हमारा टीवी - सुनीता मीणा

हमारा टीवी 

भूमिका

क्या आपको वह समय याद है, जब मनोरंजन केवल एक साधन नहीं बल्कि पूरे मोहल्ले को जोड़ने वाला उत्सव हुआ करता था? जब एक छोटे से डिब्बेनुमा टेलीविजन के सामने बच्चों की चमकती आँखें, बुजुर्गों की श्रद्धा, और परिवारों की सामूहिक हँसी जीवन की सबसे बड़ी पूँजी बन जाती थी। आज, जब हर हाथ में मोबाइल और हर कमरे में अलग-अलग स्क्रीन हैं, तब मन अनायास ही उस दौर को याद करता है जहाँ सीमित साधनों के बीच असीम अपनापन बसता था। आखिर ऐसा क्या था उस समय में, जो सुविधाओं के अभाव के बावजूद दिलों को इतना समृद्ध बना देता था? आइए, स्मृतियों के उसी गलियारे में चलते हैं, जहाँ “हमारा टीवी” केवल एक यंत्र नहीं, बल्कि रिश्तों, खुशियों और सामूहिक जीवन का धड़कता केंद्र हुआ करता था।

संस्मरण

यह घटना बीस-पच्चीस वर्ष पहले की है। जब गाँव में टेलीविजन की पहुंच हर घर तक नहीं थी। केवल कुछ घरों में ही टेलीविजन होता था। हमारे घर में भी टेलीविजन आया। पूरे मोहल्ले में मानो उत्सव सा नजारा था। बच्चों की खुशी का तो कोई ठिकाना ही नहीं था मानो हमें खुशी के पंख लग गए हों। अब तो मां कोई भी काम बताती हम तुरंत बिना समय गंवाए दौड़कर उसे पूरा कर देते क्योंकि उसके बाद टेलीविजन देखना होता था। विशेष कार्यक्रमों के समय तो पूरी महफिल जमती थी। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो जाता था।

बुजुर्गों के लिए जय हनुमान, ओम नमः शिवाय, श्रीकृष्णा, गंगा मैया आदि कार्यक्रम एकत्रित होने का जरिया थे। जब बीच-बीच में विज्ञापन आते तो वे सब मिलकर अपनी सुख दुःख की बातों पर चर्चा करने में लग जाते। इस प्रकार यहाँ दोहरा मनोरंजन का कार्यक्रम चलता था।

वहीं हम उम्र के बच्चों के लिए चित्रहार, चंद्रकांता, अलिफ लैला, शक्तिमान जैसे कार्यक्रम एकजुटता के माध्यम थे। कभी-कभी बीच में बिजली कट जाती तो हम निष्कलुषित मन से दोनों हाथ जोड़कर भगवान से प्रार्थना करते कि हे भगवान जल्दी से लाइट भेज दो। बिजली का पुनः आ जाना और हमारा खुशी से उछल पड़ना दुनिया की सारी सुख, सुविधा, संपदा से ऊपर था।

आज जब पीछे मुड़कर हम देखते हैं तो ऐसा लगता है कि पुराने समय में भले ही सुविधाओं का अभाव था लेकिन प्रेम, अपनापन, निश्छलता, एकता, सहयोग आदि की भावना हर दिल में भरपूर थी। आज के सुविधायुक्त जीवन से तुलना करें तो वह कम सुविधा वाला जीवन ज्यादा अच्छा और अपनापन लिए तथा खुशियों भरा था। आधुनिकता ने तो बहुत से भावों की बलि ले ली।

रचनाकार

सुनिता मीना 

उपप्राचार्य एवं स्थानीय सम्पादिका 

उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ 

सवाई माधोपुर (राज.)

पाठ्य उन्नयन और विस्तार व प्रस्तुति 









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