मदर्स डे पर विशेष

मदर्स डे पर विशेष

भूमिका

माँ केवल एक शब्द नहीं, बल्कि जीवन की वह अनमोल अनुभूति है, जो जन्म से लेकर अंतिम सांस तक हमारे अस्तित्व को प्रेम, संस्कार और संबल देती रहती है। उसकी ममता, त्याग, संघर्ष और निस्वार्थ समर्पण ही परिवार और समाज की वास्तविक शक्ति हैं। मदर्स डे के अवसर पर स्त्री दर्पण द्वारा आरंभ की गई मेरी माँ श्रृंखला उसी मातृत्व को शब्दों में सहेजने का एक संवेदनशील प्रयास है, जिसमें माँ के व्यक्तित्व, संघर्ष, संस्कार, पारिवारिक योगदान और जीवन-दर्शन को भावुकता से परे एक समग्र दृष्टि से समझने और प्रस्तुत करने की पहल की गई है।

एक खूबसूरत पहल

स्त्री दर्पण ने 30 अप्रैल से मेरी माँ शृंखला की शुरुआत करते हुए मातृत्व के विविध आयामों को साहित्यिक संस्मरणों के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाने का सुंदर प्रयास किया। आज इसी क्रम में ‘मेरी निहारिका’ की संपादक विजया डालमिया का संस्मरण प्रकाशित किया जा रहा है। इस शृंखला का उद्देश्य केवल भावुक स्मृतियों को साझा करना नहीं, बल्कि माँ के व्यक्तित्व, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, संघर्ष, त्याग, वैचारिक दृष्टि, दांपत्य संबंधों तथा परिवार निर्माण में उनके योगदान का समग्र और निष्पक्ष मूल्यांकन प्रस्तुत करना है।

एक पाती माँ के नाम

 
                मेरी मां

हर हिस्से की गूँज है माँ

विजया डालमिया

“माँ” — संसार का सबसे सुंदर और सबसे छोटा शब्द। मनुष्य की जुबान से निकलने वाली यह पहली आवाज़ होती है, जो तोतली भाषा में भी पूरी सहजता से उच्चरित हो जाती है। ममता और लाड़-दुलार की कोई भाषा नहीं होती। एक बच्चा अपनी माँ की धड़कनों में भी संगीत सुन लेता है। सृष्टि में माँ जैसा नैसर्गिक कलाकार दूसरा कोई नहीं। रोते हुए बच्चे को हँसाना, उसे बोलना-चलना सिखाना, रूठना और मनाना — यह सब माँ के सहज अभिनय का हिस्सा है। यह कला उसे किसी कार्यशाला में सीखने की आवश्यकता नहीं पड़ती; यह तो प्रकृति की अनुपम देन है।

“माँ” जब भावनाओं से जुड़ती है, तो आत्मा की गहराइयों तक उतर जाती है। यह छोटा-सा शब्द अपने भीतर पूरी कायनात समेटे हुए है। यूँ कहें कि एक तरफ पूरी दुनिया हो और दूसरी तरफ माँ, तब भी माँ का पलड़ा भारी ही रहेगा, क्योंकि वह अपने बच्चों के लिए सब कुछ न्योछावर कर देती है। वही हमें आकार, आचार और विचार देती है। हम सब अपनी माँ के ऋणी हैं और उनका यह ऋण कभी नहीं चुका सकते। हमारी नज़र उतारकर जो सिक्के उन्होंने गंगा मैया में प्रवाहित किए, वे सिक्के भी हम उन्हें कभी लौटा नहीं सकते।

1 नवंबर 1942 को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में मेरी मम्मी का जन्म हुआ। वह दिन भी अत्यंत शुभ था — धनतेरस। नाना-नानी की सबसे बड़ी बेटी का नाम बड़े प्यार से “तुलसी” रखा गया। ग्यारह भाई-बहनों में सबसे अधिक कुशाग्र बुद्धि रखने वाली मेरी मम्मी का पालन-पोषण उस समय के हिसाब से अत्यंत लाड़-प्यार से हुआ। नानाजी सम्पन्न व्यक्ति थे और उन्होंने मम्मी को हमेशा हथेली पर रखकर पाला। मम्मी हर काम बड़ी मुस्तैदी से किया करती थीं। पढ़ाई में उनकी गहरी रुचि थी, किंतु दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते उनका विवाह नागपुर के एक बड़े अग्रवाल परिवार में कर दिया गया।

