नहीं चाह
नहीं चाह
भूमिका
त्याग में ही सच्ची प्राप्ति
मनुष्य का जीवन प्रायः इच्छाओं, उपलब्धियों, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों की दौड़ में व्यतीत होता है। वह ऊँचे पद, सम्मान, वैभव और प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा में स्वयं को निरंतर व्यस्त रखता है। किंतु कुछ संवेदनशील आत्माएँ ऐसी भी होती हैं जो इस बाहरी चमक-दमक से परे जीवन के वास्तविक सौंदर्य को खोजती हैं। वे समझती हैं कि प्रकृति की निस्वार्थता, सरलता और मौन ही वह सत्य है जो मन को स्थायी शांति प्रदान करता है।
प्रस्तुत काव्य रचना "नहीं चाह" ऐसी ही एक आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति है। यह कविता संसार की क्षणभंगुर महत्वाकांक्षाओं का त्याग कर प्रकृति के साथ एकाकार होने की कामना व्यक्त करती है। इसमें लेखिका ने यह संदेश दिया है कि सच्चा सुख किसी पद, प्रतिष्ठा या अधिकार में नहीं, बल्कि उस सहजता और समर्पण में है जहाँ मनुष्य स्वयं को प्रकृति के विशाल परिवार का एक विनम्र अंश मान लेता है।
काव्य रचना
"नहीं चाह"
नहीं चाह मनु कुल में जन्म लूँ।
नहीं चाह किसी संभ्रांत कुल से नाता जोड़ूँ।
नहीं चाह किसी उच्च ओहदे पर पहुँचूँ।
नहीं चाह दुनिया में अपना परचम लहराऊँ।
नहीं चाह कई उपलब्धियाँ अर्जित करूँ।
नहीं चाह सभ्य समाज का हिस्सा बनूँ।
नहीं चाह किसी रुतबे के साथ जन्म लूँ।
नहीं चाह किसी भौतिकता का दामन थामूँ।
नहीं चाह किसी देश, सरहद का हिस्सा बनूँ।
नहीं चाह कोई मोक्ष मुक्ति पाऊँ।
चाह है बस किसी जंगल का पेड़ बनूँ।
चाह है बस किसी पहाड़ का झरना बनूँ।
चाह बस अनदेखा, अनचाहा पुष्प बनूँ।
चाह है बस उस शांत घास के मैदान का हिस्सा बनूँ।
चाह है बस लहरों की थपेड़ों में सोया पत्थर बनूँ।
चाह है बस किसी चिड़िया का घोंसला बनूँ।
चाह है बस काले मेघ पर गुजरने वाली हवा का झोंका बनूँ।
चाह है बस उस चमकती चोटी पर बर्फ की चादर बनूँ।
चाह है बस उस बहती नदी की छोटी सीप बनूँ।
चाह है बस कैलाश मानस के परिंदे की आँख बनूँ।
चाह है बस जन्म-जन्मांतर प्रकृति का हिस्सा बनूँ।
सुनिता मीना
उपप्राचार्य एवं स्थानीय संपादिका
उलझन सुलझन, महिला प्रकोष्ठ
सवाई माधोपुर (राजस्थान)
काव्य रचना की व्याख्या
यह कविता त्याग, वैराग्य और प्रकृति-प्रेम का अत्यंत सुंदर संगम प्रस्तुत करती है। कविता के प्रथम भाग में कवयित्री सांसारिक आकर्षणों, सामाजिक प्रतिष्ठा, उच्च पद, उपलब्धियों तथा मोक्ष जैसी आध्यात्मिक कामनाओं तक का त्याग करती हुई दिखाई देती हैं। यह त्याग निराशा का नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष और उच्च चेतना का प्रतीक है।
कविता के दूसरे भाग में कवयित्री प्रकृति के विविध रूपों—पेड़, झरना, पुष्प, घास, पत्थर, घोंसला, हवा, बर्फ, सीप और पक्षी की आँख—के माध्यम से स्वयं को प्रकृति में विलीन करने की इच्छा व्यक्त करती हैं। यहाँ प्रकृति केवल सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि आत्मिक स्वतंत्रता, शांति और अस्तित्व की पूर्णता का स्वरूप बन जाती है।
कवयित्री का यह भाव दर्शाता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि स्वयं को प्रकृति और सृष्टि के साथ जोड़ लेना है, क्योंकि वहीं वास्तविक आनंद और शाश्वत शांति निवास करती है।
निहित भाव
1. वैराग्य का भाव
कविता में सांसारिक मोह, प्रतिष्ठा और भौतिक उपलब्धियों से विरक्ति स्पष्ट दिखाई देती है।
2. प्रकृति-प्रेम
कवयित्री प्रकृति के प्रत्येक रूप में अपना अस्तित्व ढूँढ़ती हैं और उसी का हिस्सा बनना चाहती हैं।
3. विनम्रता
वे किसी विशेष पहचान या महानता की इच्छा नहीं रखतीं, बल्कि एक साधारण प्राकृतिक तत्व बनने की आकांक्षा व्यक्त करती हैं।
4. आत्मिक शांति
कविता का मूल स्वर आत्मिक संतोष और अंतर्मन की शांति की खोज है।
5. सर्वव्यापकता का भाव
देश, सीमा और सामाजिक वर्गों से ऊपर उठकर समस्त सृष्टि के साथ एकात्म होने की भावना प्रकट होती है।
कविता से प्राप्त शिक्षा
* जीवन का वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आंतरिक संतोष में निहित है।
* प्रकृति मनुष्य की सबसे बड़ी गुरु है; उससे जुड़कर मन शांति प्राप्त करता है।
* विनम्रता और सरलता व्यक्ति को महान बनाती हैं।
* भौतिकता की अंधी दौड़ से अधिक महत्वपूर्ण है आत्मिक समृद्धि।
* मनुष्य यदि प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर ले, तो उसका जीवन अधिक सार्थक और संतुलित बन सकता है।
* त्याग का अर्थ पलायन नहीं, बल्कि जीवन के वास्तविक मूल्यों की पहचान करना है।
समापन
"नहीं चाह" केवल एक कविता नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवन-दृष्टि है जो मनुष्य को अहंकार, प्रतिस्पर्धा और भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठकर प्रकृति की गोद में आत्मिक शांति खोजने की प्रेरणा देती है। यह रचना पाठक को स्वयं से प्रश्न करने के लिए विवश करती है कि वास्तव में जीवन में आवश्यक क्या है—संसार की प्रशंसा या आत्मा की शांति? यही इसकी सबसे बड़ी विशेषता और सफलता है।
रचनाकार






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