डॉ. रश्मि शर्मा से विशेष संवाद
डॉ. रश्मि शर्मा से विशेष संवाद
विज्ञान, साहित्य, शोध और समाजसेवा का बहुआयामी व्यक्तित्व
भूमिका
डॉ. रश्मि शर्मा का व्यक्तित्व विज्ञान और साहित्य के अद्भुत समन्वय का उदाहरण है। प्राणिशास्त्र की प्रोफेसर के रूप में उन्होंने न केवल शिक्षण और शोध के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है, बल्कि साहित्य सृजन के माध्यम से समाज को विचार और संवेदना की नई दिशा भी प्रदान की है। उनके मार्गदर्शन में अनेक शोधार्थियों ने उच्च शिक्षा की उपलब्धियाँ अर्जित की हैं। पचास से अधिक पुस्तकों और अनेक शोध पत्रों की लेखिका डॉ. शर्मा विज्ञान, अध्यात्म, ज्योतिष, खगोल विज्ञान, वास्तु और समाजसेवा जैसे विविध क्षेत्रों में समान रूप से सक्रिय हैं।
प्रस्तुत है उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के विभिन्न आयामों को स्पर्श करता एक विस्तृत साक्षात्कार—
बातचीत
प्रश्न १. सर्वप्रथम अपने बचपन और पारिवारिक परिवेश के बारे में बताइए।
उत्तर : "मेरा बचपन अत्यंत धार्मिक और संस्कारमय वातावरण में बीता। मैं उत्तर प्रदेश के खुर्जा (जनपद बुलंदशहर) के कौशिक गौड़ ब्राह्मण परिवार से संबंध रखती हूँ। मेरे माता-पिता ने हमें सदैव नैतिक मूल्यों, शिक्षा और अनुशासन का महत्व सिखाया। घर में अध्ययन और ज्ञानार्जन का ऐसा वातावरण था जिसने बचपन से ही हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
हम तीन बहनें और एक भाई हैं। परिवार के प्रत्येक सदस्य ने अपने-अपने क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। मेरी सबसे बड़ी बहन दिल्ली में चीफ मेडिकल ऑफिसर के पद पर कार्यरत हैं। मैं दूसरे स्थान पर हूँ। मेरी सबसे छोटी बहन जयपुर में प्रशासनिक अधिकारी हैं, जबकि मेरे भाई अमेरिका में सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्य कर रहे हैं।
मेरी माता जी सरकारी विद्यालय में प्रधानाचार्य थीं। उन्हें विद्यार्थियों और शिक्षा के प्रति समर्पित देखकर मेरे मन में भी शिक्षण और ज्ञान के प्रति गहरा सम्मान विकसित हुआ। परिवार से मिले संस्कारों, धार्मिक वातावरण और शिक्षा के प्रति समर्पण ने ही मेरे व्यक्तित्व के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।"
प्रश्न २. प्राणिशास्त्र विषय को अपने अध्ययन और करियर के लिए चुनने की प्रेरणा कहाँ से मिली?
उत्तर : "प्रकृति और जीव-जगत के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा बचपन से ही थी। यही जिज्ञासा आगे चलकर प्राणिशास्त्र के प्रति गहरे लगाव का कारण बनी।"
प्रश्न ३. एक शिक्षक के रूप में आपकी यात्रा कैसी रही?
उत्तर : "शिक्षण मेरे लिए केवल नौकरी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम है। विद्यार्थियों के साथ ज्ञान साझा करना और उनके व्यक्तित्व विकास में योगदान देना अत्यंत संतोष देता है।"
प्रश्न ४. आपके निर्देशन में अनेक विद्यार्थियों ने एम.फिल. और पीएच.डी. पूर्ण की है। शोध निर्देशन का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : "हर शोधार्थी एक नई चुनौती और नया अवसर लेकर आता है। उनका मार्गदर्शन करते हुए स्वयं भी बहुत कुछ सीखने को मिलता है।"
प्रश्न ५. एक सफल शोधार्थी में आप कौन-कौन से गुण आवश्यक मानती हैं?
उत्तर : "जिज्ञासा, धैर्य, अनुशासन, निरंतर अध्ययन और सत्य की खोज के प्रति समर्पण एक सफल शोधार्थी की पहचान हैं।"
प्रश्न ६. आज के शोध कार्यों में आपको कौन-सी चुनौतियाँ दिखाई देती हैं?
