जिन्दगी - प्रमिला त्रिवेदी

जिन्दगी 

भूमिका

जिन्दगी — यह शीर्षक मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि भावनाओं की एक ऐसी धारा है, जिसमें प्रेम, प्रतीक्षा, विश्वास और समर्पण एक साथ बहते हैं। प्रमिला त्रिवेदी की यह कविता किसी अलंकारिक प्रदर्शन का प्रयास नहीं करती, बल्कि सीधे हृदय से निकलकर हृदय तक पहुंचने वाली अनुभूति बन जाती है।

इस रचना में प्रेम केवल एक आकर्षण नहीं, बल्कि एक आस्था है—एक ऐसा विश्वास, जिसमें किसी प्रिय का मुस्कराता चेहरा ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाता है। कवयित्री ने बहुत सहज शब्दों में उस स्त्री-मन की गहराई को व्यक्त किया है, जो अपने प्रेम को मांगती नहीं, बल्कि उसे अपने हर स्वप्न, हर प्रार्थना और हर धड़कन में संजोती है।

टूटते तारे से प्रिय को मांगने की कल्पना हो या जीवन के पथ पर केवल एक हाथ और साथ की चाह—यह कविता उन अनकहे भावों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें अक्सर शब्द नहीं मिल पाते। यहाँ प्रेम का ‘ताजमहल’ कोई भव्य स्मारक नहीं, बल्कि हृदय के भीतर निर्मित एक अमर संसार है, जहाँ हर ईंट विश्वास की है और हर दीवार समर्पण की।

कविता का सबसे मार्मिक पक्ष यह है कि कवयित्री अपने शब्दों को तब तक अधूरा मानती है, जब तक उन्हें प्रिय के स्पर्श की स्वीकृति नहीं मिलती। यह भाव प्रेम की उस पराकाष्ठा को दर्शाता है, जहाँ अभिव्यक्ति भी तभी पूर्ण होती है, जब वह साझा हो।

जिन्दगी केवल एक प्रेम-कविता नहीं, बल्कि उस सजीव अहसास का नाम है, जिसमें किसी एक के होने से पूरा संसार अर्थपूर्ण हो उठता है। प्रमिला त्रिवेदी की यह रचना पाठक को भीतर तक छूते हुए यह एहसास कराती है कि सच्चा प्रेम शब्दों से नहीं, बल्कि अनुभूतियों से जीवित रहता है।

कविता

जिन्दगी 

                       यह चित्र पूरी तरह काल्पनिक है।

तुम्हारा मुस्कराता चेहरा देखते ही,

हमारे चेहरे पर भी मुस्कान आ जाती है।

देखते है स्वप्न तो रात भी गुजर जाती है,

मै रोज आकाश में तारा टूटता है क्या देखती रहती हूं

और उस टूटे हुए तारे से सिर्फ तुम्हे ही मांगती हूं,

इस जिंदगी में चलते हुए, 

मुझे चाहिए सिर्फ तेरा हाथ 

तेरा साथ, मै जानती हूं 

तुम डरते नही हो इस दुनिया से,

पर मेरी आखों में झांक कर देखो,

सिर्फ तुम्हारे ही सपने है।

प्रेम का वो अनमोल धागा,

मैने तुझ संग बांधा है,

और मेरे ह्रदय में मैने प्यार का ताजमहल बनाया है

मेरे इन शब्दों को कोई अर्थ नही है ,

जब तक मेरी कविता को तेरे होंठों का स्पर्श नही है।

रचयिता

प्रमिला त्रिवेदी जी 
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन, महिला इकाई
बैंगलोर
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 





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