आगे बढ़ने की राह दिखाता है।

जो प्रयोग करता है, वही सीखता है, और जो सीखता है, वही विकसित होता है।

योग – स्वयं से मिलन

हम बाहर की दुनिया में इतना उलझ जाते हैं कि अपने भीतर झाँकना भूल जाते हैं।

जबकि सच्चा खजाना हमारे भीतर ही है।

योग का अर्थ केवल आसन नहीं, बल्कि आत्मा से जुड़ना है।

जब व्यक्ति अपने भीतर उतरता है, तब वह उस शक्ति को महसूस करता है जिसने इस सृष्टि को बनाया है।

ढोंग – सत्य से दूरी

ढोंग, औपचारिकता से आगे की अवस्था है।

जब व्यक्ति सच को छोड़कर दिखावे में जीने लगता है, तब ढोंग जन्म लेता है।

झूठे आडंबर और दिखावे से कुछ समय के लिए भ्रम तो पैदा किया जा सकता है,

लेकिन सच्चाई देर-सवेर सामने आ ही जाती है।

निष्कर्ष

जीवन का संतुलन इन्हीं पाँच शब्दों में छुपा है—

रोग से बचना है तो सोच को सकारात्मक रखें

भोग में संतुलन रखें

प्रयोग से जीवन को आगे बढ़ाएं

योग से स्वयं को जानें

और ढोंग से दूर रहें

तभी जीवन सहज, सरल और सार्थक बन सकता है।

जीवन बाहर नहीं, भीतर से संवरता है…

बस हमें सही दिशा में देखने की जरूरत है। 🙏

सूचना स्रोत 

 
धर्मेन्द्र खटाना धम्मू
दमदमा
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 










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