ममता की गोद में प्रकृति और बालपन - पंडित राजेश्वर राव जी
ममता की गोद में प्रकृति और बालपन
भूमिका
बच्चों की मुस्कान में एक अलग ही जादू होता है। उनकी छोटी-छोटी बातें, मासूम हँसी और नटखट हरकतें हर किसी के मन को खुशियों से भर देती हैं। जब बच्चे खिलखिलाते हैं, तो ऐसा लगता है मानो प्रकृति भी उनके साथ मुस्कुरा उठी हो। उनकी दौड़, उनकी भोली बातें और चेहरे की मासूमियत वातावरण में एक नई ताजगी घोल देती है।
प्रकृति और बच्चों का रिश्ता बहुत गहरा और सहज होता है। जैसे एक माँ अपने बच्चे को प्यार से अपनी गोद में संभालती है, वैसे ही प्रकृति भी बच्चों को अपने स्नेह और ममता से ढक लेती है। बच्चों की निश्छलता में प्रकृति का सबसे सुंदर रूप दिखाई देता है।
प्रस्तुत कविता में बालपन की उसी मिठास और प्रकृति के वात्सल्य को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त किया गया है। यह रचना हमें बच्चों की मासूम दुनिया के साथ-साथ प्रकृति के माँ जैसे प्रेम का भी एहसास कराती है।
कविता
नन्हे बालकों संग प्रकृति पुलकित हो मुस्काए,
उनकी हँसी मानो फूलों-सी कोमलता बरसाए।
बुदबुद चलते पग, फिर चंचल दौड़ लगाते,
मानो छोटी नदियाँ हृदय में स्नेह जगातीं।
प्यारे शिशु का हर एक चेहरा पूर्णिमा सा चमके,
मन को शीतलता दे मानो ओस कण दमके।
बच्चों की हर मीठी बोली मधुधारा बन जाए,
सुनते ही मन का आँगन मधु रस से भर जाए।
प्रकृति भी बच्चों संग आनंदित हो हो जाती,
ममता बन अपनी गोदी में उनको स्वयं सुलाती।
प्रतिदिन तन-मन से उनका पालन-पोषण करती,
इस जग में माँ से बढ़कर “माँ-प्रकृति” ही लगती।
रचनाकार
पंडित राजेश्वर राव
सूचना स्रोत
मूल भाषा
तेलुगु
अनुवाद
संपादन
टीम उलझन सुलझ






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