संयुक्त मारवाड़ी परिवार में रहते हुए भी मम्मी हमेशा हमसे शुद्ध हिंदी में बात करती थीं। परिवार बड़ा था, इसलिए हमारा प्यार दादी, ताईजी और चाचीजी के बीच बँटता रहा। उस समय बड़ों के सामने बच्चों को खुलकर दुलारने का चलन भी नहीं था। इसलिए मम्मी कभी अपना स्नेह खुलकर जता नहीं पाईं, और न ही हमें उनसे खुली प्रशंसा मिल पाई। फिर भी उनके हर जिक्र में हमारी चिंता और भलाई छिपी रहती थी। माँ बनने के बाद ही समझ आता है कि जीवन को सही दिशा देने के लिए माँ की फटकार भी उतनी ही आवश्यक होती है।

मम्मी बेहद समझदार, व्यवहार-कुशल, स्वाभिमानी और स्वावलंबी थीं। इतने बड़े परिवार में किसी भी गंभीर विषय पर उनकी राय सर्वोपरि मानी जाती थी। कशीदाकारी और बेलबूटों में उन्हें महारत हासिल थी। हम उनकी आँखों से डरते थे और वे अपनी माँ की आँखों से।

मुझे आज भी वह घटना याद है, जब मम्मी हमें फिल्म “राजा और रंक” दिखाने ले गई थीं और छोटा भाई नानी के पास रह गया था। उसके बहुत रोने पर घर लौटते ही नानी ने मम्मी को सबके सामने एक थप्पड़ मार दिया। हम बच्चे सहम गए थे। उस समय का अनुशासन ऐसा ही था। किंतु हमारी मम्मी हमारे साथ हमेशा दोस्त की तरह रहीं। हम उनसे हर बात साझा करते थे। हमारे मित्र भी कहा करते थे — “तुम्हारी मम्मी कितनी अच्छी बातें करती हैं।”

अक्सर हम माँ को महानता के ऐसे आदर्श फ्रेम में कैद कर देते हैं कि उसकी चंचलता, उसकी संवेदनाएँ और उसका व्यक्तित्व देख ही नहीं पाते। एक बार मैंने उनकी सभी सहेलियों को घर बुलाया। उस दिन मैंने पहली बार अपनी माँ के भीतर छिपी उस चुलबुली लड़की को देखा, जो उम्र के इस पड़ाव पर भी दिल से उतनी ही जीवंत थी।

मम्मी को पढ़ने का बहुत शौक था। अखबार हो या पत्रिका, बिना पढ़े वे कभी नहीं सोती थीं। आज लिखते समय बार-बार यही विचार आता है कि यदि वे होतीं, तो कितने प्रेम से मुझे पढ़तीं।

2021 में कोरोना की दूसरी लहर ने हमारी दुनिया सूनी कर दी। माँ अब तारा बन चुकी हैं। वे अब आशीर्वाद बनकर मेरी लेखनी में चमकती हैं। उनके जाने के बाद मैंने उनसे संवाद करने के लिए “पाती” लिखनी शुरू की। यह हर उस संतान की आवाज़ है, जिसकी माँ उसे छोड़कर चली गई। जब तक मम्मी थीं, कभी कह नहीं पाए — “मम्मी, लव यू।” किंतु आज हमारे हर हिस्से की गूँज यही कहती है — “मम्मी… लव यू… मिस यू…”

एक पाती माँ के नाम

प्यारी माँ,

आज पहली बार खत के माध्यम से तुमसे दिल की बात कर रही हूँ। पहले कभी इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ी, क्योंकि तुम तो मेरा मौन भी समझ लेती थीं। पर अब, जब तुम नहीं हो, तो शब्दों का सहारा लेना पड़ रहा है।

