मायका - डिंपल अग्रवाल

 

भूमिका

बेटी के जीवन में मायका केवल एक घर नहीं होता, वह उसकी स्मृतियों का आंगन, भावनाओं का आश्रय और निश्छल प्रेम का संसार होता है। वहां बिताया गया बचपन, मां की ममता, दादी की कहानियां, भाई-बहनों की नोकझोंक, गांव की गलियां, पेड़ों के झूले और बेफिक्र हंसी—सब मिलकर जीवन की ऐसी पूंजी बन जाते हैं, जो समय बीतने के बाद भी मन के किसी कोने में सदा जीवित रहती है।

समय के साथ बेटी जिम्मेदारियों के नए संसार में प्रवेश कर जाती है, लेकिन मायके से जुड़ी स्मृतियां उसके मन की धड़कनों में गीत बनकर बस जाती हैं। कभी बारिश की बूंदें बचपन की शरारतें याद दिलाती हैं, तो कभी कोई पुरानी खुशबू उस बीते सुनहरे दौर में ले जाती है, जहां जीवन सरल था, सपने खुले आसमान जैसे थे और खुशियां छोटी-छोटी बातों में समाई रहती थीं।

प्रस्तुत रचना 👑मायका👑 एक बेटी के हृदय की उन्हीं भावनाओं का सहज, सरस और आत्मीय चित्रण है। यह कविता केवल स्मृतियों का संग्रह नहीं, बल्कि उस भावलोक की यात्रा है जहां हर बेटी अपने बचपन, अपने रिश्तों और अपने मायके के अनमोल प्रेम को फिर से जीती है। यह रचना पाठकों के मन में न केवल अपनापन जगाएगी, बल्कि उन्हें अपने जीवन के उन मधुर पलों से भी जोड़ देगी, जो शायद समय की धूल में कहीं छिप गए हैं।

— एक बेटी की कहानी, उसकी जुबानी ✨

👑मायका 👑

मायका वो ताज है 

जिसपे हर बेटी को नाज है 

मायका माँ का साथ है

 भाई बहनों की धरोहर भी

मायके से जो प्रीत है 

दिल में धड़कते हुए गीत है 

हर बात हर नग़मा 

मायके से जुड़ी मीत है 

जब जी चाहा वो किया

जब जो बोला वो पाया

मनमौजी सी वो जिंदगानी 

कितना प्यारा बचपन 

कितनी सुंदर जवानी

दादी मां की वो कहानियां 

पेड़ो पे झूले झूले

गांव के हर बगीचों में 

घूमती वो निगाहे 

किसे कब कैसे चुराकर 

हम झट से भाग जाये 

खो खो पिस्तूल लंगड़ी कब्बडी 

जितना चाहे खेल पाये 

एक दूसरे के घर जा जा कर

सबको बुला ले आये

लुक्का छुपी का वो खेल

हमने बनाई थी जो एक दूजे को जोड़ कर रेल

चोर पुलिस का वो खेल 

एक दूसरे को करना था जो क्लेम 

इमली का था ढेंचा, पानी बर्फ वाले का हॉर्न 

दौड़ लगाकर रुकवाना 

आपस में मिल बैठ कर खाना 

ढेर सारी मस्ती और बातें बनाना 

वाह क्या था वो जमाना 

बचपन का दिन था सुहाना

कास लौट आए फिर से वो बहाना 

वो कागज की कस्ती,वो नाव का बुहाना 

बारिश की बूंदों में खूब झूम जाना 

संतरे की गोली और खट्टी मीठी गटागट का खाना 

बंबइया लड्डू खाकर खूब इतराना 

वो कंचों की मार, हर बार जीतने का जुनून छाना

यही तो है हर बार जुबा पे मायके का नाम आना

मायके बेटियों का घर ही नहीं संसार भी है 

🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹

रचनाकार

डिंपल अग्रवाल 

स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन महिला प्रकोष्ठ 

सरिया छत्तीसगढ़

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 








Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)