सच से पहले निर्णय: एक स्त्री की अनकही कहानी
सच से पहले निर्णय
एक महिला की अनकही कहानी
— प्रमिला त्रिवेदी के संस्मरण पर आधारित एक संवेदनशील आलेख
कभी-कभी जीवन की छोटी-सी घटना हमारे भीतर ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है, जिनके उत्तर वर्षों बाद भी नहीं मिलते। समय बदल जाता है, चेहरे बदल जाते हैं, लेकिन कुछ स्मृतियाँ मन के किसी कोने में स्थायी रूप से बस जाती हैं। वे केवल यादें नहीं होतीं, बल्कि समाज, सोच और संवेदनाओं के आईने की तरह हमारे सामने खड़ी रहती हैं।
कुछ समय पहले सोशल मीडिया पर भगवान बुद्ध के जीवन से जुड़ा एक प्रसंग पढ़ने को मिला। यह वही प्रसंग था जिसमें राजकुमार सिद्धार्थ गृहस्थ जीवन छोड़कर सत्य की खोज में निकल पड़ते हैं। इस प्रसंग को पढ़ते हुए मन में एक विचार कौंधा कि इतिहास और समाज प्रायः पुरुषों के घर छोड़ने को वैराग्य, आध्यात्मिक खोज या परिस्थितियों की विवशता के रूप में देख लेते हैं। वहीं यदि किसी स्त्री के जीवन में कोई असामान्य घटना घटे, तो उसके प्रति समाज का रवैया कई बार सहानुभूति से अधिक आरोपात्मक दिखाई देता है। यह विचार अचानक नहीं आया था; इसके पीछे वर्षों पुरानी एक घटना की स्मृति जुड़ी हुई थी।
करीब पैंतीस वर्ष पहले हमारे घर के पास एक दम्पती रहता था। दोनों अत्यंत सरल, मेहनती और संतोषी स्वभाव के थे। सीमित साधनों में भी उन्होंने अपने छोटे-से परिवार को प्रेम और सहयोग से संजो रखा था। महिला का नाम पद्मा था। उसका हमारे घर में इतना अपनापन था कि मेरी माँ को वह अपनी माँ ही मानती थी। घर की छोटी-बड़ी बात, बच्चों की चिंता, बाजार का काम—सबमें वह माँ से सलाह कर लिया करती थी। बाजार जाती तो पूछकर जाती कि कुछ मँगवाना हो तो बता दीजिए।
पद्मा का परिवार आर्थिक रूप से संपन्न नहीं था, लेकिन आत्मीयता में किसी तरह की कमी नहीं थी। उसके पति समोसे का ठेला लगाते थे। गृहस्थी चलाने में पद्मा कंधे से कंधा मिलाकर साथ देती थी। मसाला तैयार करना, समोसे भरना, घर का काम सँभालना, बच्चों को स्कूल छोड़ना और लाना—सब कुछ वह स्वयं करती थी। उनकी सबसे छोटी बेटी मात्र दस महीने की थी, जो अक्सर उसकी गोद में ही रहती थी।
एक दिन की बात है। पद्मा ने अपने पति से कहा कि घर में रॉकेल समाप्त हो गया है, पैसे दे दो, मैं लेकर आती हूँ। छोटी बच्ची सो रही थी, इसलिए उसने पति से कहा कि थोड़ी देर उसका ध्यान रख लेना, मैं जल्दी लौट आऊँगी। पति अपने ठेले की सफाई कर रहे थे और बच्ची का ध्यान भी रखे हुए थे।
लेकिन वह “जल्दी” कभी लौटकर नहीं आई।
एक घंटा बीता, फिर दूसरा, फिर तीसरा। चिंता बढ़ी तो पद्मा का पति बच्ची को गोद में लेकर हमारे घर आया। उसने घबराए स्वर में माँ से पूछा—“क्या पद्मा यहाँ आई है?” माँ ने आश्चर्य से कहा—“नहीं, वह तो आज आई ही नहीं।”
उस दिन घर-परिवार और परिचितों के स्तर पर खोजबीन शुरू हुई। अस्पतालों में पता किया गया, रिश्तेदारों और परिचितों से पूछताछ हुई, लेकिन पद्मा का कोई पता नहीं चला। अगले दिन पुलिस में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवाई गई। कई दिनों तक तलाश जारी रही, लेकिन परिणाम शून्य रहा।
समय के साथ यह घटना आसपास के लोगों की चर्चा का विषय बन गई। दुखद यह था कि जहाँ एक ओर परिवार उसकी चिंता में डूबा था, वहीं दूसरी ओर समाज ने बिना किसी प्रमाण के अपने निष्कर्ष गढ़ने शुरू कर दिए। धीरे-धीरे पद्मा को “भाग गई” कहे जाने लगा। एक ऐसी स्त्री, जिसे निकट से जानने वाले उसकी सादगी, पारिवारिक समर्पण और अपने पति-बच्चों के प्रति प्रेम को समझते थे, वह अचानक लोगों की कल्पनाओं और आरोपों का पात्र बना दी गई।
उसके पति का संघर्ष भी कम पीड़ादायक नहीं था। वह पुलिस थाने के चक्कर लगाता रहा, बच्चों की जिम्मेदारी सँभालने के लिए अपने भाई को बुलाना पड़ा, और अंततः बच्चों को रिश्तेदारों के साथ भेजना पड़ा। परंतु एक प्रश्न हमेशा अधूरा ही रह गया—पद्मा के साथ आखिर हुआ क्या था?
संभव है वह किसी दुर्घटना का शिकार हुई हो। संभव है किसी अपराध की शिकार बनी हो। या कोई और ऐसी परिस्थिति रही हो जिसका किसी को कभी पता न चला। सच क्या था, यह आज तक एक रहस्य ही बना हुआ है।
लेकिन इस घटना ने एक कठोर सामाजिक सच सामने रखा—हम अक्सर तथ्य सामने आने से पहले ही निर्णय सुना देते हैं। विशेष रूप से जब बात किसी स्त्री की हो, तो अनुमान बहुत जल्दी आरोप का रूप ले लेते हैं।
इसके विपरीत, यदि कोई पुरुष घर छोड़ दे, तो कई बार समाज उसके लिए परिस्थितियों, मानसिक अवस्था या वैराग्य जैसी संभावनाओं पर विचार करता है। उसके लिए सहानुभूति का स्थान बचा रहता है। पर स्त्री के मामले में निर्णय अधिक कठोर और चरित्र आधारित हो जाते हैं। यह भेदभाव केवल सोच का नहीं, संवेदनशीलता का भी प्रश्न है।
आज इतने वर्षों बाद भी जब कोई पद्मा के लिए सहजता से “भाग गई” शब्द कह देता है, तो मन ग्लानि से भर उठता है। क्योंकि हमने उसे बहुत निकट से देखा था—उसका संघर्ष, उसका अपनापन और अपने परिवार के प्रति उसका समर्पण भी।
यह संस्मरण केवल एक स्त्री की गुमशुदगी की कहानी नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति पर प्रश्नचिह्न है जिसमें हम बिना सत्य जाने किसी के जीवन का निर्णय लिख देते हैं। किसी भी व्यक्ति—स्त्री हो या पुरुष—के बारे में मनगढ़ंत निष्कर्ष निकालने से पहले यह याद रखना चाहिए कि हर अनुपस्थिति के पीछे कोई कहानी होती है, और हर कहानी वैसी नहीं होती जैसी समाज उसे बना देता है।
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