उत्तर : "मौलिकता का अभाव, समय की कमी और शोध को केवल डिग्री प्राप्ति का माध्यम समझना प्रमुख चुनौतियाँ हैं।"
प्रश्न ७. आपके पच्चीस शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं। शोध लेखन की प्रक्रिया कितनी चुनौतीपूर्ण होती है?
उत्तर : "शोध लेखन में गहन अध्ययन, तथ्यात्मकता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है। यह एक सतत साधना है।"
प्रश्न ८. सौ से अधिक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में सहभागिता का आपका अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : "इन सम्मेलनों ने मुझे वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण समझने और नए शोध कार्यों से परिचित होने का अवसर दिया।"
प्रश्न ९. विज्ञान के साथ-साथ साहित्य की ओर आपका झुकाव कैसे हुआ?
उत्तर : "विज्ञान बुद्धि को विकसित करता है और साहित्य संवेदनाओं को। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। यही कारण है कि साहित्य मेरी अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया।"
प्रश्न १०. पचास से अधिक पुस्तकों का लेखन एक बड़ी उपलब्धि है। इस सृजन यात्रा के बारे में बताइए।
उत्तर : "लेखन मेरे लिए आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है। प्रत्येक पुस्तक मेरे अनुभवों, अध्ययन और चिंतन का परिणाम है।"
प्रश्न ११. आपकी लेखन प्रक्रिया कैसी होती है?
उत्तर : "मैं पहले विषय का गहन अध्ययन करती हूँ, फिर उसे अपने अनुभवों और विचारों के साथ संयोजित कर लेखन करती हूँ।"
प्रश्न १२. विज्ञान और साहित्य के बीच आप क्या संबंध देखती हैं?
उत्तर : "विज्ञान सत्य की खोज करता है और साहित्य उस सत्य को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ता है।"
प्रश्न १३. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में आपको किन सुधारों की आवश्यकता महसूस होती है?
उत्तर : "शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, शोधपरक और मूल्याधारित बनाया जाना चाहिए।"
प्रश्न १४. नई शिक्षा नीति को आप किस दृष्टि से देखती हैं?
उत्तर : "यह बहुविषयक शिक्षा को प्रोत्साहित करती है, जो विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए आवश्यक है।"
प्रश्न १५. आज के युवाओं में शोध और अध्ययन के प्रति रुचि बढ़ाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
उत्तर : "उन्हें जिज्ञासु बनने, प्रश्न पूछने और प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।"
प्रश्न १६. एक महिला शिक्षाविद और लेखिका के रूप में आपकी यात्रा में कौन-कौन सी चुनौतियाँ आईं?
उत्तर : "सौभाग्य से मुझे ऐसा पारिवारिक वातावरण मिला जहाँ बेटियों की शिक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी गई। मेरी माता जी स्वयं सरकारी विद्यालय की प्रधानाचार्य थीं, इसलिए शिक्षा और आत्मनिर्भरता का महत्व हमें बचपन से ही समझाया गया। परिवार की प्रेरणा ने मुझे अपने लक्ष्य निर्धारित करने और उन्हें प्राप्त करने का आत्मविश्वास दिया।
निश्चित रूप से जीवन में समय-समय पर अनेक चुनौतियाँ आईं, लेकिन परिवार से मिले संस्कार, आत्मविश्वास और निरंतर परिश्रम ने मुझे आगे बढ़ने की शक्ति प्रदान की। मेरा मानना है कि यदि परिवार का सहयोग और स्वयं के प्रति विश्वास बना रहे तो कोई भी चुनौती असंभव नहीं होती।"
प्रश्न १७. समाज में महिलाओं की भूमिका को आप किस प्रकार देखती हैं?
