बड़ी दीदी - प्रमिला त्रिवेदी
बड़ी दीदी
लकड़ी की थी एक झोपड़ी,
उपर लोखंड का था पतरा,
लोखंड के पतरे में छेद थे सतरा।
बारिश के दिनों में वो सारे जाते भीग ।
और सभी को था दीदी का आधार,
दीदी उस झोपडी को संभालती ऐसे,
डगमगाते हुए चाय के कप को संभालती प्लेट जैसे,
अपने घर की परिस्थिति से वो थी वाकीफ।
इसलिए हर काम को करने में थी माहिर।
आंसुओं को छुपा कर करतीं थीं हर काम।
खरे सोने के जैसी है ना तांबा ना ही पीतल।
गरीब मां बाप की वो है आधार स्तम्भ,
बड़ी प्यारी सुंदर हंसमुख,अब गई है वो ससुराल।
सास उसकी मां के जैसी,ननद बहना समान,
चंचल नही ,वो तो धीर गंभीर है,
उम्र से पहले ही उसमें रहता ठहराव है,
गरीब की बेटी है, स्वभाव से नेक है।
सचमुच दीदी तो लाखों में एक है।
रचयिता
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन लेडीज विंग
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार







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