मां का दर्द
' मां का दर्द '
भूमिका
मां केवल एक शब्द नहीं, बल्कि त्याग, ममता, समर्पण और निस्वार्थ प्रेम की वह जीवित अनुभूति है, जिसके बिना जीवन की कल्पना अधूरी है। वह अपने बच्चों के सुख के लिए अपने हर दुःख को मुस्कान के पीछे छिपा लेती है। उसके कांपते हाथों में आशीर्वाद होता है, थकी आँखों में उम्मीदें होती हैं और मौन में अनगिनत पीड़ाएँ छुपी होती हैं। वह स्वयं को मिटाकर अपने परिवार और संतानों के सपनों को आकार देती है, किंतु विडंबना तब जन्म लेती है जब वही मां, जिसने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, जीवन के अंतिम पड़ाव पर उपेक्षा और तिरस्कार का दर्द सहने को विवश हो जाती है।
‘मां का दर्द’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि उन अनकहे भावों की संवेदनशील अभिव्यक्ति है जिन्हें अनेक माताएँ चुपचाप जीती हैं। यह रचना पाठकों को मां के त्याग, उसकी मौन वेदना और उसके अथाह प्रेम का आत्मिक अनुभव कराती है। कविता हमें यह सोचने पर विवश करती है कि जिस मां ने अपने बच्चों के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया, क्या उसे बदले में केवल सम्मान, अपनापन और संवेदना भी नहीं मिलनी चाहिए?
सुनिता मीना जी ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में मां के अंतर्मन की उस पीड़ा को स्वर दिया है, जिसे समाज अक्सर देख नहीं पाता। यह रचना हर संवेदनशील हृदय को भीतर तक स्पर्श करने की क्षमता रखती है।
कविता
' मां का दर्द '
मां की हंसी खुशी सबको दिखे ।
पर, मां का दर्द किसी किसी को ही दिखे ।
वो आशीष देते हाथ ।
उनमें छुपी कपकपाहट।
वो मुस्कुराते होंठ ।
उनके पीछे दबी रुलाई ।
वो उम्मीद से चमकती आंखें ।
उन में बसी चिंता और बेचैनी ।
वो उसका व्यस्त रहना हमेशा ।
कितने अरमान उसमें छुपे।
अपना सौ कुर्बा कर दिया ।
और चाहा एक भी नहीं ।
जो चाहा वह उसका नहीं ।
वह भी उसकी संतति से जुड़ा ।
उसका जीवन, उसकी खुशी
उसकी सफलता, उसकी समृद्धि ।उसका कुछ नहीं,
बस संतति का ही सब कुछ ।
तो, उसका ही सब कुछ ।
ऐसा वह मानती, सोचती ।
और अपना जीवन जीती ।
दुर्भाग्यवश एक दिन वह अपना सब कुछ खो देती ।
जब वही संतान उसे बोझ समझ बैठती ।
दुत्कारती,जली कटी सुनाती।
अपना सब कुछ देकर
वह कुछ के लिए तरसती ।
और, इस तरह वह अपना सब कुछ खो देती।
यही उसके लिए जीवन की असहनीय तकलीफ बनती।
रचनाकार
सुनिता मीना
उपप्राचार्य
सवाई माधोपुर (राज.)
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