श्री लालबहार जी से विशेष बातचीत
श्री लालबहार जी से विशेष बातचीत
भूमिका
अनूठा प्रण
टीम ग्राम पाठशाला के स्तंभ सरीखे स्वयं सेवक श्री लालबहार जी का मानना है कि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है और क्रोध के कारण ही हम खुद को और दूसरों को निरंतर नुकसान पहुँचा रहे हैं। समाज में क्रोध का प्रकोप कुछ ज्यादा ही है और हम सभी को इस बात से सहमत होना चाहिए कि हमें अपने क्रोध को नियंत्रित करना होगा। मैं व्यक्तिगत रूप से क्रोध को नियंत्रित करने के लिए पिछले कुछ वर्षो से प्रयासरत हूँ और मुझे लगता है कि मुझे उसमें कुछ न कुछ सफलता मिली भी है। मैं रोजाना नित्य नियम से कुछ देर अकेले रहकर खुद से बार-बार कहता हूँ कि- मुझे क्रोध नहीं करना है। ऐसा करने से मुझे वास्तव में लाभ मिला है। अब मेरा आप सब से एक विनम्र अनुरोध है कि अगर आप भी चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। इसकी शुरुआत आज शाम 8:00 से 8:15 PM तक करते हैं।
इसमें सिर्फ आपको घर में ही अकेले बैठकर खुद से बार-बार संकलबद्ध होकर कहना है कि मुझे क्रोध नहीं करना है। आज के इस अभ्यास के बाद फिर हम सभी अपने-अपने अनुभवों पर चर्चा करेंगे कि इस अभ्यास के बाद उन्हें कैसा महसूस हुआ और उसका निष्कर्ष भी निकालने का प्रयास करेंगे। अगर हमें लाभ महसूस होता है तो फिर इसे दैनिक रूप से करेंगे और धीरे-धीरे अपने परिवार के साथ करना शुरू करेंगे।मिलते हैं आज शाम 8:00 बजे🙏।
क्रोध पर नियंत्रण
आत्मशांति की ओर एक सामूहिक पहल
प्रश्न १. लालबहार जी, सबसे पहले यह बताइए कि आपको क्रोध नियंत्रण की इस पहल को शुरू करने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर : "मैंने अपने आसपास देखा कि अधिकांश रिश्तों में दूरी, तनाव और मनमुटाव का मुख्य कारण क्रोध ही है। क्रोध एक ऐसा शत्रु है जो पहले हमारे विवेक को नष्ट करता है और फिर हमारे संबंधों को। जब मैंने स्वयं के भीतर भी कभी-कभी क्रोध की स्थिति महसूस की, तब यह समझ आया कि यदि हम समाज को बेहतर बनाना चाहते हैं तो शुरुआत स्वयं से करनी होगी। यही सोच इस पहल की प्रेरणा बनी।"
प्रश्न २. आप क्रोध को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु क्यों मानते हैं?
उत्तर : "क्योंकि क्रोध मनुष्य की सोचने-समझने की क्षमता को क्षणभर में कमजोर कर देता है। व्यक्ति उस समय सही और गलत का अंतर भूल जाता है। क्रोध में बोले गए शब्द और किए गए कार्य कई बार जीवनभर का पछतावा बन जाते हैं। यह केवल व्यक्ति को ही नहीं, परिवार और समाज को भी प्रभावित करता है।"
प्रश्न ३. आपने बताया कि आप पिछले कुछ वर्षों से स्वयं पर कार्य कर रहे हैं। आपने यह अभ्यास कैसे शुरू किया?
उत्तर : "मैंने बहुत सरल तरीका अपनाया। प्रतिदिन कुछ समय अकेले बैठकर शांत मन से स्वयं को बार-बार समझाना शुरू किया कि — 'मुझे क्रोध नहीं करना है।'
धीरे-धीरे यह वाक्य केवल शब्द नहीं रहा, बल्कि मेरे भीतर एक संकल्प बनता गया। इससे मेरे व्यवहार और सोच में सकारात्मक परिवर्तन महसूस होने लगे।"
प्रश्न ४. क्या वास्तव में केवल स्वयं से बार-बार कहना इतना प्रभावी हो सकता है?
