तुम्हारे द्वार आकर के बहुत आनन्द पाते हैं
तुम्हारे द्वार आकर के बहुत आनन्द पाते हैं
— प्रमिला त्रिवेदी
भूमिका
मनुष्य का जीवन अनेक उतार-चढ़ावों, संघर्षों, मोह-माया और मानसिक उलझनों से भरा होता है। ऐसे समय में ईश्वर का स्मरण, भक्ति और उनके चरणों में आत्मसमर्पण व्यक्ति को आंतरिक शांति प्रदान करता है। जब संसार की चकाचौंध और संबंधों का भार मन को थका देता है, तब ईश्वर के द्वार पर पहुंचकर आत्मा को जो सुकून मिलता है, वह किसी अन्य स्थान पर दुर्लभ है।
प्रमिला त्रिवेदी की यह भावपूर्ण रचना एक भक्त के हृदय की सच्ची पुकार है, जिसमें वह अपने आराध्य श्रीकृष्ण—मधुसूदन, गिरधर, मदन मोहन—से आत्मिक जुड़ाव व्यक्त करती हैं। कविता में भक्ति, समर्पण, प्रेम, मानसिक शांति और आध्यात्मिक आनंद का अत्यंत सहज एवं मार्मिक चित्रण हुआ है।
कविता
हे मधुसूदन.......
सुन लो बिनती हमारी,
तुम्हारे द्वार आकर के
बहुत आनन्द पाते हैं,
जगत तो माया का घर है,
यहां मकरंद पाते हैं।
निराशा बस मेरे मन को,
सहारा जब नहीं मिलता,
चन्द्रिका चन्द्र दर्शन से,
आप यू मुस्कुराते हैं।
रहो दिल में मेरे हरदम,
सलोने साँवरे गिरधर,
भुला देते हैं हर ग़म को,
यशोदा नंद दर्शन से।
तुम्हारे द्वार आकर के,
बहुत आनन्द पाते हैं।
बड़ा झंझट जमाने का,
वजह कुछ भी नहीं सच में
यहाँ आते ही खुद को हम,
बड़ा स्वछंद पाते हैं।
ना जाने क्या तेरा जादू
यहाँ आते ही पल भर में
नयन से ज्यों मिलें नैना,
बड़ा ही चैन पाते हैं।
मनोहारी छटा तेरी,
शरण दोगे मदन मोहन,
तेरे इस रूप पर सदके,
यही बिनती हमारी है,
तुम्हारे द्वार आकर के
बहुत आनन्द पाते हैं।
प्रमिला त्रिवेदी
व्याख्या
यह कविता एक भक्त की अपने आराध्य भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गहरी श्रद्धा, प्रेम और आत्मसमर्पण की अभिव्यक्ति है। कवयित्री कहती हैं कि संसार तो केवल मोह-माया का स्थान है, जहां व्यक्ति भटकता रहता है, लेकिन प्रभु के द्वार पर पहुंचते ही उसे जीवन का वास्तविक आनंद और अमृततुल्य शांति प्राप्त होती है।
कविता में यह भाव अत्यंत सुंदरता से व्यक्त हुआ है कि जब मन निराश होता है और कहीं सहारा नहीं मिलता, तब भगवान का स्मरण और उनका दर्शन मन में नई आशा और मुस्कान भर देता है। “चन्द्रिका चन्द्र दर्शन” के माध्यम से कवयित्री ने यह संकेत दिया है कि जैसे चंद्रमा की शीतल रोशनी अंधकार को कम करती है, वैसे ही प्रभु का सान्निध्य मन की पीड़ा को शांत करता है।
आगे कवयित्री भगवान कृष्ण को “सलोने साँवरे गिरधर” कहकर अपने हृदय में सदैव विराजमान रहने की प्रार्थना करती हैं। उनका विश्वास है कि प्रभु के दर्शन मात्र से सारे दुख और चिंताएं दूर हो जाती हैं। संसार की उलझनों और झंझटों से घिरा मन प्रभु की शरण में पहुंचकर स्वतंत्र और हल्का अनुभव करता है।
कविता के अंतिम भाग में कवयित्री भगवान के मनोहारी स्वरूप का वर्णन करते हुए उनसे अपनी शरण स्वीकार करने की विनती करती हैं। यह केवल पूजा या स्तुति नहीं, बल्कि आत्मा का अपने परम प्रिय से मिलन और आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति है।
शिक्षा
यह कविता हमें यह शिक्षा देती है कि जीवन में चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ, निराशाएँ और मानसिक उलझनें क्यों न आएँ, ईश्वर के प्रति विश्वास, भक्ति और समर्पण मन को स्थिरता तथा शांति प्रदान करते हैं। संसार की क्षणभंगुर माया से ऊपर उठकर यदि व्यक्ति आध्यात्मिकता और सकारात्मक विश्वास को अपनाए, तो वह अपने जीवन में सच्चा आनंद और आत्मिक संतोष प्राप्त कर सकता है।
रचनाकार








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