चिंता — एक गहन जीवन-दर्शन

रचना समीक्षा 

चिंता — एक गहन जीवन-दर्शन

प्रमिला त्रिवेदी जी की यह लघु रचना आकार में छोटी होते हुए भी विचारों की दृष्टि से अत्यंत प्रभावशाली और जीवन के गहरे सत्य को उद्घाटित करने वाली है। कुछ ही पंक्तियों में कवयित्री ने मनुष्य की मानसिक अवस्था, उसके भय और अनावश्यक बोझ को अत्यंत सहज किंतु मार्मिक रूपक के माध्यम से व्यक्त किया है।

“चिंता वो ब्याज है…”— यह उपमा अपने आप में अत्यंत सारगर्भित और चिंतनशील है। सामान्यतः ब्याज उस ऋण पर चुकाया जाता है जो हमने लिया हो, किंतु यहाँ कवयित्री कहती हैं कि चिंता ऐसा ब्याज है, जिसे मनुष्य जीवन भर चुकाता रहता है, जबकि उसका “मूल” उसने कभी लिया ही नहीं होता। यह संकेत उन काल्पनिक आशंकाओं, अनहोनी के डर और भविष्य की अनिश्चितताओं की ओर है, जो वास्तविकता से पहले ही हमारे मन को घेर लेती हैं।

रचना का सबसे बड़ा सौंदर्य इसकी **सरल भाषा और गहन अर्थवत्ता** में निहित है। शब्द कम हैं, परंतु उनके भीतर जीवन का व्यापक अनुभव समाया हुआ है। यह कविता पाठक को भीतर तक झकझोरते हुए आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है कि हम कितनी बार उन परिस्थितियों के लिए व्यर्थ ही चिंतित रहते हैं, जो शायद कभी घटित ही नहीं होतीं।

काव्य की दृष्टि से देखें तो इसमें **रूपक अलंकार** का अत्यंत प्रभावी प्रयोग हुआ है। “चिंता” को “ब्याज” और “समस्या” को “मूल” के रूप में प्रस्तुत कर कवयित्री ने भावों को सजीव बना दिया है। साथ ही, रचना में एक सूक्ष्म **दार्शनिक चेतना** भी विद्यमान है, जो पाठक को वर्तमान में जीने और अनावश्यक मानसिक बोझ से मुक्त होने का संदेश देती है।

संक्षेप में, यह रचना केवल कविता नहीं, बल्कि जीवन को सहज और संतुलित दृष्टि से देखने की प्रेरणा है। प्रमिला त्रिवेदी जी ने बहुत कम शब्दों में एक बड़ा सत्य कह दिया है—कि अक्सर हम उस चिंता का मूल्य चुकाते रहते हैं, जिसका वास्तविक अस्तित्व ही नहीं होता। यही इस रचना की विशेष शक्ति और संवेदनात्मक प्रभाव है।

रचनाकार

 
प्रमिला त्रिवेदी 
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन लेडीज विंग 
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार 




प्रस्तुति





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