संतों की वाणी से बनें विचार - दो

।।हरिओम।।

संतों की वाणी से बने विचार - दो

भूमिका

संतों की वाणी से बने विचार शीर्षक के अंतर्गत प्रस्तुत यह चिंतन मनुष्य को उसके वास्तविक कर्तव्य, विनम्रता और जीवन के ऋणबोध का स्मरण कराता है। प्रकृति का प्रत्येक तत्व—चाहे वह पशु-पक्षी हों, कीट-पतंगे, वृक्ष, नदियाँ अथवा समुद्र—निःस्वार्थ भाव से सृष्टि के संतुलन में अपना योगदान देते हैं, किंतु कभी उसका प्रदर्शन नहीं करते। यह संदेश मनुष्य को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है कि जिस संसार से वह निरंतर प्राप्त करता आया है, उसके प्रति उसका उत्तरदायित्व क्या है।

यह विचार केवल सामाजिक नैतिकता का पाठ नहीं पढ़ाता, बल्कि मनुष्य को उसके भीतर सोई हुई संवेदनशीलता, कर्तव्यपरायणता और विनम्रता को जगाने का आह्वान करता है। संतों की वाणी का सार यही है कि जीवन में लेना जितना सहज है, उतना ही आवश्यक देना भी है—और वह भी बिना अहंकार, बिना प्रदर्शन और बिना प्रतिफल की अपेक्षा के।

व्याख्या

इस चिंतन में सबसे पहले प्रकृति के उन अनगिनत उपकारों की ओर संकेत किया गया है, जो निरंतर और निःशब्द रूप से मानव जीवन को सम्भव बनाते हैं। पशु-पक्षी पर्यावरण का संतुलन बनाए रखते हैं, वृक्ष प्राणवायु देते हैं, नदियाँ जीवन का आधार बनती हैं और पृथ्वी स्वयं सबका भार सहन करती है। आश्चर्य की बात यह है कि ये सभी अपने योगदान का कभी प्रदर्शन नहीं करते। उनका कर्म मौन, सहज और नि:स्वार्थ होता है।

इसी प्रकार मनुष्य भी जन्म लेते ही अनेक प्रकार के ऋणों से जुड़ जाता है। माता-पिता उसे पालन-पोषण देते हैं, गौमाता पोषण का आधार बनती है, गुरु ज्ञान का प्रकाश देते हैं, भाई-बन्धु और समाज सहयोग प्रदान करते हैं। वस्तुतः मनुष्य अपने जीवन में अकेला कुछ भी नहीं कर पाता; उसका अस्तित्व असंख्य सहयोगों का परिणाम होता है। इस दृष्टि से प्रत्येक मनुष्य समाज, प्रकृति और संबंधों का ऋणी है।

किन्तु चिंतन का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि जब प्रतिदान या सेवा का समय आता है, तब मनुष्य प्रायः स्वार्थ के प्रभाव में अपने कर्तव्यों को भूल जाता है। वह दूसरों के लिए किए गए छोटे-से कार्य को भी बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने लगता है। यहाँ संतों की वाणी मनुष्य को सावधान करती है कि सच्ची सेवा वही है जिसमें अहंकार न हो, बखान न हो और केवल कर्तव्य का भाव हो।

इस विचार का मूल संदेश यही है कि मनुष्य को प्रकृति और संबंधों से सीखते हुए विनम्रता, कृतज्ञता और निःस्वार्थ सेवा का मार्ग अपनाना चाहिए। यदि हम बिना प्रदर्शन के अपना कर्तव्य निभाने लगें, तो न केवल हमारा व्यक्तित्व श्रेष्ठ बनेगा, बल्कि समाज में भी आत्मीयता, सहयोग और मानवीय मूल्यों का विकास होगा। यही संतों की शिक्षाओं का वास्तविक सार है।

सृजक


सुलोचना धनावत
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन लेडीज विंग 
नागपुर (महाराष्ट्र)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार 



प्रस्तुति




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