प्रेम क्या है?
प्रेम क्या है?
उपरोक्त रचना प्रेम को केवल आकर्षण या भावनात्मक आसक्ति के सीमित दायरे में नहीं, बल्कि अधिकार, मर्यादा, समर्पण, संवाद और उत्तरदायित्व के रूप में देखने का प्रयास करती है। लेखिका ने ' प्रेम क्या है? ' के प्रश्न को अत्यंत संवेदनशील ढंग से उन सीमाओं के माध्यम से समझाया है, जहाँ प्रेम में भावनाएँ तो प्रबल होती हैं, परंतु स्वार्थ, छल, त्याग या अपमान का अधिकार नहीं होता। यह रचना वर्तमान समाज में प्रेम को लेकर फैली अनेक भ्रांतियों को दूर करने की दिशा में सार्थक संकेत देती है।
प्रेम
भावना मात्र नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार संवेदना
आज का समय प्रेम को प्रायः आकर्षण, अधिकार, शारीरिक निकटता, स्वामित्व अथवा क्षणिक भावुकता के रूप में देखने लगा है। यही कारण है कि प्रेम और मोह, प्रेम और आसक्ति, प्रेम और स्वार्थ, प्रेम और नियंत्रण—इन सबके बीच की सीमाएँ धुंधली हो रही हैं। इस रचना की विशेषता यह है कि यह प्रेम को “क्या पाने का अधिकार है” से अधिक “क्या नहीं करने का अधिकार है” के माध्यम से परिभाषित करती है।
जब लेखिका लिखती हैं—
“शिकायतों का इख्तियार तो दोनों को हो,
मगर, रुसवा होकर भूलने का हक किसी को भी नहीं…”
तो यहाँ प्रेम को संवाद और असहमति का स्थान दिया गया है, परंतु अहंकार के कारण संबंध को नकारने की अनुमति नहीं। यह संदेश सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज अनेक संबंध संवादहीनता और तात्कालिक आक्रोश में टूट जाते हैं।
इसी प्रकार—
“प्यार से भरे इल्ज़ाम की अदा दोनों पर हो,
मगर, बेवफा होने का हक किसी को नहीं…”
यहाँ प्रेम को भावनात्मक निकटता और विश्वास के धरातल पर स्थापित किया गया है। प्रेम में रूठना, शिकायत करना, अपेक्षाएँ रखना स्वाभाविक हैं; परंतु छल, विश्वासघात और संवेदनाओं के शोषण को प्रेम नहीं कहा जा सकता।
प्रेम के विविध स्वरूपों को समझना आवश्यक
लेखिका ने दांपत्य अथवा दो व्यक्तियों के मध्य प्रेम को केंद्र में रखकर भाव व्यक्त किए हैं, किंतु समाज में भ्रम इसलिए भी उत्पन्न होता है क्योंकि लोग प्रेम के विविध स्वरूपों को समझ नहीं पाते। वास्तव में प्रेम केवल एक स्त्री और पुरुष के मध्य आकर्षण तक सीमित नहीं है।
प्रेम के अनेक स्वरूप हैं—
मातृत्व का प्रेम — जहाँ त्याग है, अपेक्षा नहीं।
पितृत्व का प्रेम— जहाँ अनुशासन में भी सुरक्षा छिपी होती है।
मित्रता का प्रेम— जहाँ स्वार्थ से अधिक साथ महत्वपूर्ण होता है।
मानवीय प्रेम — जहाँ संवेदना, करुणा और सहअस्तित्व होता है।
आध्यात्मिक प्रेम — जहाँ आत्मा का विस्तार और समर्पण है।
राष्ट्र प्रेम और प्रकृति प्रेम — जहाँ अपने से ऊपर किसी बड़े उद्देश्य के लिए जुड़ाव होता है।
समस्या तब जन्म लेती है जब मनुष्य इन सभी स्वरूपों को केवल रोमांटिक प्रेम के चश्मे से देखने लगता है। परिणामस्वरूप, वह हर स्नेह को स्वामित्व समझ बैठता है और हर निकटता को संबंध का दावा। यही सामाजिक भ्रांति अनेक मानसिक, पारिवारिक और सामाजिक संघर्षों को जन्म देती है।
प्रेम और आसक्ति का अंतर
यह रचना अप्रत्यक्ष रूप से एक और गहरी बात कहती है—
प्रेम खोता नहीं, संवारता है; आसक्ति बाँधती है, प्रेम मुक्त करता है।
यदि कोई संबंध व्यक्ति को तोड़ रहा हो, उसका आत्मसम्मान छीन रहा हो, उसे भय, नियंत्रण या अपमान में बाँध रहा हो—तो वह प्रेम का स्वरूप नहीं, बल्कि निर्भरता या मोह हो सकता है।
सच्चा प्रेम—
* अधिकार तो देता है, पर अधिकारवाद नहीं,
* निकटता देता है, पर घुटन नहीं,
* शिकायत देता है, पर अपमान नहीं,
* स्वतंत्रता देता है, पर बेपरवाही नहीं।
रचना की साहित्यिक विशेषता
रचना की भाषा सरल, भावप्रधान और जनसामान्य के लिए सहज ग्रहणीय है। “प्रेम…” शब्द की पुनरावृत्ति एक लयात्मक प्रभाव उत्पन्न करती है, जिससे प्रत्येक भाव अलग पड़ाव की तरह सामने आता है। यद्यपि कुछ स्थानों पर भावों को और विस्तार देकर प्रेम के व्यापक मानवीय आयाम जोड़े जा सकते थे, फिर भी इसका मूल संदेश अत्यंत स्पष्ट और प्रभावकारी है।
निष्कर्ष
यह रचना प्रेम को भावुकता से निकालकर संवेदनशील जिम्मेदारी और नैतिक मर्यादा के स्तर पर स्थापित करती है। समाज को आज ऐसे ही विमर्शों की आवश्यकता है, जो यह समझा सकें कि प्रेम केवल पाने या जताने का नाम नहीं, बल्कि विश्वास, मर्यादा, सह-अस्तित्व और संवेदनशीलता का अनुबंध है।
शायद प्रेम की सबसे सुंदर परिभाषा यही हो सकती है—
“जहाँ अपना होने का अहसास हो, पर किसी को खो देने का भय नहीं; जहाँ अधिकार हो, पर स्वामित्व नहीं; जहाँ समर्पण हो, पर स्वयं का अस्तित्व भी सुरक्षित रहे—वहीं प्रेम अपने शुद्धतम स्वरूप में जीवित रहता है।”
कविता रचनाकार
प्रमिला त्रिवेदी







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