गुर्जर जनजागृति संबंधी कार्यक्रम
गुर्जर जनजागृति संबंधी कार्यक्रम
समाजशास्त्री प्रो. राकेश राणा से विशेष बातचीत
भूमिका
1857 की जनक्रांति के महानायक कोतवाल धनसिंह गुर्जर के शहीद दिवस पर 10 मई 2026 को संयुक्त गुर्जर परिसंघ द्वारा सुभारती विश्वविद्यालय में आयोजित भव्य जनजागृति कार्यक्रम ने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सकारात्मक संदेश दिया। क्रांति दिवस पर आयोजित इस विराट आयोजन में विभिन्न समाजों के बुद्धिजीवी, समाजसेवी, शिक्षाविद, युवा और जनप्रतिनिधि बड़ी संख्या में उपस्थित रहे। कार्यक्रम में 1857 की साझी विरासत, शहीदों के सम्मान, सामाजिक चेतना, राजनीतिक प्रतिनिधित्व तथा समाज सुधार जैसे विषयों पर गंभीर विमर्श हुआ।
इसी अवसर पर गाजियाबाद से पधारे समाजशास्त्री प्रो. डॉ. राकेश राणा ने अपने विचार साझा किए। व्यस्तता के बीच समय निकालकर इस महत्वपूर्ण विषय पर विस्तार से बातचीत करने के लिए हम उनका साधुवाद व्यक्त करते हैं। प्रस्तुत है उनसे हुई विशेष बातचीत—
प्रश्न १. अमर शहीद कोतवाल धनसिंह गुर्जर की शहादत को समर्पित कार्यक्रमों को आप किस तरह देखते हैं?
उत्तर - "ऐसे कार्यक्रम केवल किसी व्यक्ति विशेष का स्मरण नहीं होते, बल्कि वे राष्ट्र की सामूहिक चेतना को जागृत करने का माध्यम बनते हैं। कोतवाल धनसिंह गुर्जर की शहादत भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की उस विरासत का प्रतीक है, जिसमें जाति, धर्म और समुदाय से ऊपर उठकर देशहित सर्वोपरि था। मेरठ में आयोजित यह कार्यक्रम सामाजिक एकता, अनुशासन और ऐतिहासिक चेतना का उत्कृष्ट उदाहरण रहा। इससे नई पीढ़ी को अपने गौरवशाली इतिहास को जानने और राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने की प्रेरणा मिलती है।"
प्रश्न २. जन क्रांति के नायक धन सिंह के बारे में आप कुछ बतायें।
उत्तर - "कोतवाल धनसिंह गुर्जर 1857 की प्रथम स्वतंत्रता क्रांति के अग्रणी नायकों में से एक थे। वे मेरठ के कोतवाल पद पर रहते हुए अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनविद्रोह को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका में रहे। उन्होंने सैनिकों और आम जनता को साथ लेकर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी। उनका नेतृत्व केवल संघर्ष तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें संगठन क्षमता, साहस और जनजागरण की अद्भुत शक्ति भी थी। वे भारतीय अस्मिता, स्वाभिमान और बलिदान के जीवंत प्रतीक हैं।"
प्रश्न ३. मेरठ की 1857 की क्रांति की पृष्ठभूमि पर एक संक्षिप्त टिप्पणी करिए।
उत्तर - "मेरठ की धरती 1857 की क्रांति का प्रारंभिक केंद्र रही। अंग्रेजों की दमनकारी नीतियों, सामाजिक-धार्मिक हस्तक्षेप, आर्थिक शोषण और सैनिकों के भीतर बढ़ते असंतोष ने जनआक्रोश को जन्म दिया। 10 मई 1857 को सैनिकों और आम जनता ने मिलकर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध बिगुल फूंका। इस संघर्ष में हर जाति और समुदाय के लोगों ने सहभागिता की। यही कारण है कि मेरठ की क्रांति केवल सैनिक विद्रोह नहीं, बल्कि जनक्रांति के रूप में इतिहास में दर्ज हुई।"
प्रश्न ४. आपने धनसिंह जी के बारे में सबसे पहले कब पढ़ा/कब सुना?
उत्तर - "मैंने छात्र जीवन में 1857 की क्रांति का अध्ययन करते समय पहली बार कोतवाल धनसिंह गुर्जर के बारे में पढ़ा था। बाद में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सामाजिक इतिहास और जनआंदोलनों पर अध्ययन करते हुए उनके योगदान की व्यापकता को समझने का अवसर मिला। जितना अधिक अध्ययन किया, उतना ही यह महसूस हुआ कि इतिहास में उनके योगदान को अपेक्षित स्थान नहीं मिल पाया।"
प्रश्न ५. समाज में महानायक धनसिंह कोतवाल जी की लोकप्रियता इतनी देर से क्यों बढ़ी?
उत्तर - "इसके पीछे सबसे बड़ा कारण इतिहास लेखन की सीमाएं और उपेक्षा रही। स्वतंत्रता संग्राम के अनेक स्थानीय और जननायकों को मुख्यधारा के इतिहास में पर्याप्त स्थान नहीं दिया गया। अब समाज में अपने इतिहास को पुनः खोजने और समझने की चेतना बढ़ी है। सामाजिक संगठनों, शोधकर्ताओं और युवाओं ने जब इस दिशा में काम शुरू किया, तब कोतवाल धनसिंह गुर्जर जैसे महानायकों की भूमिका व्यापक रूप से सामने आने लगी। यह सकारात्मक परिवर्तन है।"
प्रश्न ६. आज अचानक से कोतवाल साहब के कार्यक्रमों के लिए गुर्जर समाज में इतनी बाढ़ सी कैसे आ गई?
उत्तर - "इसे केवल भावनात्मक उभार के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह अपने इतिहास, अस्तित्व और योगदान को पहचानने की सामाजिक चेतना का परिणाम है। समाज के लोग महसूस कर रहे हैं कि उनके पूर्वजों ने राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिसे नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। साथ ही सामाजिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रश्नों ने भी समाज को संगठित होने की प्रेरणा दी है। इसलिए अब ऐसे कार्यक्रम जनआंदोलन का स्वरूप लेते दिखाई दे रहे हैं।"
प्रश्न ७. जिस तरह से गुर्जर समाज धनसिंह कोतवाल जी के लिए भारत रत्न की मांग कर रहा है, उसके लिए आप क्या सोचते हैं और समाज को इस दिशा में क्या-क्या करना चाहिए?
उत्तर - "यदि किसी महानायक ने राष्ट्र के लिए असाधारण योगदान दिया है, तो उसके सम्मान की मांग लोकतांत्रिक और नैतिक रूप से उचित है। कोतवाल धनसिंह गुर्जर के योगदान पर गंभीर ऐतिहासिक शोध, दस्तावेजी प्रमाण और व्यापक जनचेतना तैयार करना आवश्यक है। समाज को केवल भावनात्मक आग्रह तक सीमित न रहकर अकादमिक विमर्श, शोध प्रकाशन, संगोष्ठियों, युवाओं में इतिहास बोध और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक प्रयासों पर ध्यान देना चाहिए। यदि इस दिशा में संगठित और तथ्यपरक कार्य होगा, तो निश्चित रूप से राष्ट्रीय स्तर पर उनकी भूमिका को और अधिक सम्मान मिलेगा।"
कार्यक्रम की झलकियाँ


















Thanks a lot
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