लरजते हाथों से एक शब्द लिखना चाहा — “मौत”… और स्याही खत्म हो गई। माँ के दिनों में ही तुम चली गईं। देखते-देखते एक महीना बीत गया, पर कैसे बीता — यह कोई नहीं जानता। हर दिन एक-एक साल की तरह गुजरा। सब कुछ जैसे यंत्रवत हो रहा है — विचारों का आना, आँखों का बरसना… कहीं कोई पूर्ण विराम नहीं, सिवाय इसके कि “माँ नहीं रही।”

माँ, तुमने हमें सब कुछ सिखाया, पर तुम्हारे बिना कैसे जीना है — यह कभी नहीं सिखाया। जब से गई हो, आँखों में एक स्थायी नमी बस गई है। यूँ तो मैं रोई भी नहीं और वैसे ही मैं सोई भी नहीं। शायद यही वजह है कि जागते हुए भी सोने और सोते हुए भी जागने का एहसास बना रहता है।

जिस घर में तुम रहती थीं, जहाँ हर कोना तुम्हारी याद से महकता है, उसी घर का एक कोना भी अंतिम विदाई में तुम्हें नसीब नहीं हुआ। कितनी हसरतें आँखों में लिए तुम चली गईं — कौन जानता है? शायद जाते-जाते तुमने आवाज़ भी दी होगी और हम सुन न पाए होंगे।

हम जानते हैं कि तुम भी नहीं जानती थीं कि इस तरह अचानक चली जाओगी, वरना कुछ तो हिदायतें देतीं, जैसे कहीं थोड़े दिनों के लिए भी जाती थीं तो देकर जाती थीं।

सब एक-दूसरे से पूछते हैं — “कैसे हो?” और जवाब वही रटा-रटाया — “ठीक हूँ।” जबकि भीतर से कोई भी ठीक नहीं है। सब एक-दूसरे को इसलिए संभाल रहे हैं, क्योंकि सबका दर्द एक ही है।

माँ, आज मेरी कहानी ‘मेरी निहारिका’ में प्रकाशित हुई। देख रही हो न तुम? जहाँ भी हो, बहुत खुश हो रही होगी। हमेशा दूसरों की कहानियाँ पढ़कर खुश होती थीं, आज मेरी लिखी कहानी पढ़कर तुम्हें कैसा लगता — यह ख्वाहिश ही रह गई।

अब तुम नहीं हो, फिर भी हर बात में मौजूद हो। कभी सहारा बन जाती हो, कभी भीतर तक तोड़ देती हो। शायद यह भी तुम्हारी ही कोई ट्रिक है, माँ।

बस, आज इतना ही।

जाने वाले कभी लौटकर नहीं आते, पर उनकी यादें हर मौसम में हमारे साथ रहती हैं। माँ का आशीर्वाद हमारे हर हिस्से की गूँज बनकर हमेशा हमारे साथ चलता रहता है।

एक दिन नहीं.. हर दिन, हर पल याद आती है उनकी बातें, नसीहतें। महसूस होता है उनका प्यार भरा स्पर्श।  दुआएं बनकर साथ चलती है उनकी ममता। जब कभी उदास होता है मन, इन्हें करता है नमन यह कहते हुए..

 जब भी ये दिल उदास होता है 

 ममता का साया आसपास होता है...

 
अवसर संबंधी चित्रावली
संबंधित चित्र मेरठ के नूरनगर लिसाड़ी स्थित विद्यालय राष्ट्रीय इंटर कॉलेज से संबंधित हैं जिसके प्रधानाचार्य श्री संजीव नागर हैं।



रचनाकार और सूचना स्रोत 

विजया डालमिया
संपादक, ‘मेरी निहारिका’
राष्ट्रीय संयोजिका 
उलझन सुलझन (लेडीज लेखिका इकाई)
हैदराबाद (तेलंगाना)
पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 




 



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