कागज़ पर खिलते रिश्ते
कागज़ पर खिलते रिश्ते
भूमिका
समय के बदलते प्रवाह ने हमारे जीवन की गति तो तेज कर दी है, पर कहीं न कहीं भावनाओं की गहराई को भी छू लिया है। एक दौर था जब शब्द सिर्फ अक्षर नहीं होते थे, बल्कि धड़कनों की आवाज़ होते थे। चिट्ठियों के माध्यम से रिश्ते सिर्फ निभाए नहीं जाते थे, बल्कि जीए जाते थे। प्रतीक्षा में भी एक मिठास होती थी, और हर लिखे हुए शब्द में एक सच्चाई झलकती थी। आज की त्वरित दुनिया में, जहाँ संवाद एक क्लिक में सिमट गया है, वहीं उन पुराने दिनों की आत्मीयता, धैर्य और अपनापन कहीं खो सा गया है। प्रमिला त्रिवेदी की ये पंक्तियाँ हमें उसी बीते हुए सुनहरे समय की याद दिलाती हैं, जहाँ रिश्ते कागज़ पर सच में खिलते थे और दिलों के बीच की दूरियाँ शब्दों से मिट जाया करती थीं।
कविता
कागज़ पर खिलते रिश्ते
कल रिश्ते कागज पर खिलते थे।
आज पत्र व्यवहार बंद हो गए हैं।
हम अच्छे से रिश्तों को सम्भाल लेते थे,
दिनोंदिन इंतजार करके भी।
लेखन से अहसास कराना अच्छा लगता था।
हर शब्द में भाव को समझाना अच्छा लगता था।
प्रणाम लिख आदर जतलाते थे,
प्रेम को ढाई अक्षरों से सजाते थे।
दर्द वेदना व्यक्त करने में हिचकते थे।
खुशियों को पंख लगाते थे।
छोटी-बड़ी हर बात बताते थे,
दूरियों को करीब ले आते थे।
दिल खोलकर लिखते जाने की।
आदत थी ताना-बाना बुनने की।
बड़ों का चिंता जताना भाता था,
दोस्तों का सलाहनामा सुहाता था।
बंद लिफाफे में यादें लौटाना अच्छा लगता।
सुख दुःख के संदेशे पाना मन को भाता।
महीनों इंतजार कर चिट्ठी पाना,
सुखद था चिट्ठी पत्री का वो ज़माना।
पोस्टमैन का इंतजार करते थे।
आज अंगुलियों से पोस्ट डिलीट करते हैं।
रिश्तों में खोखलापन आया है,
रिश्तों में रूखापन आया है।
वो अहसास खत्म हो जा रहे हैं।
रिश्ते कागज कागज तक सिमटते जा रहे हैं।
कल मन आपस में मिलते थे,
रिश्तों के चमन भी खिलते थे।
अब, परिवर्तन सब बतला रहे हैं।
रिश्ते किस ओर बढ़ते जा रहे हैं?
संयुक्त से एकल में बदलकर आज,
रिश्ते कागज़ पर सिमटते जा रहे हैं।
रचनाकार
प्रस्तुति






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