मैं ना भूलूंगी - विजया डालमिया

सावधानी का एक पल,    जीवन का संबल

जीवन की राहें जितनी सुंदर दिखाई देती हैं, उतनी ही अनिश्चितताओं से भरी भी होती हैं। कभी-कभी खुशी और उत्साह के बीच घटित एक छोटा-सा हादसा हमें यह एहसास करा देता है कि जीवन में सावधानी कितनी आवश्यक है। मनुष्य अक्सर भागती-दौड़ती दिनचर्या में यह भूल जाता है कि एक असावधानी न केवल उसके कदम रोक सकती है, बल्कि उससे जुड़े अपनों की चिंताओं और भावनाओं को भी गहरे तक प्रभावित कर सकती है। अतः सदैव सावधानी से कदम बढ़ाएं।

           प्रस्तुत चित्र कल्पना आधारित है जीवन कौशल के बोध का अंधकार से       
                    प्रकाश की ओर। कृत्रिम बुद्धिमता के ग्रोक द्वारा निर्मित

मैं ना भूलूंगी

बिन बरसा बादल सा मन है  गुमसुम  बोझिल सा। इसलिए आज मैंने बरसने का मन बना ही लिया। कभी-कभी जिंदगी में कुछ ऐसे हादसे हो जाते हैं जिनसे हमारी जिंदगी बदल जाती है। ना जाने कब किस झोंके से अतीत की खिड़की खुल जाती है और हम फिर उन्ही राहों पर गुजर आते हैं जो जानी पहचानी होती है और हमें लगता है जैसे ...अभी की ही तो बात है...। 

बात कुछ समय पहले की ही है। जब हम हैदराबाद में स्नो वर्ल्ड के लिए निकले तब यह नहीं पता था कि नकली स्नो वर्ल्ड में जाकर अपना असली पैर तोड़ बैठूंगी। ऐसी पीड़ा जो मुझ से जुड़े लोगों को भी तकलीफ में डाल देगी। हम सब वहाँ बर्फ में नाच गाकर झूम रहे थे। अचानक ही मैं फिसली और गिर पड़ी। गिरने के बाद मेरी चीख से वहाँ सब कुछ ठहर गया। 

          कृत्रिम बुद्धिमता से निर्मित यह चित्र केवल सांकेतिक है।

मैंने भी सोचा सन्नाटे से पूछूं तो जरा कि हुआ क्या है? पर सब के सहमे खामोश चेहरे और मेरे दर्द की ज्यादती मुझे यह आभास करा गई थी मेरे पाँव में क्रैक हो गया है। मेरा गिरना, पाँव का मुड़ना, और फिर सीधा ना होना। लोगों की तमाम कोशिशों के बावजूद मेरा उठ ना पाना पल में ही सब कुछ समझा गया। कुछ ही पल पहले नाचते-थिरकते मस्ती से भरे कदम मेरे थम से गए। बहती नदी को जैसे किसी ने बांध दिया। वक्त का जरा सा बदलाव कितने ही नए एहसासों को जन्म दे देता है। दूसरों के लिए शायद कुछ नहीं बदला था परंतु मेरे साथ हुए इस हादसे ने मेरी जिंदगी का रुख बदल दिया। मेरे पैर का ऑपरेशन हुआ। घुटने से लेकर पंजे तक  रॉड लगाई गई और फिर लंबे समय तक आराम, आराम और सिर्फ आराम। दीवारों की कैद में न जाने कितना वक्त गुजर गया। परकटे परिंदे की तरह कट कर रह गई थी मैं। समय से किए गए सारे अनुबंध मेरे धरे के धरे रह गए। वह चलता रहा और मैं पीछे रह गई। मुझे महसूस होने लगा कि कल तक मै चक्करघिन्नी की तरह  घूम रही थी। आज समय ही समय है। कल समय के लिए समय नहीं था। आज का समय मेरे लिए नहीं है। परंतु फिर अपनों के प्यार और आशीर्वाद से मेरा पैर ठीक हुआ और फिर से एक बार मैं समय से कदम मिलाकर चल पड़ी। सारांश यही कि समय कभी किसी के लिए ठहरता नहीं। हम ना चाहें तो भी वह बीत ही जाता है। पर हाॅं खट्टे-मीठे अनुभव व जिंदगी जीने की कला हमें जरूर सिखा जाता है। 

"जीवन चलने का नाम, चलते रहो सुबह शाम" 

यह मूल मंत्र हमें हमेशा आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देता है। बस इतना ही....

रचनाकार

विजया डालमिया

राष्ट्रीय संयोजिका 

उलझन सुलझन लेडीज लेखिका विंग 

हैदराबाद (तेलंगाना)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार 





प्रस्तुति




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