विश्व संगीत दिवस (21 जून)
विश्व संगीत दिवस (21 जून)
केवल गिटार की धुनों पर थिरकने या पसंदीदा गानों की प्लेलिस्ट बनाने का दिन नहीं है। यदि इसका सूक्ष्म और दार्शनिक विश्लेषण किया जाए, तो संगीत मनुष्य के अस्तित्व, ब्रह्मांड की संरचना और चेतना (कोंशियसनेस) का सबसे गहरा विज्ञान है।
आइए, इस अवसर पर संगीत के उस स्वरूप को समझें जो कानों से परे, सीधे आत्मा और ब्रह्मांड से जुड़ता है।
भारतीय दर्शन में संगीत को 'नाद ब्रह्म' (ध्वनि ही ईश्वर है) कहा गया है। आधुनिक भौतिकी ( मोडर्न फिजिक्स) भी अब इसी ओर इशारा कर रही है। स्ट्रिंग थ्योरी कहती है कि उप-परमाणु स्तर( सब एटोमिक लेवल) पर ब्रह्मांड के सभी कण छोटी-छोटी कंपन करती हुई तारों (वाइब्रेंटिंग स्ट्रिंग्स) की तरह हैं। यानी, यह संपूर्ण ब्रह्मांड और कुछ नहीं, बल्कि एक महान संगीतकार की अनवरत बज रही सिम्फनी है। हम सब उस संगीत की एक-एक लहर हैं।
मनोविज्ञान और न्यूरोसाइंस के अनुसार, जब हम कोई भाषा बोलते हैं, तो मस्तिष्क का एक विशिष्ट हिस्सा सक्रिय होता है। लेकिन जब हम संगीत सुनते या गाते हैं, तो मस्तिष्क का कोई एक हिस्सा नहीं, बल्कि पूरा का पूरा भेजा दिमाग़ ( होल ब्रेन) दीपोत्सव की तरह जगमगा उठता है। 'डोपामाइन' (ख़ुशी का हार्मोन) का स्राव होता है, जो अवसाद को क्षण भर में कम कर सकता है।
एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग और याददाश्त को संजोने वाला 'हिप्पोकैम्पस' संगीत से सीधे प्रभावित होता है। यही कारण है कि डिमेंशिया या अल्जा़इमर के मरीज़ अपना नाम भूल सकते हैं, लेकिन अपने ज़माने का पसंदीदा गीत नहीं भूलते।
संसार की हर भाषा (हिंदी, अंग्रेज़ी, फ्रेंच) की एक सीमा है। शब्द अर्थ तय करते हैं और अर्थ कई बार विवाद पैदा करते हैं। लेकिन संगीत शब्दों का मोहताज़ नहीं है।
एक करुण राग (जैसे राग शिवरंजनी या दरबारी) को सुनकर दुनिया के किसी भी कोने का इंसान, चाहे वह उसकी भाषा न समझता हो, रो पड़ेगा। संगीत शब्दों को अर्थ नहीं, बल्कि सीधे 'भाव' देता है। यह वहाँ से शुरू होता है जहाँ शब्द अपने हाथ खड़े कर देते हैं।
इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज बंटा है, संगीत ने घावों को भरने का काम किया है। सूफ़ी संगीत, अफ़्रीकी लोकगीत या कबीर के पद, इन सबने सीमाओं और मज़हबों को तोड़ा है। संगीत मनुष्य के भीतर के 'अहम्' (इगो) को विसर्जित करके उसे 'सामूहिक चेतना' (कलैक्टिव कोंसियसनेस) से जोड़ता है। कॉन्सर्ट में हज़ारों अजनबी जब एक साथ एक लय में झूमते हैं, तो वहाँ कोई 'पराया' नहीं बचता।
इस विश्व संगीत दिवस पर हमें यह सोचना होगा कि क्या हम केवल बाहरी कोलाहल ( नोइस) को संगीत मान बैठे हैं? सच्चा संगीत वह है जो बाहर के शोर को शांत कर आपके भीतर एक 'मौन' पैदा कर दे।
यदि कोई धुन आपको अपने ही भीतर झांकने पर मज़बूर कर दे, आपको अधिक संवेदनशील और करुणामय बना दे, तो समझिएगा कि आपने संगीत के वास्तविक अमृत को चख लिया है। आइए, हम अपने भीतर के संगीत को जीवंत रखें, क्योंकि जहाँ संगीत समाप्त होता है, वहाँ नीरसता शुरू होती है।
सृजक
डॉ. दक्षा जोशी 'निर्झरा'
स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ
अहमदाबाद, गुजरात।
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति







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