मन की बात - प्रमिला त्रिवेदी
मन की बात
भूमिका
मनुष्य के जीवन में रिश्तों का महत्व केवल खून के संबंधों तक सीमित नहीं होता, बल्कि वे भावनाओं, विश्वास, अपनत्व और संवेदनाओं की नींव पर भी टिके होते हैं। सच्चे रिश्ते वही होते हैं, जिनमें शब्दों से अधिक एहसास बोलते हैं और साथ निभाने की भावना हर परिस्थिति में बनी रहती है। प्रेम केवल कह देने का विषय नहीं, बल्कि उसे व्यवहार, परवाह, सम्मान और समर्पण के माध्यम से महसूस कराया जाता है।
प्रमिला त्रिवेदी द्वारा व्यक्त ये मनोभाव रिश्तों की उसी गहराई को स्पर्श करते हैं, जहाँ आत्मीयता किसी बंधन की मोहताज नहीं होती। यह आलेख हमें बताता है कि प्रेम का वास्तविक स्वरूप निस्वार्थ भाव, मौन सहयोग और दिल से दिल के जुड़ाव में छिपा होता है। प्रस्तुत भावनाएँ पाठकों को रिश्तों के वास्तविक अर्थ पर सोचने के लिए प्रेरित करती हैं।
मन की बात
आज कुछ अपने मन के भाव प्रस्तुत हैं।
रिश्ते खून से नहीं, एहसासों से बनते हैं। ये दिल से बनते हैं और दिल से दिल का जो जुड़ाव होता है, वही सच्चा रिश्ता कहलाता है। हमारे जीवन में सबसे पहली प्राथमिकता हमारे अपने और हमारे रिश्ते होते हैं।
पर सच तो यही है कि प्रेम के लिए केवल खून के रिश्तों का होना जरूरी नहीं है। जरूरत केवल एक ऐसे दिल की होती है, जो दूसरों के दिल तक पहुँच सके। सच कहूँ तो प्रेम की शुरुआत ही उन रिश्तों से हुई है, जिनका खून से कोई संबंध नहीं होता।
माँ भी गर्भ धारण करने से पहले अपने बच्चे को अपने मन में धारण करती है। अर्थात् पहला रिश्ता खून से नहीं, मन से बनता है।
प्यार केवल “आई लव यू” कह देने का नाम नहीं है। प्यार है — फिक्र करना, कद्र करना, हर पल साथ निभाना और बिना किसी शर्त के किसी के लिए मौजूद रहना। यही सच्चा प्रेम है।
क्या आपने कभी महसूस किया है कि कुछ रिश्ते अपने होते हुए भी दिल से दूर लगते हैं, और कुछ लोग हर पल हमारे साथ नहीं रहते, फिर भी दिल के सबसे करीब महसूस होते हैं? जब भी हमें कोई खुशी या दुख बाँटना होता है, सबसे पहले वही रिश्ता याद आता है।
वह रिश्ता कोई भी हो सकता है — दोस्त का, मुँहबोली बहन का, गुरु का या किसी ऐसे व्यक्ति का, जो हमें बिना कहे समझ ले। क्योंकि प्यार शब्दों में नहीं, व्यवहार में दिखाई देता है।
कुछ लोग कहते हैं — “मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ”, लेकिन जब सच में जरूरत पड़ती है, तब वे कहीं दिखाई नहीं देते। वहीं कुछ लोग कुछ भी नहीं कहते, पर जब भी आपको उनकी आवश्यकता होती है, वे चुपचाप आकर आपका साथ निभा जाते हैं।
क्योंकि प्यार पाने का नहीं, देने का नाम है। खुद से पहले दूसरों को रखना, सामने वाले की कद्र करना और उसकी परवाह करना — यही प्रेम की सर्वोच्च पहचान है। एहसास शब्दों में नहीं, दिल में बसते हैं।
कभी-कभी मन चाहता है कि कोई हमें सुने, हमें समझे। कोई कहता है कि उसे प्यार जताना नहीं आता, तो कोई बात नहीं — पर कम से कम सामने वाले को यह एहसास तो कराइए कि वह आपके लिए बहुत जरूरी है।
उनके मुश्किल समय में उनके साथ खड़े रहिए। खुशियों में तो हर कोई साथ देता है, लेकिन कठिन समय में जो साथ निभाए, वही सच्चा अपना होता है।
एक बात और — अहम् और वहम, दोनों से दूर रहिए, वरना रिश्ते टिक नहीं पाएँगे। रिश्तों में शब्दों से अधिक एहसासों को महत्व दीजिए।
अब अपनी लेखनी को विराम देती हूँ।
रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका
उलझन सुलझन (लेडीज विंग)
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति







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