भीतर की रोशनी और आत्मबोध का सफर

भीतर की रोशनी और आत्मबोध का सफर

बी.पी. सिंह वर्मा ‘बसोया’

आसान नहीं है खुद को समझना। हमारे भीतर कहीं एक छोटी-सी रोशनी है, जो धीरे-धीरे जलती रहती है और हमें यह एहसास कराती है कि बदलाव मुमकिन है। खुद को समझने के लिए हमें अपने भीतर के उस कोने में झांकना होगा, जहाँ देखने से हम अक्सर कतराते हैं।

जब इंसान अपने भीतर झांकने का साहस करता है और अपने स्वभाव की कठोर सच्चाइयों को स्वीकारते हुए भी उम्मीद की लौ जलाए रखता है, तब वही बोझ, जो कभी उसे थकाता था, धीरे-धीरे उसकी ताकत बन जाता है। अंततः वह समझने लगता है कि असली बदलाव और शांति भीतर से ही जन्म लेती है।

मैं यह सोचकर आसमान की ओर देखता हूँ कि शायद वहाँ मुझे दया की कोई झलक मिल जाए, लेकिन कुछ नहीं मिलता—बस सुस्त और बेपरवाह बादल दिखाई देते हैं, जो अपने ही लय में बहते रहते हैं, जैसे उन्हें किसी इंसान की बेचैनी से कोई सरोकार ही न हो। उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता, और शायद यही उनकी असली प्रकृति है।

बादल बोलते नहीं हैं। वे चुपचाप आसमान में तैरते रहते हैं। उनकी यह खामोशी इतनी गहरी होती है कि उसे महसूस करते-करते मन के भीतर भी एक सन्नाटा-सा उतरने लगता है। तब लगता है कि शायद मुझे ऊपर नहीं, बल्कि अपने भीतर देखना चाहिए।

फिर मैं अपने भीतर झांकने की कोशिश करता हूँ, जैसे कोई गहरे कुएँ में नीचे तक देखने की कोशिश करता है। वहाँ अंधेरा है, खटक है और एक अजीब-सी सच्चाई है। वहाँ मुझे सिर्फ मेरा अपना स्वभाव दिखाई देता है—मेरा निजी, जिद्दी, कभी-कभी असहयोगी और अक्सर संकोच से भरा हुआ स्वभाव; एक ऐसा स्वभाव, जो खुद पर संदेह करता है और मुश्किल समय में हल्की-सी हँसी की तलाश करता है।

मैं इस स्वभाव को अपने साथ एक पुराने सूटकेस की तरह ढोता आया हूँ। यह सूटकेस न तो सुंदर है और न ही हल्का। इसके किनारे घिस चुके हैं, जगह-जगह से यह कमजोर पड़ चुका है और इसके भीतर भरा सामान इतना भारी है कि कई बार कदम रुकने लगते हैं। फिर भी मैं इसे इसलिए नहीं उठाए हुए हूँ कि यह मुझे पसंद है, बल्कि इसलिए कि मेरे पास और कुछ था ही नहीं, जिसे मैं अपने साथ ले जा सकता।

धीरे-धीरे इस बोझ के साथ एक रिश्ता बन गया है। मैं जानता हूँ कि यह मुझे थकाता है, लेकिन यही मुझे गढ़ता भी है। शायद इंसान अपने स्वभाव से पूरी तरह अलग नहीं हो सकता।

कभी-कभी मन में यह ख्याल आता है कि क्या मैं इस सूटकेस को नीचे रख सकता हूँ? क्या मैं इसके बिना हल्का महसूस कर पाऊँगा? पर उसी क्षण एक डर उभरता है कि अगर यह मेरे साथ नहीं रहेगा, तो मैं क्या रह जाऊँगा? शायद यह बोझ ही मेरी पहचान का हिस्सा बन चुका है।

फिर भी उम्मीद पूरी तरह खत्म नहीं होती। मैं अब समझने लगा हूँ कि खुद को समझना आसान नहीं है। इसके लिए धैर्य चाहिए, ईमानदारी चाहिए और अपने ही सच को स्वीकार करने की हिम्मत चाहिए। यही एक रास्ता है, जो धीरे-धीरे भीतर की धुंध को साफ करता है और हमारे भीतर उठ रहे हर सवाल का जवाब भी देता है।

अगली बार, शायद किसी दिन, जब मैं फिर से आसमान की ओर देखूँगा, वही बादल मुझे कुछ अलग लगेंगे।

सद्भावना सहित रचनाकार

बी.पी. सिंह वर्मा ‘बसोया’

गाजियाबाद

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 









Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)