उत्तर : "हाँ, बिल्कुल। हमारा मन वही स्वीकार करता है जिसे हम निरंतर दोहराते हैं। जैसे नकारात्मक विचार हमें कमजोर बनाते हैं, वैसे ही सकारात्मक संकल्प हमें भीतर से मजबूत करते हैं। यदि हम नियमित रूप से अपने मन को शांत रहने का संदेश देंगे, तो उसका असर अवश्य दिखाई देगा।"
प्रश्न ५. आपने शाम ८.०० से ८.१५ बजे तक सामूहिक अभ्यास का समय क्यों निर्धारित किया?
उत्तर : "क्योंकि सामूहिक प्रयास की शक्ति बहुत बड़ी होती है। जब अनेक लोग एक ही समय पर सकारात्मक संकल्प लेते हैं, तो उसका प्रभाव और भी गहरा होता है। यह केवल व्यक्तिगत अभ्यास नहीं, बल्कि मानसिक शांति की सामाजिक पहल है।"
प्रश्न ६. इस अभ्यास में लोगों को क्या करना होगा?
उत्तर : "बहुत सरल प्रक्रिया है। घर में किसी शांत स्थान पर अकेले बैठना है, कुछ देर गहरी साँस लेकर स्वयं को शांत करना है और फिर पूरे विश्वास के साथ बार-बार कहना है —मुझे क्रोध नहीं करना है।
बस इतना ही। यह अभ्यास मन को संयमित करने की दिशा में पहला कदम बनेगा।"
प्रश्न ७. क्या यह पहल केवल बड़ों के लिए है या बच्चों और परिवार के अन्य सदस्य भी इसमें शामिल हो सकते हैं?
उत्तर : "शुरुआत व्यक्ति अकेले करे ताकि वह स्वयं को समझ सके। लेकिन यदि इसका सकारात्मक प्रभाव महसूस हो, तो धीरे-धीरे पूरा परिवार इसमें शामिल हो सकता है। यदि परिवार में शांति होगी तो समाज भी शांत और स्वस्थ बनेगा।"
प्रश्न ८. आज के समय में समाज को इस प्रकार की पहल की कितनी आवश्यकता है?
उत्तर : "आज शायद पहले से कहीं अधिक आवश्यकता है। छोटी-छोटी बातों पर लोग उत्तेजित हो जाते हैं। सोशल मीडिया से लेकर पारिवारिक जीवन तक, धैर्य कम होता जा रहा है। ऐसे समय में आत्मनियंत्रण और आत्मसंवाद जैसी पहल समाज को नई दिशा दे सकती है।"
प्रश्न ९, इस अभियान से आपका अंतिम उद्देश्य क्या है?
उत्तर : "मेरा उद्देश्य केवल इतना है कि लोग स्वयं को समझें, अपने भीतर शांति पैदा करें और दूसरों के प्रति संवेदनशील बनें। यदि व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय पा ले, तो उसका जीवन, परिवार और समाज — तीनों सुंदर बन सकते हैं।"
प्रश्न १०. अंत में आप समाज को क्या संदेश देना चाहेंगे?
उत्तर : "मैं केवल इतना कहना चाहूँगा कि परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से शुरू होता है।
यदि हम प्रतिदिन कुछ मिनट स्वयं को दे सकें और अपने मन को सही दिशा में प्रशिक्षित करें, तो जीवन में बहुत बड़ा बदलाव संभव है।
आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें —हमें क्रोध नहीं करना है।"
सूचना स्रोत और आइडिया 💡
श्री लालबहार
पाठ्य उन्नयन और विस्तार
प्रस्तुति







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