अबोध से बोध तक
अबोध से बोध तक
कलम कुछ कहती है जब वह मासूम हाथों में होती है,
तब तो कहना ही क्या,
जब पकड़ का अंदाज़-ए-बयाँ भविष्य ही दर्शा दे।
नन्हे हाथों में थमी कलम केवल रेखाएँ नहीं खींचती, वह संभावनाओं के पहले हस्ताक्षर रचती है। कभी कागज़ पर बेतरतीब लगने वाली लकीरें, कभी अपने ही पैरों पर उत्सुकता से चलती कलम, तो कभी मासूम आँखों में कुछ नया जान लेने की चमक—ये सब केवल बचपन की शरारतें नहीं, बल्कि सीखने की पहली आहटें होती हैं।
अबोध मन को नहीं पता कि वह क्या लिख रहा है, पर प्रकृति जानती है कि वह भीतर कौन-सा संसार गढ़ रहा है। नन्हीं उँगलियों की पकड़ में छिपा आत्मविश्वास, चेहरे की गंभीरता में झलकती जिज्ञासा, और अपने छोटे-से संसार को समझने की लालसा—यही तो भविष्य की नींव है।
कभी वही मासूम हाथ चित्र बनाते हैं, कभी शब्दों से मित्रता करते हैं, और कभी अपनी कल्पनाओं के रंगों से दुनिया को नया अर्थ देते हैं। उस क्षण में देखने वाले को भले केवल खेल दिखाई दे, किन्तु समय वहीं किसी व्यक्तित्व की पहली रूपरेखा रच रहा होता है।
बचपन की यही अनगढ़ रेखाएँ आगे चलकर ज्ञान, सृजन और व्यक्तित्व के सशक्त हस्ताक्षर बनती हैं। सच तो यह है कि हर महान शुरुआत पहले एक मासूम जिज्ञासा से ही जन्म लेती है। इसलिए जब किसी अबोध हाथ में कलम दिखे, तो उसे केवल खेल मत समझिए—संभव है, भविष्य स्वयं अपनी कहानी लिखने बैठा हो। ✍️🌼
सृजक










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