यादें - प्रमिला त्रिपाठी

यादें

भूमिका

मानव जीवन केवल वर्तमान का नाम नहीं है, वह बीते हुए पलों की स्मृतियों से भी निर्मित होता है। कुछ यादें समय के साथ धुंधली पड़ जाती हैं, जबकि कुछ ऐसी होती हैं जो वर्षों बाद भी किसी पुराने खत, किसी तस्वीर या किसी सूखे गुलाब की महक में फिर जीवित हो उठती हैं। प्रेम, बिछोह, प्रतीक्षा और भावनात्मक लगाव—ये सभी मनुष्य के अंतर्मन में गहरे बसे अनुभव हैं, जो कभी-कभी शब्दों का रूप लेकर कविता बन जाते हैं।

इन्हीं कोमल और संवेदनशील भावनाओं को अत्यंत मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त करती है प्रमिला त्रिवेदी की कविता यादें। यह कविता केवल स्मरण का भाव नहीं, बल्कि उन अनकहे रिश्तों, अधूरे संवादों और अमिट अनुभूतियों की कहानी है, जो समय बीतने के बाद भी मन की तहों में सुरक्षित रहती हैं।

कविता : यादें

प्रमिला त्रिवेदी

खत लिखा था,,,,,

तेरे प्यार का जो ग़ुलाब था

बरसों से, उस बंद किताब में, रखा था,

आज़ फिर महक गया,

और वो महक थी तेरी यादों की,

पंखुड़ियों ने साथ छोड़ दिया था,

तुम्हारी तरह, पर बंदगी ना छोड़ी काँटों ने,

तेरी यादों की तरह,

उन बंद खतों को खोला,

आज़ फिर, वो खामोश अल्फाज़ों को,

आवाज दे गया,


तेरी तस्वीर को हाथ में लिए

खो गई हूँ उन यादों में,

भय लगता है उन चीजों को खोने में,

जिन्हें पाने के लिए हमने सालों लगा दिये थे,

भीगे हुए शख्स को बारिश का डर कैसा?


खुश रहने की कोशिश में

खुश रहना भूल गए,

तुम कहते हो कि

दिल लगाने को हम दिल का हाल ही भूल गए।

दिल ने आज फिर चाहा,

खत लिख दूँ तुम्हें,,,,

और रख दूँ उसमें एक गुलाब....

तस्वीरें बोलती हैं।

इन्तज़ार अगर,

लम्बा हो तो चलता है

पर अगर एक तरफा हो,

तो दर्द ही देता है,

वैसे दर्द हमेशा अपने ही देते हैं।

व्याख्या

प्रमिला त्रिवेदी की कविता यादें स्मृतियों के भावुक संसार को अत्यंत सहज और संवेदनशील भाषा में प्रस्तुत करती है। कविता की शुरुआत एक पुराने खत और उसमें रखे गुलाब से होती है। यह गुलाब केवल फूल नहीं, बल्कि बीते प्रेम, अपनत्व और भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक बन जाता है। वर्षों बाद भी उसकी महक लौट आना यह दर्शाता है कि सच्चे संबंध समय के साथ समाप्त नहीं होते, वे स्मृतियों में जीवित रहते हैं।

कवयित्री ने सूखी पंखुड़ियों और शेष रह गए काँटों के माध्यम से रिश्तों की गहराई को व्यक्त किया है। जैसे पंखुड़ियाँ बिखर गईं, वैसे ही प्रिय व्यक्ति साथ छोड़ गया, लेकिन काँटे अब भी मौजूद हैं—अर्थात् यादें, पीड़ा और समर्पण अभी भी मन में जीवित हैं। यह प्रतीकात्मक चित्रण कविता को अत्यंत प्रभावशाली बनाता है।

पुराने खतों को खोलना, खामोश अल्फाज़ों को आवाज़ देना और तस्वीरों में खो जाना—ये सब उस भावनात्मक यात्रा का हिस्सा हैं जिसमें इंसान अपने अतीत से संवाद करता है। कवयित्री स्वीकार करती हैं कि जिन चीजों को पाने में वर्षों लगे हों, उन्हें खो देने का भय स्वाभाविक है। यह भय केवल वस्तुओं का नहीं, बल्कि उनसे जुड़े भावों और रिश्तों का भी है।

कविता का एक अत्यंत मार्मिक पक्ष वह है जहाँ कवयित्री कहती हैं कि “खुश रहने की कोशिश में खुश रहना भूल गए।” यह पंक्ति आधुनिक जीवन की विडंबना को दर्शाती है, जहाँ व्यक्ति बाहरी मुस्कान के पीछे अपने भीतर की भावनाओं को दबा देता है।

अंतिम पंक्तियों में प्रतीक्षा और एकतरफा प्रेम की पीड़ा को बहुत सहजता से व्यक्त किया गया है। कवयित्री मानती हैं कि लंबा इंतज़ार सहा जा सकता है, लेकिन यदि वह एकतरफा हो जाए तो वह केवल दर्द बनकर रह जाता है। और यह दर्द अक्सर उन्हीं से मिलता है, जिनसे सबसे अधिक अपनापन जुड़ा होता है।

शिक्षा 

यादों की महत्ता का भावुक आलोक

यादें जीवन की वह अमूल्य धरोहर हैं, जो हमें हमारे बीते समय, रिश्तों और अनुभूतियों से जोड़कर रखती हैं। वे केवल अतीत की परछाइयाँ नहीं होतीं, बल्कि हमारे भावनात्मक अस्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं। कुछ यादें मुस्कान देती हैं, कुछ आँखें नम कर जाती हैं, पर हर स्मृति हमें यह एहसास कराती है कि हमने जीवन को कभी गहराई से जिया था।

यह कविता सिखाती है कि प्रेम और अपनापन कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते; वे स्मृतियों में रूप बदलकर जीवित रहते हैं। साथ ही यह भी समझाती है कि रिश्तों की कद्र उनके रहते करनी चाहिए, क्योंकि खो जाने के बाद केवल यादें ही शेष रहती हैं—जो कभी मरहम बनती हैं, तो कभी टीस।

यादों का सम्मान करना, उनसे सीख लेना और उनके सहारे जीवन में संवेदनशील बने रहना ही मनुष्य की भावनात्मक परिपक्वता का परिचायक है।

सृजक

 
प्रमिला त्रिवेदी
स्थानीय सम्पादिका 
उलझन सुलझन (महिला प्रकोष्ठ)
बेंगलुरु
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 









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