बाल श्रमिक : बचपन की छिनी मुस्कान और समाज की जिम्मेदारी

बाल श्रमिक 

बचपन की छिनी मुस्कान और समाज की जिम्मेदारी

भूमिका

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों की मुस्कुराहट, शिक्षा और संस्कारों में सुरक्षित होता है। बच्चे केवल परिवार की आशा नहीं, बल्कि देश की अमूल्य धरोहर होते हैं। जिस उम्र में उनके हाथों में पुस्तकें, सपने और खेल होने चाहिए, यदि उसी उम्र में वे श्रम, संघर्ष और शोषण का बोझ उठाने लगें, तो यह केवल एक सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि राष्ट्र के भविष्य पर प्रश्नचिह्न बन जाती है। बाल श्रम एक ऐसी कड़वी सच्चाई है, जो आधुनिक विकास और संवेदनशील समाज के दावों के बीच आज भी हमारे सामने खड़ी है। प्रस्तुत आलेख इसी गंभीर विषय की पीड़ा, विडम्बना और समाधान की दिशा में चिंतन प्रस्तुत करता है।

आलेख

हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के,

इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के..


कभी ये पंक्तियां हमारी रग-रग में दौड़ा करती थीं। फिर देश आजाद हुआ और अंग्रेज चले गये। पीछे छोड़ गये *अपनी कुछ अच्छी-बुरी आदतें और कुछ अंग्रेजियत!*


उन्हीं में से एक थी *बाल-श्रमिक।*

अपनी सुविधा के लिए अंग्रेजों ने हमारे बच्चों को भी नहीं छोड़ा और उनसे भी गुलामी कराया करते थे! *स्वतंत्र होने के बाद हमने भी ये बीमारी अपनाए रखी और हम अपने देश से बाल श्रम नहीं हटा पाए!! हाय! कैसी विडम्बना है ये!*


आज तमाम सरकारी कानूनों के बाद भी ये काम यत्र-तत्र-सर्वत्र चालू है! *पत्थर खदानें, माचिस फैक्ट्रियों, कुछ हस्तशिल्प कारखानों आदि में तो बहुत बुरा हाल है!* बच्चे अपनी मासूमियत और लड़कपन भूल कर कब धीरे-धीरे अपराधों की दुनिया में कदम रख लेते हैं, पता ही नहीं चलता!!

हर परिस्थिति में हमें बाल श्रमिकों को तथाकथित ठेकेदारों और सप्लायरों के चुंगल से छुड़ा कर उन्हें मुख्यधारा से जोड़ते हुए उनके मूलभूत अधिकार व सुविधाएं मुहैया करानी ही होगी।

*इन नौनिहालों को इनका बचपन, इनका पढ़ाई का अधिकार, इनके खेलकूद की आवश्यकताओं का ध्यान रखते हुए इन्हें एक मुक्त आकाश विचरण हेतु उपलब्ध कराना होगा। तभी हम देश से बाल श्रम की बुराई को मिटा सकते हैं।*

सुषमा अग्रवाल

नागपुर (महाराष्ट्र) 

लेख सृजन का मंतव्य

इस लेख के सृजन का मूल उद्देश्य समाज को *बाल श्रम जैसी अमानवीय समस्या के प्रति संवेदनशील बनाना* है। यह आलेख केवल समस्या का उल्लेख नहीं करता, बल्कि एक नैतिक प्रश्न भी उठाता है कि क्या हम अपने बच्चों को उनका अधिकारपूर्ण बचपन दे पा रहे हैं? लेख का मंतव्य यह संदेश देना है कि बाल श्रम का उन्मूलन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक, अभिभावक और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। जब तक हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा, खेल और स्वतंत्र विकास का अवसर प्राप्त नहीं करेगा, तब तक एक सशक्त और संवेदनशील राष्ट्र की परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। 

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी भाषा

सेवानिवृत्ति के बाद ऐसे जिएं - श्री संगीत शर्मा

रात भर एक करवट है माँ - विजया डालमिया (मदर्स डे पर विशेष)