भक्ति, शक्ति और साहस के प्रतीक : संकटमोचन हनुमान
भक्ति, शक्ति और साहस के प्रतीक संकटमोचन हनुमान
भूमिका
भारतीय काव्य परंपरा में छंद केवल शब्दों की सुंदर रचना नहीं होते, बल्कि वे भाव, श्रद्धा और संस्कृति के वाहक भी होते हैं। मनहरण घनाक्षरी छंद में रचित यह काव्यांश रामायण के उस अत्यंत मार्मिक प्रसंग को जीवंत करता है, जब युद्धभूमि में मेघनाद के शक्तिबाण से लक्ष्मण मूर्छित हो जाते हैं। उस कठिन घड़ी में भगवान राम की व्याकुलता, विभीषण से उपाय पूछना तथा हनुमान जी का अतुलनीय पराक्रम और समर्पण—इन सबका अत्यंत प्रभावशाली चित्रण इस रचना में हुआ है।
यह छंद केवल एक पौराणिक प्रसंग का वर्णन मात्र नहीं करता, बल्कि यह संदेश भी देता है कि संकट की घड़ी में साहस, निष्ठा और समर्पण ही जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं। हनुमान जी यहाँ केवल एक पात्र नहीं, बल्कि सेवा, शक्ति, भक्ति और कर्तव्यपरायणता के सर्वोच्च आदर्श के रूप में उभरते हैं।
काव्य रचना
मनहरण घनाक्षरी छंद
शक्ति लगी अनुज को,
राम बोले "सुनो वीर,
वायु-पुत्र, बलवान!
बचाओ लक्ष्मण को।"
व्याकुल हो प्रभु तब,
करने लगे विलाप,
पता वैद्यराज जी का,
पूछो तो विभीषण से।
देर कहीं हो ना जाए,
सूर्य अस्त हो ना जाए,
द्रोणागिरी पर्वत से,
लाओ संजीवन को।
भक्ति, शक्ति औ साहस का,
सबको दिया प्रमाण,
तभी कहे संकटमोचन,
जग हनुमान को।
रचनाकार
राखी पलोड
व्याख्या
इस मनहरण घनाक्षरी छंद में कवयित्री ने रामायण के अत्यंत संवेदनशील और प्रेरणादायक प्रसंग को संक्षिप्त किन्तु प्रभावपूर्ण ढंग से प्रस्तुत किया है।
प्रथम पद की व्याख्या
“शक्ति लगी अनुज को, राम बोले सुनो वीर…”
यहाँ वर्णन है कि युद्धभूमि में लक्ष्मण को शक्तिबाण लगने से वे मूर्छित हो जाते हैं। भगवान राम अत्यंत चिंतित होकर वीर हनुमान से अपने अनुज को बचाने का आग्रह करते हैं। वे हनुमान जी की शक्ति और सामर्थ्य पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें वायु-पुत्र और बलवान कहकर संबोधित करते हैं।
यह पद हमें सिखाता है कि संकट के समय योग्य और समर्पित व्यक्ति पर विश्वास करना आवश्यक होता है।
द्वितीय पद की व्याख्या
“व्याकुल हो गए प्रभु, करने लगे विलाप…”
इस पद में भगवान राम के मानवीय स्वरूप का भावपूर्ण चित्रण है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने प्रिय भाई लक्ष्मण की स्थिति देखकर अत्यंत व्याकुल हो जाते हैं। वे विभीषण से वैद्यराज *सुषेण* का पता पूछते हैं ताकि उचित उपचार किया जा सके।
यह प्रसंग दर्शाता है कि महानतम व्यक्तित्व भी अपने प्रियजनों के दुःख में संवेदनशील हो जाते हैं। करुणा और प्रेम मनुष्यत्व की सबसे बड़ी पहचान हैं।
तृतीय पद की व्याख्या
“देर कहीं हो ना जाए, सूर्य अस्त हो ना जाए…”
यहाँ समय की गंभीरता को दर्शाया गया है। वैद्यराज बताते हैं कि सूर्योदय अथवा सूर्यास्त से पहले द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लाना आवश्यक है। हनुमान जी बिना समय गंवाए उस कठिन कार्य के लिए निकल पड़ते हैं।
यह पद हमें प्रेरित करता है कि संकट के समय शीघ्र निर्णय, तत्परता और कर्मठता ही सफलता का मार्ग प्रशस्त करती है।
चतुर्थ पद की व्याख्या
“भक्ति शक्ति साहस का, सब को प्रमाण दिया…”
अंतिम पद में कवयित्री हनुमान जी की महिमा का वर्णन करती हैं। उन्होंने अपनी भक्ति, अपार शक्ति और अद्वितीय साहस का प्रमाण देते हुए संजीवनी लाकर लक्ष्मण के प्राण बचाए। इसी कारण संसार उन्हें *संकटमोचन* के रूप में पूजता है।
यह पद जीवन का गहरा संदेश देता है कि निस्वार्थ सेवा, समर्पण और साहस किसी भी असंभव प्रतीत होने वाले कार्य को संभव बना सकते हैं।
संदेश
उपरोक्त मनहरण घनाक्षरी छंद हमें सिखाता है कि—
* संकट में धैर्य और त्वरित निर्णय आवश्यक हैं।
* सच्ची भक्ति केवल पूजा नहीं, बल्कि सेवा और कर्तव्य में निहित होती है।
* साहस और समर्पण से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।
* हनुमान जी का चरित्र हमें निष्ठा, परिश्रम और आत्मबल का आदर्श प्रदान करता है।
यह रचना श्रद्धा और प्रेरणा का सुंदर संगम प्रस्तुत करती है, जो पाठक के मन में विश्वास, साहस और कर्तव्यनिष्ठा का संचार करती है।
सृजक
राखी पलोड
जहीराबाद
पाठ्य विस्तार और प्रस्तुति








Comments
Post a Comment