विदर्भ की दहकती दुपहरी

 विदर्भ की दहकती दुपहरी

भूमिका

कुछ स्मृतियाँ समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि तपती धूप की तरह मन पर स्थायी छाप छोड़ जाती हैं। यह संस्मरण केवल एक स्थान विशेष की गर्मी का वर्णन नहीं, बल्कि उस जीवन का जीवंत दस्तावेज़ है जहाँ प्रकृति अपनी कठोरतम परीक्षा लेती है और मनुष्य धैर्य, सहनशीलता तथा जिजीविषा का पाठ सीखता है। विदर्भ की प्रचंड गर्मी, कोयले की तपिश, लू के थपेड़ों और जीवन की सादगी के बीच गुज़रा बचपन—क्या सचमुच कोई इतनी गर्मी में सामान्य जीवन जी सकता है? यह प्रश्न पाठक को भीतर तक जिज्ञासु कर देता है। आइए, अनुभवों की उसी तपती राह पर चलते हैं, जहाँ सूरज केवल आसमान में नहीं, धरती पर भी उतर आया लगता था।

संस्मरण

विदर्भ की दहकती दुपहरी

हम पहले विदर्भ में रहते थे। गांव का नाम चन्द्रपुर था। ऐसा लगता है कि उसका नाम सूर्यपुर होना चाहिए था। ऐसा इसलिए कहा क्योंकि एक तो वहाँ कोयले की खदानें थीं और दूसरा वहाँ थर्मल पावर स्टेशन था, जिससे मुंबई में विद्युत आपूर्ति होती थी।

मई-जून का महीना भारतीय कैलेंडर के अनुसार सबसे गर्म समय होता है। इस दौरान सूरज की किरणें मानो आग बरसाती हैं और गर्म ‘लू’ चलती है। तापमान 40 से 45 डिग्री तक पहुँच जाता था। सुबह आठ-नौ बजे भी लोग सिर पर कपड़ा बाँधकर और हाथ में प्याज लेकर निकलते थे, ताकि गर्मी और लू के प्रभाव से कुछ बचाव हो सके।

जेठ मास, जो हिन्दू कैलेंडर का तीसरा महीना माना जाता है, अपने साथ तपन की चरम सीमा लेकर आता था। चिलचिलाती धूप के कारण दोपहर में सड़कों पर सन्नाटा पसरा रहता। ऐसा प्रतीत होता मानो सूर्य स्वयं आग उगल रहा हो।

इस दुपहरी में चलने वाली गर्म हवा को ‘लू’ कहा जाता है। हवा इतनी गर्म होती कि खुले में रहने पर त्वचा झुलसने लगती। तालाब, नदियाँ और कुएँ सूखने लगते, जिससे जल-संकट भी गहराने लगता।

दोपहर के समय लोग घरों में दुबकने को मजबूर हो जाते। पंखे, कूलर और एयर कंडीशनर भी इस गर्मी के आगे कई बार बेअसर प्रतीत होते। घरों में खस की चिक (पर्दे) लगाकर और उन पर पानी छिड़ककर ठंडक बनाए रखने का प्रयास किया जाता।

इंसानों के साथ-साथ बेजुबान पशु-पक्षी भी इस प्रचंड गर्मी से बेहाल हो जाते। पक्षी पेड़ों की घनी छाँव में आश्रय ढूँढते और पानी की तलाश में भटकते दिखाई देते।

हालाँकि, इस तपिश के बाद शाम को चलने वाली हल्की हवा कुछ राहत लेकर आती, लेकिन दिन के समय प्रकृति और मानव—दोनों की सहनशक्ति की कठिन परीक्षा होती थी।

अब हम बंगलौर में हैं, जहाँ इतनी गर्मी नहीं होती। वैसे भी एक कहावत प्रचलित है कि जिसने विदर्भ की गर्मी सहन कर ली, वह कहीं भी रह सकता है।

प्रमिला त्रिवेदी

संस्मरण से सीख

यह संस्मरण हमें सिखाता है कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, मनुष्य अपनी अनुकूलन क्षमता, धैर्य और संयम से हर चुनौती का सामना करना सीख लेता है। साथ ही यह भी स्मरण कराता है कि प्रकृति की कठोरता को समझते हुए जल संरक्षण, पर्यावरण संतुलन और पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशील होना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।

सृजक

प्रमिला त्रिवेदी

स्थानीय संपादिका

उलझन सुलझन (महिला विंग) 

बेंगलुरु

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति








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