उत्तर : "मैं स्वयं ऐसे परिवार से आती हूँ जहाँ बेटियों को समान अवसर और उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित किया गया। आज मेरी एक बहन चिकित्सा क्षेत्र में उच्च पद पर हैं, दूसरी प्रशासनिक सेवा में कार्यरत हैं और मैंने शिक्षा तथा शोध के क्षेत्र को अपना कार्यक्षेत्र बनाया है। यह इस बात का प्रमाण है कि जब महिलाओं को अवसर और प्रोत्साहन मिलता है तो वे समाज के प्रत्येक क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान दे सकती हैं।
मेरे विचार से महिला केवल परिवार की आधारशिला ही नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र निर्माण की भी महत्वपूर्ण शक्ति है। इसलिए महिलाओं की शिक्षा, आत्मनिर्भरता और नेतृत्व क्षमता को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है।"
प्रश्न १८. आप अनेक सामाजिक संस्थाओं से जुड़ी हुई हैं। समाजसेवा के प्रति यह भाव कैसे विकसित हुआ?
उत्तर : "समाज से हमें बहुत कुछ मिलता है। समाज को कुछ लौटाना हमारा नैतिक दायित्व है।"
प्रश्न १९. महावीर इंटरनेशनल, रोटरी और अन्य सामाजिक संगठनों के साथ कार्य करने का अनुभव कैसा रहा?
उत्तर : "इन संस्थाओं के माध्यम से सेवा कार्यों में सक्रिय भागीदारी का अवसर मिला और समाज की वास्तविक आवश्यकताओं को समझने का अवसर भी।"
प्रश्न २०. आपके अनुसार आज समाज की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
उत्तर :"मानवीय मूल्यों का क्षरण और बढ़ती संवेदनहीनता सबसे बड़ी चुनौतियाँ हैं।"
प्रश्न २१. आपकी रुचि ज्योतिष, खगोल विज्ञान, वास्तु और अंक ज्योतिष में भी है। इन विषयों की ओर आपका आकर्षण कैसे हुआ?
उत्तर : "ब्रह्मांड और प्रकृति के रहस्यों को समझने की जिज्ञासा ने मुझे इन विषयों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।"
प्रश्न २२. क्या विज्ञान और ज्योतिष को साथ-साथ समझा जा सकता है?
उत्तर : "दोनों के अध्ययन की पद्धतियाँ भिन्न हैं, किंतु दोनों ही मानव जीवन और प्रकृति के रहस्यों को समझने का प्रयास करते हैं।"
प्रश्न २३. खगोल विज्ञान के कौन से पहलू आपको सबसे अधिक आकर्षित करते हैं?
उत्तर :"ब्रह्मांड की विशालता, ग्रह-नक्षत्रों की गति और सृष्टि की संरचना मुझे अत्यंत आकर्षित करती है।"
प्रश्न २४. साहित्य, विज्ञान और अध्यात्म के बीच आप क्या संबंध देखती हैं?
उत्तर : "तीनों का अंतिम उद्देश्य सत्य और आत्मबोध की खोज है।"
प्रश्न २५. आपकी दृष्टि में सफलता की वास्तविक परिभाषा क्या है?
उत्तर : "सफलता केवल उपलब्धियों का नाम नहीं, बल्कि आत्मसंतोष और समाज के लिए उपयोगी बनने की क्षमता का नाम है।"
प्रश्न २६. युवा पीढ़ी को आप क्या संदेश देना चाहेंगी?
उत्तर : "सपने देखिए, परिश्रम कीजिए, निरंतर सीखते रहिए और अपने ज्ञान का उपयोग समाज के कल्याण के लिए कीजिए।"
प्रश्न २७. आपकी भावी योजनाएँ क्या हैं?
उत्तर : "शोध, लेखन और समाजसेवा के क्षेत्र में और अधिक सार्थक योगदान देना मेरी प्राथमिकता है।"
प्रश्न २८. यदि आपको अपने जीवन-दर्शन को एक वाक्य में व्यक्त करना हो तो वह क्या होगा?
उत्तर : "ज्ञान अर्जित करो, संवेदनाओं को जीवित रखो और मानवता की सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाओ।"
समापन
डॉ. रश्मि शर्मा का जीवन इस सत्य का प्रमाण है कि ज्ञान, शोध, साहित्य और सेवा जब एक साथ चलते हैं, तब व्यक्तित्व केवल सफल नहीं बल्कि प्रेरणास्रोत बन जाता है। उनका बहुआयामी योगदान शिक्षा-जगत, साहित्य-जगत और समाज के लिए एक मूल्यवान धरोहर है। यह संवाद न केवल उनके कार्यों का परिचय कराता है, बल्कि नई पीढ़ी को ज्ञान, शोध, सृजन और सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा भी देता है।
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