प्रेम का विस्तार और हृदय की सीमाएँ
प्रेम का विस्तार और हृदय की सीमाएँ
जब आचार्य निखिल यह कहते हैं कि
“प्रेम में सब होते हैं, मगर सबमें प्रेम नहीं होता…! ठीक इसी प्रकार दिल सब में होता है, मगर दिल में सब नहीं होते।”
तो यह केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन के विविध आयामों को छूने वाली एक अनुभूति है। यह कथन उस मनःस्थिति से उपजा प्रतीत होता है, जहाँ साधक ने प्रेम के सभी स्वरूपों—मातृ प्रेम, पितृ स्नेह, मित्रता, दाम्पत्य, करुणा, भक्ति, आत्मप्रेम और समस्त सृष्टि के प्रति निष्काम भाव—को देखा, जिया और फिर उनके अंतर को महसूस किया।
उस क्षण आचार्य की चेतना एक ऐसे गुरु की रही होगी, जो केवल शब्द नहीं दे रहा, बल्कि अपने अनुभवों का सार सौंप रहा है। वे यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि प्रेम केवल संबंधों की उपस्थिति नहीं है। माँ अपने बच्चे से प्रेम करती है, पिता अपने उत्तरदायित्व में स्नेह ढूँढता है, मित्रता में अपनापन होता है, दाम्पत्य में एक-दूसरे का सहारा होता है, और भक्ति में आत्मा परमात्मा से जुड़ती है। लेकिन इन सबके बीच एक सूक्ष्म प्रश्न छिपा है—क्या यह प्रेम भीतर से उपजा है या केवल परिस्थितियों का परिणाम है?
इसीलिए वे कहते हैं—प्रेम में सब होते हैं, पर सबमें प्रेम नहीं होता। हर व्यक्ति प्रेम के किसी न किसी रूप से जुड़ा है, लेकिन हर हृदय में वह निर्मल, निष्काम और व्यापक प्रेम नहीं जागता, जो सीमाओं से परे हो। दिल सबके पास है, पर दिल में किसी को स्थान देना—यह एक साधना है, एक विस्तार है।
एक शिष्य ने एक बार गुरु से पूछा, “गुरुदेव, प्रेम का सच्चा स्वरूप क्या है?”
गुरु उसे एक उपवन में ले गए और बोले, “यहाँ जितने भी पुष्प हैं, तुम इनमें से सबसे सुंदर पुष्प लेकर आओ, लेकिन एक बार जिसे छोड़ दोगे, उसे पुनः नहीं चुन सकते।”
शिष्य उपवन में घूमता रहा। हर पुष्प उसे मनमोहक लगा—कहीं मातृ स्नेह की कोमलता थी, कहीं मित्रता की सहजता, कहीं दाम्पत्य की मधुरता, कहीं भक्ति की सुगंध। वह सोचता रहा कि शायद आगे कोई और अधिक सुंदर पुष्प मिलेगा। अंततः वह खाली हाथ लौट आया।
गुरु मुस्कुराए और बोले, “तुम प्रेम के बीच में थे, पर तुम्हारे भीतर प्रेम का निर्णय नहीं था। तुमने हर स्वरूप को देखा, पर किसी एक को अपनाया नहीं। यही कारण है कि तुम्हारे हाथ खाली हैं।”
यह दृष्टांत यह दर्शाता है कि प्रेम केवल अनुभव करने का विषय नहीं, बल्कि उसे स्वीकारने और उसमें स्थिर होने की प्रक्रिया है।
दूसरा दृष्टांत इस भाव को और गहराई देता है—
एक वृद्ध साधक नदी किनारे बैठा था। एक घायल पक्षी उसके पास आ गिरा। उसने उसे उठाया, अपने वस्त्र का एक अंश फाड़कर उसके घाव पर बाँधा और उसे सहलाया। कुछ समय बाद वह पक्षी उड़ गया।
पास खड़े एक युवक ने पूछा, “आपने उसे इतना स्नेह क्यों दिया? वह न आपका था, न आपको पहचानता था।”
वृद्ध ने शांत स्वर में कहा, “वह मेरे हृदय में था, इसलिए उसकी सेवा की। प्रेम पहचान का मोहताज नहीं होता—वह तो करुणा का स्वभाव है। जब हृदय विस्तृत होता है, तो उसमें समस्त जीवों के लिए स्थान बन जाता है।”
आचार्य निखिल की उस क्षण की मनोदशा भी कुछ ऐसी ही रही होगी—एक ऐसी स्थिति जहाँ वे देख रहे थे कि मनुष्य हर प्रकार के प्रेम से घिरा हुआ है, फिर भी भीतर एक रिक्तता अनुभव करता है। क्योंकि उसका प्रेम सीमित है—अपेक्षाओं में बंधा हुआ, शर्तों से घिरा हुआ।
उनके शब्दों में एक सूक्ष्म वेदना भी है और एक जागृति का आह्वान भी। वे हमें यह समझाना चाहते हैं कि प्रेम को केवल निभाना नहीं, उसे जीना होता है। प्रेम को केवल संबंधों में नहीं, बल्कि अपने भीतर उतारना होता है—ताकि वह मातृ स्नेह की तरह कोमल, पितृ भाव की तरह संरक्षणकारी, मित्रता की तरह सच्चा, दाम्पत्य की तरह समर्पित, भक्ति की तरह निष्काम और अंततः आत्मप्रेम की तरह शुद्ध बन सके।
जब मनुष्य इस स्तर तक पहुँचता है, तब उसका हृदय केवल एक अंग नहीं रहता—वह एक विस्तृत आकाश बन जाता है, जिसमें हर जीव, हर भावना और हर संबंध के लिए स्थान होता है। और शायद तभी आचार्य के शब्द पूर्णतः सार्थक हो जाते हैं—प्रेम में तो सब हैं, पर अब सबमें प्रेम भी जागने लगता है।
सूचना स्रोत
आचार्य निखिल जी महाराज
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति






Comments
Post a Comment